मिशनरीज अॉफ चैरिटी पर लगा बच्चे बेचने का आरोप, 2 की मौत 24 गायब

मिशनरीज अॉफ चैरिटी में बच्चों के खरीद-फरोख्त के मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, नये-नये खुलासे हो रहे

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मन में हो विश्‍वास

एक समय तक शिरडी गांव की गिनती पिछड़े गांवों में हुआ करती थी. उस समय शिरडी और उसके आसपास के लगभग सभी गांवों में ईसाई मिशनरियों ने अपने पैर मज़बूती से जमा लिए थे. ईसाइयों के प्रभाव-लोभ में आकर शिरडी के कुछ लोगों ने भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था.

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ऐसे बनेगी मुसलमानों की तकदीर

अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में एक बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं. मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है. क्या इस रिपोर्ट में कुछ ऐसा है, जिस पर खुश हुआ जा सके? मेरे हिसाब से तो नहीं.

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सबका मालिक एक

हेमाड पंत जी साई सच्चरित्र में लिखते हैं, बाबा अक्सर कहा करते थे कि सबका मालिक एक. आख़िर इस संदेश का मतलब क्या था? आइए बाबा के इसी संदेश पर कुछ बातें करें. बाबा के विषय में हम जितना मनन करते जाते हैं, उनके संदेशों को समझना उतना ही आसान होता जाता है. बाबा के बारे में लिखना और पढ़ना हम साई भक्तों को इतना प्रिय है कि उनकी एक लेखिका भक्त ने तो अपनी एक किताब में बाबा को ढेर सारे पत्र लिखे हैं. मेरा मानना है कि साई को पतियां लिखूं जो वह होय बिदेस. मन में, तन में, नैन में ताको कहा संदेस. लेकिन साई के विषय में बातें करना जैसे आत्म साक्षात्कार करना है. बाबा ने बहुत सहजता से कहा है, सबका मालिक एक. ऐसा कह पाना शायद बाबा के लिए ही संभव था, क्योंकि समस्त आसक्तियों और अनुरागों से मुक्त एक संत ही ऐसा कह सकता है. प्रचलित धर्म चाहे हिंदू, इस्लाम, सिख, ईसाई, जैन एवं बौद्ध हो या कोई अन्य, प्रश्न यह है कि जो ये धर्म सिखा रहे हैं, क्या वह ग़लत है? अगर ग़लत न होता तो बाबा को इस धरती पर अवतार लेने की आवश्यकता ही न होती.

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कंधमाल हिंसा: यह आग कब और कैसे बुझेगी?

ईसा मसीह की टूटी मूर्ति, अधजले धर्मग्रंथ, जले घर, घर से बाहर झांकता एक मासूम चेहरा और तिलक-चंदन लगाकर लोगों को फिर से हिंदू बनाने का आयोजन. यह कहानी वे तस्वीरें ख़ुद बयां करती हैं, जो कंधमाल में अल्पसंख्यक ईसाइयों के ख़िला़फ हिंसा के दौरान या उसके बाद ली गई हैं.

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स्‍वाधीनता संग्राम और मुसलमान

इस साल कांग्रेस अपना 125वां स्थापना दिवस मना रही है. भारत के सभी धर्मों के नागरिकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ज़रिए स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया, परंतु हमारे नेताओं की बहुसंख्यकवादी मानसिकता और स्कूली पाठ्‌यक्रम तैयार करने वालों के संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अल्पसंख्यकों की भूमिका को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया है.

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