सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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गांव की मिट्टी और देश का गौरव

हाल में दीपिका कुमारी ने तीरंदाज़ी विश्वकप में स्वर्ण पदक जीता. वह भी लंदन ओलंपिक खेलों के आयोजन के कुछ महीने पहले. देशवासी दीपिका से ओलंपिक मेडल की आस लगाने लगे हैं. आस लगाने वालों में हमारी सरकार भी शामिल है. खिलाड़ी पदक जीतते ही देश के लाल हो जाते हैं, सरकार कुछ दिन तक खिलाड़ियों का गुणगान करती है.

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कृष्णा ने बनाया नेशनल रिकॉर्ड

भारतीय महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया ने अमेरिका के हवाई में हुई एल्टियस ट्रैक क्रू थ्रोडाउन प्रतियोगिता में रजत पदक जीत कर नेशनल रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया.

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राष्ट्रमंडल खेल का खुमार

राष्ट्रमंडल खेल समाप्त हुए डेढ़ साल से अधिक समय हो गया, लेकिन अभी भी उससे जुड़े बाबुओं की चर्चा जारी है. हालांकि उसमें शामिल अधिकांश अधिकारियों को उनके पुराने विभाग या मंत्रालय में भेज दिया गया है, लेकिन अभी सब कुछ दांव पर है.

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मुक्‍के से सोने की आस

लंदन ओलंपिक शुरू होने में सौ से भी कम दिन रह गए हैं और भारत में ओलंपिक खेलों को लेकर क़यास लगने लगे हैं कि किस खेल में वह कितने पदक अपने नाम करेगा. पुरुष हॉकी टीम और शूटिंग के बाद लोगों की सबसे ज़्यादा नज़रें बॉक्सिंग पर रहेंगी.

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गीता ने इतिहास रचा

महिला पहलवान गीता कुश्ती में ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं. उन्होंने कजाकिस्तान के अस्ताना में हुए ओलंपिक क्वालीफायर टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीता.

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भारत यानी डॉ. जैकेल और मिस्टर हाइड

पाकिस्तान भारत की तरह किस मायने में समान है? इसमें कोई शक नहीं कि वह क्रिकेट में बेहतर है. इंग्लैंड से हुए मुक़ाबले में उसे जीत मिली, जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारत का सूपड़ा सा़फ हो गया. जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो निश्चित तौर पर वह भी भारत के सुप्रीम कोर्ट की तरह अच्छा है.

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ओलंपिक 2012 एक साल पहले तैयार है लंदन

याद कीजिए राष्ट्रमंडल खेल 2010 और मेज़बान के रूप में भारत और उसकी तैयारियों को. तैयारी ऐसी कि खेल खत्म होने के बाद भी कई निर्माण कार्य चलते रहे. बजट सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता चला गया. अब ज़रा देखिए लंदन ओलंपिक 2012 की ओर. अभी एक साल का समय बाक़ी है, लेकिन खेल की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, स्टेडियम में रौनक़ है और टिकट बिक चुके हैं.

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34वें राष्‍ट्रीय खेलः बदइंतजामी भारी पड़ी

झारखंड में पंचायत चुनावों के बाद राष्ट्रीय खेलों का सफल आयोजन मुंडा सरकार की उपलब्धियों में एक नया अध्याय जोड़ गया. कई बार आयोजन की तिथि टलने के बाद राज्य के हाथों से इसकी मेजबानी छिन जाने का खतरा भी उत्पन्न हो गया था.

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दिल्ली का बाबू : गृह मंत्रालय सकते में

