पत्रों से खुलते राज

अच्युतानंद मिश्र जी द्वारा संपादित इस किताब में निराला जी का एक पत्र है 17 अक्टूबर, 1931 का, जिसमें वह

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कुख्यात डाकू मुस्तकीम कैसे मारा गया-4 : आठ ने मिलकर मारे दो

फरवरी, 1979 में मुस्तकीम की ज़िंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया. चतेला गांव के रहने वाले एमए, एलएलबी, बीएड अजीज

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आधुनिकता से डरते हैं आतंकी

कट्टर इस्लाम स्वतंत्रता के लिए हर जगह ख़तरा बन गया है. यह इस्लामिक समाज को बर्बाद कर रहा है, जिसे

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पुस्तक मेला नहीं, सांस्कृतिक आंदोलन

अगर किसी पुस्तक मेले में एक दिन में एक लाख लोग पहुंचते हों, तो इससे किताबों के प्रति प्रेम को

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बेबाक ज़िंदगी, बिंदास अदा

हाल में वहीदा रहमान की जीवनी-कनवर्सेशन विद वहीदा और दिलीप कुमार की आत्मकथा-दिलीप कुमार : दे सब्सटेंश एंड द शैडो

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व्यक्तित्व विकास की पहली पाठशाला

पुस्तक लिखना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है कि लेखक ने अपनी पुस्तक के जरिये पाठकों को, समाज को आख़िर

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बाज़ार पर लेखकों का जादू

अपनी किताब वन लाइफ इज नॉट एनफ के विमोचन के मौ़के पर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने ऐलान किया

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अद्भुत अभिव्यक्ति और जिजीविषा का अनूठा दस्तावेज़

आत्मकथा-हमारे पत्र पढ़ना की लेखिका, कवयित्री एवं कथाकार उर्मिल सत्यभूषण का जन्म पंजाब के गुरुदासपुर ज़िले में बीसवीं शताब्दी के

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प्रकाशकों से भी अच्छे दिन की उम्मीद

अभी कुछ दिनों पहले मन में यह बात आई कि वेदों को पढ़कर देखा जाए कि उसे संदर्भित करके जो

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किताबों में लोकप्रिय मोदी

लोकसभा चुनाव सिर पर हैं. सियासी बिसात पर हर तरह की चालें चली जा रही हैं. सियासत के इस खेल

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बेबाक और बिंदास खुशवंत

अगर चाहते हो कि तुम्हें / तुम्हारे मरते ही और नष्ट होते ही भुला न दिया जाय/ तो या तो

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महत्वाकांक्षाओं का मेला

दिल्ली में आयोजित विश्‍वपुस्तक मेला ख़त्म हो गया. इस विश्‍व पुस्तक मेला में जो रचनात्मक ऊर्जा और उष्मा साहित्य जगत

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युवा लेखकों की धूम

पुस्तक मेले में सामयिक प्रकाशन ने भी कई युवा लेखकों की किताबें जारी कीं. इसमें पूर्व पत्रकार एवं कवयित्री वर्तिका

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नियमित हो तो बात बने

मैने चौथी दुनिया के अपने इस स्तंभ में कई बार हिंदी में निकल रही साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में विस्तार

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समाज का दर्पण है ‘प्रिय कहानियां’

जाने-माने कवि, कथाकार व उपन्यासकार डॉ. लालजी प्रसाद सिंह की कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है. ‘प्रिय कहानियां’ शीर्षक वाले

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साहित्य पत्रिकाओं की सार्थकता

यदा-कदा साहित्यिक आयोजनों और विचार गोष्ठियों में जाने-बोलने का अवसर मिलता है. ज्यादातर गोष्ठियों में वामपंथी विचारधारा के अनुयायी या

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साल 2013 का साहित्यिक लेखा-जोखा

साल 2013 तमाम साहित्यिकगतिविधियों से भरा हुआ रहा. बिल्कुल प्रारम्भ में ही जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान आशीष नन्दी महज़

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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किताबों की दुनिया और बच्चे

दौड़ती-भागती दुनिया और तेज़ी से होता आधुनिकीकरण. बच्चों की तो दुनिया ही बदल गई है. टीवी और इंटरनेट ने उन्हें किताबों और साहित्य से कोसों दूर कर दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार ने बच्चों की साहित्यक रूचि का मंच प्रदान करने और वरिष्ठों के बीच बिठाकर उनकी प्रतिभा को निखारने की योजना बनाई है. इसकी शुरुआत राजस्थान माध्यमिक शिक्षा परिषद ने कर भी दी है.

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सर्वश्रेष्ठ पत्र लेखकों का सम्मान

चौथी दुनिया उर्दू में प्रकाशित होने वाले पत्रों में से हर सप्ताह एक सर्वश्रेष्ठ पत्र को पुरस्कृत किया जाता है. पुरस्कार के रूप में उक्त पत्र के लेखक को क़ौमी काउंसिल बराए फ़रोग उर्दू द्वारा एक हज़ार रुपये की पुस्तकें प्रदान की जाती हैं.

