एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है.
Tags: Bihar, Corruption, Village Panchayat, chief, elections, sarpanch, ग्राम, चुनाव, पंचायत, बिहार, भ्रष्टाचार, मुखिया, सरपंच Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, चुनाव, राजनीति, राज्य, विधि-न्याय, समाज by Author: अभिषेक रंजन सिंह | No Comments » | Read More... |
सत्ता की राजनीति में कुर्सियों का हिलना-डुलना शुभ नहीं माना जाता है. ऐसे में अगर कुर्सियां उछाली जाने लगें तो उसे ख़तरे की घंटी ही समझिए. सेवा यात्रा के दौरान बिक्रमगंज में मुख्यमंत्री की सभा में जब नाराज़ लोगों ने कुर्सियां लहरानी शुरू कर दीं तो सभी अवाक रह गए. पटना में फोन की घंटियां घनघनाने लगीं.
Tags: Karpoori, Nitish Kumar, chief, politics, power, service, कर्पूरी, नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, राजनीति, सत्ता, सेवा Posted in कानून और व्यवस्था, चुनाव, राजनीति, राज्य, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: सरोज सिंह | No Comments » | Read More... |
झारखंड के बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में राज्य के पूर्व मंत्री मधु को़डा के साथ हुए हादसे के बाद सूबे में राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है. कभी अपने विधायकों का समर्थन देकर को़डा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाने वाली कांग्रेस का भी पुराना को़डा प्रेम जाग उठा. बस फिर क्या था, को़डा प्रकरण पर राज्य के कांग्रेसी नेता सत्तासीन सरकार की खिंचाई करते नज़र आए.
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केंद्र सरकार सरासर झूठ बोल रही है. भारत के थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1951 है, यह बात भारत सरकार और सेना द्वारा दिए गए आधिकारिक उत्तर में है. जिन अधिकारियों ने जवाब दिया है, उनके दस्त़खत हैं. इसके बावजूद भारत सरकार झूठ बोल रही है कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1950 है.
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नित नई घोषणाओं-योजनाओं की चर्चा और सूचना माध्यमों का इस्तेमाल करके मजबूरी से ज़ार-ज़ार हो रहे लोगों से पटे राज्य और सरकार की कमज़ोरियों से जनता का ध्यान बांटने में फिलव़क्त सफल दिखते हैं. इस सोची-समझी योजना में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने का शिगू़फा भी शामिल है.
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वर्ष 2007 में चौथी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली मायावती का आग़ाज़ जितना अच्छा था, अंजाम उतना ही ख़राब लग रहा है. उनकी सरकार के चार साल पूरे हो गए हैं, अगले साल चुनाव है, लेकिन उनके पास कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है, जिसके बल पर वह जनता से वोट मांग सकें. इन चार सालों में मायावती अर्श से फर्श पर आ गई हैं.
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जब अटल जी प्रधानमंत्री बने तो भारतीय जनता पार्टी उस तरह दबाव नहीं डाल पाई, जैसे उसने वी पी सिंह पर डाला था. सा़फ कह दिया था जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, शरद यादव एवं ममता बनर्जी ने कि अगर आपने एक बार भी नाम लिया राम जन्मभूमि विवाद और मंदिर बनाने का तो हम आपकी सरकार छोड़ देंगे.
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राजनीति पेशा है या समाजसेवा का ज़रिया, इसका जवाब इस साल संसद के मानसून सत्र को देखकर पता लग जाता है. सत्र के दौरान सांसदों ने जिस तरीक़े से अपना वेतन और भत्ता बढ़ाने की मांग की, उससे यह साफ हो गया कि इन माननीयों के लिए राजनीति समाजसेवा का ज़रिया तो कतई नहीं हो सकती.
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पहले सेना ने और अब सेवानिवृत्त हो चुके वरिष्ठ सेना अधिकारियों ने सरकार की प्रस्तावित सेना तैनाती नीति को लेकर अपना विरोध प्रगट किया है. जो बात सरकार को समझनी चाहिए, उसे भारत की सेना सरकार को समझाने की कोशिश कर रही है कि विकास के काम में युद्ध स्तर की तेज़ी लाए और भ्रष्टाचार के दोषी सिविल पुलिस व प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों को मध्यकालिक सख्ती वाली सज़ा दिए बिना,
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एक प्रेमी युगल ने शादी क्या कर ली. गांव वाले उसके जान के दुश्मन बन गए. उसके परिजनों को गांव वालों ने जीना मुहाल कर दिया है. उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया है. उसके परिवार से गांव का कोई भी व्यक्ति नहीं बोलता है. आ़खिर उस प्रेमी युगल का क़सूर क्या है. स़िर्फ यही न कि उसने प्यार किया और उससे शादी कर ली है, तो क्या प्यार करने की उसे सजा मिली है.
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लंबी प्रतीक्षा के बाद संवैधानिक सुधारों को नेशनल एसेंबली और सीनेट की मंजूरी भले मिल गई हो, लेकिन चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. सुधार प्रस्तावों पर काम करने के लिए सीनेटर रजा रब्बानी और समिति के दूसरे सदस्य तारी़फ के क़ाबिल ज़रूर हैं.
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जनता भोली होती है, बेवक़ू़फ नहीं |
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