कॉरपोरेट घरानों को अवैध रूप से सूचनाएं देने के आरोप में गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी रवि इंदर की पहले गिरफ्तारी और फिर निलंबन ने मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों की पेशानी पर बल डाल दिए हैं. आंतरिक सुरक्षा वैसे ही गृह मंत्रालय की नीतियों के केंद्र में होती है. रवि इंदर सिंह की गिरफ्तारी के बाद सेक्स और पैसे के प्रति उनके लालच को सुर्खियां मिलीं, लेकिन मंत्रालय इसलिए ज्यादा चिंतित है, क्योंकि सिंह तीसरे ऐसे अधिकारी हैं, जिन्हें एक साल के अंदर इस तरह की कारगुजारियों के लिए गिरफ्तार किया गया है या छापे मारे गए हैं. साल की शुरुआत में अप्रैल महीने में संयुक्त सचिव-डिजास्टर मैनेजमेंट ओ रवि को रिश्वतखोरी के आरोप में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था. इसके बाद आर एस शर्मा भी ऐसे ही आरोपों के चलते जांच एजेंसियों के घेरे में आए थे. लेकिन रवि इंदर सिंह के मामले को जिस तरह सुर्खियां मिलीं, उससे मंत्रालय के अधिकारी सकते में हैं. सूत्रों के मुताबिक, खुद गृह सचिव जी के पिल्लई ने सिंह के फोन टेप किए जाने के निर्देश दिए थे, जिसके आधार पर उनकी गिरफ्तारी हुई. अपनी साफ-सुथरी छवि के लिए पहचाने जाने वाले पिल्लई और गृहमंत्री पी चिदंबरम भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम कसने के लिए कृतसंकल्प हैं. आने वाले समय में गृह मंत्रालय शीर्ष पदों पर नियुक्त किए जाने वाले अधिकारियों के पिछले रिकॉर्ड की ज्यादा कड़ाई से जांच-पड़ताल कर सकता है. रवि इंदर सिंह मामले पर मचे शोरगुल का यह एक अच्छा परिणाम हो सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट के संकेत चिंता का विषय हैं

देश की संसद ठप है. कौन जांच करे, पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी या पब्लिक एकाउंट्‌स कमेटी, यह बहस है. दोनों ने नाक का सवाल बना लिया है, पर चिंता का विषय है कि क्यों संसद के बाहर न कोई राजनेता और न राजनैतिक दल, एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार तथा कॉमनवेल्थ खेलों में हुए सत्तर हज़ार करोड़ के ख़र्चों में हुई गड़बड़ी को मुख्य मुद्दा नहीं बना रहे हैं.

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भारतीय टेनिस का नया सूर्य सोमदेव

भारत में टेनिस के खेल की एक खासियत रही है. यहां ऐसे खिलाड़ी कम ही पैदा हुए हैं, जो विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकें, लेकिन हर दौर में कम से कम एक खिलाड़ी ज़रूर रहा है, जो अपनी उपलब्धियों से हमें गौरव का एहसास कराता रहा है. पहले रामनाथ कृष्णन, फिर रमेश कृष्णन एवं विजय अमृतराज और उसके बाद लिएंडर पेस एवं महेश भूपति. बीच में सानिया मिर्ज़ा भी आईं, लेकिन उनकी उम्मीदों का सितारा चमकने से पहले ही रास्ते से भटक गया. अब जबकि लिएंडर पेस एवं महेश भूपति अपने करियर के आख़िरी पड़ाव पर हैं, सानिया कोर्ट से ज़्यादा अपना परिवार बसाने में व्यस्त हैं, ऐसे में भारतीय टेनिस प्रेमियों के दिल में एक ही सवाल कौंध रहा था कि अंतरराष्ट्रीय टेनिस में भारत का अगला झंडाबरदार कौन होगा? पिछले एक साल के प्रदर्शन पर ग़ौर करें तो सोमदेव देवबर्मन ने एक नई उम्मीद पैदा की है. हालांकि एटीपी रैंकिंग में वह अभी भी टॉप 100 से बाहर हैं, लेकिन हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों और खासकर कॉमनवेल्थ एवं एशियाई खेलों में उनके प्रदर्शन को देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में भारतीय टेनिस नायकविहीन नहीं रहेगा.

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राष्ट्रमंडल खेल का हिसाब मांगें

राष्ट्रमंडल खेल खत्म हो गए हैं. इन खेलों पर जो पैसा ख़र्च हुआ है, वह हमारा-आपका पैसा था. अगर यह पैसा करों के रूप में न वसूला गया होता तो हम-आप इसे अपने परिवार के लिए कई तरह की सुविधाएं और सामान जुटाने पर ख़र्च कर सकते थे, इसे अपने क्षेत्र, अपने गांव या शहर की बेहतरी पर ख़र्च कर सकते थे.

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प्रधानमंत्री जी इस्‍तीफा मत दीजिए

पहले आईपीएल घोटाला, फिर कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, फिर आदर्श सोसाइटी घोटाला और फिर 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला. ऐसा लग रहा है, मानों प्रजातंत्र की परिभाषा ही बदल गई है. भारत में प्रजातंत्र के 60 साल के बाद देश के लोगों को लगने लगा है कि हमारे सरकारी तंत्र का हाल यह है कि नेता हो, मंत्री हो, अधिकारी हो या फिर कोई और, जिसे जहां भी कुछ अधिकार प्राप्त है, वह लूटने में लगा है.

