इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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राहुल को हार का डर सताने लगा है

उत्तर प्रदेश में मिली हार के बाद राहुल ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. राहुल गांधी बात भले ही पूरे प्रदेश की करते दिखते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका सारा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर लगा है. उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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रुपयों से ख़रीदे गए रुपये

पूंजी बाज़ार वह जगह है, जहां साल भर की कमाई एकमुश्त रकम के बदले ख़रीदी या बेची जाती है. एक हज़ार रुपये में आप कितनी कमाई ख़रीद सकते हैं, यह भाव रोज़ाना बदलता रहता है. और किसी दिन एकमुश्त रकमें कम हैं तो ज़्यादा कमाई ख़रीद सकते हैं.

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सीमांचलः देह के दलदल में फंसी मासूम जिंदगियां

एक ओर जहां पूरे देश में राष्ट्रीय बलिका दिवस मनाया जाता है, वहीं सीमांचल के चंद बे़खौ़फ दलालों द्वारा मासूम नाबालिक लड़कियों से अनैतिक ज़िस्मफरोशी जैसे धंधे करवाकर मानवता को कलंकित और शर्मसार किया जा रहा है.

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बड़े पत्रकार, बड़े दलाल

पद्मश्री बरखा दत्त और वीर सांघवी. दो ऐसे नाम, जिन्होंने अंग्रेज़ी पत्रकारिता की दुनिया पर सालों से मठाधीशों की तरह क़ब्ज़ा कर रखा है. आज वे दोनों सत्ता के दलालों के तौर पर भी जाने जा रहे हैं. बरखा दत्त और वीर सांघवी की ओछी कारगुज़ारियों के ज़रिए पत्रकारिता, सत्ता, नौकरशाह एवं कॉरपोरेट जगत का एक ख़तरनाक और घिनौना गठजोड़ सामने आया है.

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उत्तर भारत बांग्‍लादेशी दुल्‍हनों का बड़ा बाजार

मां तुम मुझे अब कभी नहीं देख सकोगी. मुझे भूल जाओ. सोच लो कि तुम्हारी बेटी नज़मा अब मर गई. मैं अपने बच्चों को नहीं छोड़ सकती और वे यहां आ नहीं सकते. वे तुम्हें कभी नानी नहीं कह पाएंगे. मेरी ज़िंदगी नर्क हो गई है, पर मैं कुछ नहीं कर सकती, उक्त उद्गार हैं उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में ब्याही तहमीना नामक दुल्हन के, जो सात साल पहले अपनी मां से मिलने बांग्लादेश लौटी थी.

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अनाज क्रय एवं वितरण प्रणाली में धांधली

सहकारी विपणन संघ द्वारा शासकीय समर्थन मूल्य में खरीदे जा रहे गेहूं के लेन-देन पर दलालों का साया पड़ चुका है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन माफियाओं ने कई अनियमितताएं फैला रखी हैं. परिणाम यह है कि किसान और आम उपभोक्ता शासन की समस्त नीतियों के बाद भी शोषित हैं.

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