कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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जयपुर में रोक, कोलकाता में निर्बासन

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी को वहां आने से रोकने और वीडियो कांफ्रेंसिंग को रुकवाने में सफलता हासिल करने के बाद कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद हैं. राजस्थान की कांग्रेस सरकार के घुटने टेकने के बाद अब बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी चंद कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक दिए.

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युवाओं की भागीदारी से प्रकाशक गदगद

दिल्ली में आयोजित उन्नीसवां पुस्तक मेला ख़त्म बीती सात फरवरी को संपन्न हो गया. इस पुस्तक मेले में कई दिलचस्प बातें हुईं. पिछले विश्व पुस्तक मेले से मैंने कवि मित्र और कला प्रेमी यतींद्र मिश्र के साथ जामिनी राय की कई बेहतरीन पेंटिंग्स ख़रीदी थी, जो कि मेरी पत्नी को का़फी पसंद आई थी.

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दांव पर दिल्ली पुस्तक मेला

पंद्रहवीं शताब्दी में जब पुस्तक मेले की शुरुआत हुई थी तो उसके पीछे अवधारणा यह थी कि विश्‍व के देशों के प्रकाशकों को एक मंच मिले, जहां वे किताबों के प्रकाशन अधिकार का सौदा कर सकें. प्रारंभिक अवधारणा में समय के साथ बदलाव आया और कालांतर में इस तरह का मेला पुस्तक प्रेमियों के लिए उत्सव सरीखा बन गया, जिसका वे शिद्दत से इंतज़ार करने लगे. पश्चिम की यह अवधारणा जब हिंदुस्तान आई तो पुस्तक मेले की जो तस्वीर उभरी, उसके केंद्र में स़िर्फ पाठक ही थे. किताबों के प्रकाशन अधिकार के कारोबार को न तो मंच मिला और न ही प्रकाशकों के स्तर पर इसके लिए कोई गंभीर कोशिश की गई. भारत में विश्‍व पुस्तक मेले का आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट के ज़िम्मे है और हर दो साल पर दिल्ली के प्रगति मैदान में एनबीटी इसे आयोजित करती है.

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