सार्थक राजनीतिक संवाद की ज़रूरत

तीस वर्षों के भीतर भारत की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है. पहले नेता विचारों के आधार पर बनते

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी.

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नवीनीकरण का विरोध

नई मशीनरी का परिणाम है कम मज़दूरों से अधिक काम करवा सकना. उससे मज़दूरों की ज़रूरत न रहने से कटौती या छंटनी होती है. जो लोग बेकार होते हैं, वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि नई मशीनरी लगाई जाए. जो काम करते रहें, उन्हें अधिक वेतन दें तथा हमें निकाल बाहर करें. युक्तीकरण का सबसे बड़ा विरोध इसी बुनियाद पर हो रहा है. नवीनीकरण में सबसे बड़ी बाधा इन मज़दूरों की छंटनी है.

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मालिक बड़ा या श्रमिक बड़ा

हर धंधे में एक श्रमिक का औसत कार्यभार निर्धारित होना आवश्यक है. मालिक लोग तो, मान लीजिए, ऐसे एक मज़दूर को चुन लेते हैं, जो बहुत ज़्यादा मेहनत करता है या निपुण है, जो सबसे ज़्यादा काम करता है, और उसी को पैमाना बनाकर वे चाहते हैं कि हर श्रमिक का कार्यभार उतना ही हो.

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वर्ग युद्ध

मध्यम वर्ग का या उत्पादन करने वाला कोई भी व्यवसायी जिस तरह से अपने जीवन निर्वाह के लिए अपना माल बेचना आवश्यक समझता है, उसी तरह एक मज़दूर भी अपना माल-असबाब बेचे बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता. उसका माल-असबाब उसका श्रम ही है. उसकी जितनी ज़्यादा क़ीमत मिल सके, उतना ही उसके लिए अच्छा है, जितनी कम मिले, उतना ही बुरा है.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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विदेशी आर्थिक सहायता शुद्ध स्वार्थ से प्रेरित

कोई भी पूंजीवादी उद्योगपति, किसी भी देश का वासी क्यों न हो, अपनी पूंजी तब ही लगाएगा, जब उसे उसकी सुरक्षा और उससे लाभ होने का पूरा विश्वास हो. अगर भारत सरकार की नीति उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की रही तो कोई भी बाहरी पूंजीवादी अपना एक रुपया भी भारत में नहीं लगाएगा.

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राष्ट्र और पूंजी

ध्‍यान देने की बात यह है कि ये पूंजीवादी धनिक उन्हीं चीज़ों में अपने रुपये लगाते हैं या दूसरों से लेकर लगाते हैं, जहां इनको जल्दी से जल्दी ज़्यादा से ज़्यादा मुना़फा नज़र आता है. देश के लिए क्या काम करना अच्छा है, इसमें इनकी तनिक भी आस्था नहीं.

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