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खुशियाँ बांटती रवीना

बहुत कम ऐसी अभिनेत्रियां हैं, जिन्हें हम किताबों के क़रीब पाते हैं, जिन्हें पढ़ने-लिखने में रुचि हो. जब फिल्म करने और किताब पढ़ने में किसी एक को चुनना हो तो कोई भी फिल्म यानी करियर ही चुनेगा और अपना फुल अटेंशन फिल्म को ही देगा, लेकिन रवीना टंडन थोड़ी अलग हैं.

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सपाट बयानी का संग्रह

बहुत ही दिलचस्प वाकया है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों की सूची उसकी वेबसाइट पर जाकर देख रहा था. कई किताबें पसंद आईं. यह सोचकर नाम लिखता गया कि उन पुस्तकों को मंगवा कर पढूंगा और अगर मन बना तो उन पर अपने स्तंभ में या अन्यत्र कुछ लिखूंगा भी. सूची बनाते-बनाते एक किताब दिखाई दी-मरजानी, लेखिका वर्तिका नंदा.

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आतंक के आका कि जीवनी

पाकिस्तान के मिलिट्री शहर एबटाबाद में जब बीते दो मई को दुनिया के सबसे दुर्दांत और खूंखार आतंकवादी को अमेरिकी नेवी सील्स ने मार गिराया तो पूरे विश्व के लोगों में मौत के इस सौदागर ओसामा बिन लादेन के बारे में जानने की जिज्ञासा बेतरह बढ़ गई. अमेरिकी कार्रवाई के बाद जिस तरह से एबटाबाद स्थित ओसामा के ठिकाने से उसके और उसकी पत्नियों, बच्चों, परिवार और उसके रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बारे में खबरें निकल कर आ रही थीं, उसने ओसामा और उसकी निजी ज़िंदगी में लोगों की रुचि और बढ़ा दी.ं

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दिल्ली का बाबुः बाबुओं के बाबु

पिछले दिनों एक पुराने मित्र के पी सिंह का दिल्ली में देहांत हो गया, जिससे बहुत से वरिष्ठ बाबुओं को आघात पहुंचा. वैसे तो के पी से पहले उनके बहुत से मित्रों का देहावसान हो चुका है, लेकिन उनकी याद में आयोजित कार्यक्रम में शीर्षस्थ बाबू बड़ी संख्या में मौजूद थे.

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सदियों का स़फरनामा

करीबन चार साल पहले की बात है, एक किताब आई थी भारतीय डाक-सदियों का सफरनामा. लेखक थे अरविंद कुमार सिंह. मैं डाक भवन दिल्ली के सभागार में किताब के विमोचन समारोह में भी शामिल हुआ था. यह किताब नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी और उस व़क्त ट्रस्ट की कर्ताधर्ता पुलिस अधिकारी नुजहत हसन थीं. बात आई-गई हो गई. मैंने किताब को बग़ैर देखे-सुने रख दिया था. कई बार इस किताब की चर्चा सुनी-पढ़ी, लेकिन अभी दो मजेदार घटनाएं हुईं, जिनके बाद डाकिया, उसके मनोविज्ञान और डाक विभाग को जानने की इच्छा हुई. हुआ यह कि मैं पिछले दिनों अपनी सोसाइटी में खुले डाकघर में गया और वहां मैंने काउंटर पर बैठे सज्जन से कहा कि मुझे पचास पोस्टकार्ड दे दीजिए तो पहले तो उन्होंने हैरत से मेरी ओर देखा और फिर दोहराया कि कितने पोस्टकार्ड चाहिए. मैंने फिर से उन्हें कहा कि पचास दे दीजिए. इसके बाद उन्होंने अपनी दराज खोलकर कार्ड गिनने शुरू कर दिए, लेकिन बीच-बीच में वह मेरी ओर देख रहे थे. पोस्टकार्ड मुझे सौंपने और पैसे लेने के बीच उनकी आंखों में कुछ प्रश्न तैर रहे थे, जो पैसे वापस करते समय उन्होंने मुझसे पूछ ही लिए. उन्होंने कहा कि आप इतने पोस्टकार्डों का क्या करेंगे? जब तक मैं कुछ बोलता, तब तक उन्होंने ख़ुद ही जवाब दे दिया कि शायद आप कोई मार्केटिंग कंपनी चलाते हैं और अपने ग्राहकों को किसी उत्पाद के बारे में जानकारी देना चाहते हैं और पोस्टकार्ड से सस्ता एवं सुरक्षित माध्यम कुछ और हो नहीं सकता. मैं उनके अनुमान को ग़लत साबित नहीं करना चाहता था, इस वजह से मुस्कराता हुआ डाकघर से निकल गया.

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