भुखमरी, बदहाली, पाखंड और सियासत का मारा बुंदेलखंड… कुछ भी तो नहीं बदला : ‘बी’ फॉर बुंदेलखंड ‘पी’ फॉर पॉलिटिक्स

बुंदेलखंड पर सियासत तो खूब हुई, लेकिन बुंदेलखंड की हालत जस की तस है. बुंदेलखंड छोड़ कर लोग बाहर जा

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सांसद ने गोद लिया और फिर अनाथ छोड़ दिया : अच्छे दिनों पर भारी आदर्श ग्राम पठारी

महोबा के इस गांव में आजादी के बाद से अब तक पानी, बिजली, सड़क नदारद मोदी का नाम आते ही

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उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था की यही है असलियत : क़ानून हमारी मुट्‌ठी में

मथुरा कांड को लेकर खूब बवाल हुआ. विपक्षियों ने इस मामले में सरकार को कसूरवार ठहराते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे

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भुखमरी, प्यासमरी और बिजलीमरी का शिकार बुंदेलखंड : बिजली-पानी नहीं तो क्या, नेतागीरी तो है!

सूखा, भुखमरी और प्यासमरी से आक्रांत बुंदेलखंड बिजलीमरी का भी शिकार है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुंदेलखंड

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अवैध खदान में खनन करते पांच मज़दूरों की मौत पर शासन-प्रशासन खामोश : सीएम के भाई का साला तो सबके मुंह पर ताला

अखिलेश यादव के  सांसद भाई धर्मेंद्र यादव के  साले पुष्पेंद्र यादव का बुंदेलखंड में अवैध खनन पर वर्चस्व है मुख्यमंत्री

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सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के अभावग्रस्त लोगों ने कहा, नहीं मिल रही कोई राहत : भूख पर भारी भ्रष्टाचार

राहत पैकेजों से अकालग्रस्त बुंदेलखंड को कोई राहत नहीं मिल रही है. राहत पैकेजों में भारी घोटाले की खबरें सामने

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पानी को तरस रहे बुंदेलखंड में पानी की तरह बह रहा है पैसा : सट्‌टा लगा रहा है बट्‌टा

विकास को परिभाषित करने के लिए आज हम जिस आधुनिक तकनीक का हवाला देते हैं, उसी आधुनिकता को आधार बनाकर

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नापाक सियासतदानों के कारण बर्बाद हो गई बुंदेलों की पावन भूमि : नेताओं ने बुंदेलखंड को लूट-लूट कर ऐसा बना दिया

न सियासत का सलीका, न बोलने की समझ, न नेतृत्व वाले गुण और न ही नमकहलाली की नियत! यही निचोड़

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बुंदेलखंड : फ़रमानों से निजात

दस्युओं के परिवारीजन विधानसभा चुनाव में हिस्सा तो ले रहे हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां स़िर्फ अपने तक सीमित रह गई हैं. जिन बाहुबलियों को अपने आक़ा पर नाज़ हुआ करता था, वे भी जनता के बीच से नदारद दिख रहे हैं, क्योंकि दस्यु सम्राटों का खात्मा हो चुका है.

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बुंदेलखंडः महापर्व में घरवाले ही शामिल नहीं हैं

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, यह नाम सुनते ही एक ऐसी तस्वीर सामने उभर कर आती है, जहां भूख है, सूखा है, मौत है और घरों में लटके ताले हैं. जिन घरों में ताले नहीं लगे हैं, वहां स़िर्फ बुज़ुर्ग है, जो दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में पलायन कर चुके अपने बच्चों द्वारा भेजे गए पैसों की वजह से जिंदा है, न कि केंद्र या सूबे की सरकार के अनुदान से. एक आंकड़े के मुताबिक़, पिछले पांच सालों में बुंदेलखंड से ढाई लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर चुके हैं.

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