बीटी बीज यानी किसानों की बर्बादी

संप्रग सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति होनी चाहिए, वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है. इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं.

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बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है.

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सार–संक्षेप : मछलियों की पचास प्रजातियां विलुप्त

मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली पवित्र नदी नर्मदा में प्रदूषण का स्तर घातक स्थिति में पहुंच चुका है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नर्मदा नदी में बढ़ते प्रदूषण और छोटे-बड़े बांधों से पानी में ठहराव के कारण कई स्थानों पर मछलियों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है. यह जानकारी नर्मदा समग्र बांद्राभान (होशंगाबाद) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव में आए विशेषज्ञों ने दी.

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प्रजातंत्र, तानाशाही और अन्न स्वराज

बीटी-बैगन के मुद्दे पर भारत में छिड़ी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश का कृषक और उपभोक्ता वर्ग जीएम फूड्‌स के पक्ष में नहीं है. सेंटर फॉर एंवायरमेंट एजूकेशन, जिसने पर्यावरण मंत्रालय की ओर से इस बहस का आयोजन किया, के अतुल पांड्या ने इससे संबंधित रिपोर्ट पेश की. बहस में देश भर के किसानों ने भाग लिया और अपने अनुभव बांटे.

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पर्यावरण से संबंधित फैसलों में हितों का टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके, जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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