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दिल्‍ली का बाबूः ऐसे कैसे होगी जांच

कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर भले आश्वस्त हों कि राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की एक साथ कई एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच से मामला और उलझ कर नहीं रह जाएगा, लेकिन इसके संकेत अभी से देखने को मिल रहे हैं.

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शुरू हो गया खेल के बाद का असली खेल

राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन असफल होने या उसे रद्द किए जाने की भविष्यवाणी करने वाले लोग आज बगलें झांक रहे हैं. खेलों की शुरुआत से पहले अ़खबारों और टीवी चैनलों पर तमाम तरह की खबरें आ रही थीं कि तैयारियां पूरी नहीं हैं और लोग यह कयास लगाने लगे थे या यूं कहें कि मनाने लगे थे कि इसका आयोजन न हो.

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नायकों को सलामः सोना मिला, सोने जैसे खिलाड़ी भी

38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य यानी कुल 101 पदक. यह है 19वें राष्ट्रमंडल खेल में भारत की तस्वीर. खेलों के आठ दशकों के इतिहास में पहली बार भारत ने राष्ट्रमंडल खेल में दूसरा स्थान हासिल किया. शानदार प्रदर्शन और खेलों के सफल आयोजन का सेहरा अपने-अपने सिर बांधने की प्रतिस्पर्धा में शीला दीक्षित और सुरेश कलमाडी की ज़ुबान थक नहीं रही है, लेकिन हम आपको इस सबसे एक अलग कहानी बताते हैं.

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मणिपुरः इंडिया का स्‍पोर्ट्सवेल्‍थ

राष्ट्रमंडल खेलों में मणिपुर का जलवा सबने देखा. जिस अंदाज़ में इस राज्य के खिलाड़ियों ने पदक पर पदक जीते, उसे देखते हुए इस राज्य को स्पोर्ट्‌स का पावर हाउस कहना ग़लत नहीं होगा. भले ही मणिपुर आतंकवाद और अभावों से ग्रस्त हो, फिर भी देश की शान बढ़ाने में यहां के खिलाड़ियों ने कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी.

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निराश होने की ज़रूरत नहीं है

हम इतने पराजयवादी क्यों हो गए हैं? माना कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने कॉमनवेल्थ के नाम पर पैसों की लूट के इस हैरतअंगेज और उपहास योग्य घोटाले की परतें खोलकर रख दीं, लेकिन इससे क्या होता है. दुनिया भर के मीडिया ने भारत की छवि की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और वी एस नायपॉल के उस सपने को हक़ीक़त में तब्दील कर दिया, जिसे उन्होंने पहली बार एन एरिया ऑफ डार्कनेस में काग़ज़ पर उतारा था, लेकिन इसमें इतना निराश होने की क्या ज़रूरत है?

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सरकार और नाडा है डोपिंग की जिम्‍मेदार

राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में हो रही देरी, सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते बजट और दूसरे देशों के शीर्ष एथलीटों द्वारा इसमें भाग न लेने की खबरों के बीच भी एक आम भारतीय की उम्मीदें परवान चढ़ रही थीं, वह यह कि कड़ी प्रतियोगिता के अभाव में शायद भारत ज्यादा पदक अपने नाम करने में कामयाब हो जाए.

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अब संभलना बहुत जरूरी है

पहले प्रधानमंत्री और बाद में सोनिया गांधी ने कहा कि कॉमनवेल्थ खेलों को हो जाने दें, भ्रष्टाचार की जांच होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा. दोनों का बयान अच्छा लगा, पर ऐसे बयान तो हमने पहले भी देखे हैं. इन बयानों पर टिप्पणी बाद में, पहले हम राष्ट्रीय मनोविज्ञान की बात करते हैं.

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कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स 2010: सबसे बड़ा घोटाला

कॉमनवेल्थ की असल कहानी यह है कि एक साल पहले दिल्ली से इस आयोजन को ख़त्म करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी. सात देशों ने यह मना कर दिया था कि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं होने चाहिए. इसमें त्रिनिडाड एंड टुबैगो जैसा छोटा देश भी दिल्ली के ख़िला़फ खड़ा हो गया था.

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स्‍टार खिलाडि़यों से महरूम रहेगा राष्‍ट्रमंडल खेल

राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में घपले की ख़बरें आज मीडिया में सुर्ख़ियां बटोर रही हैं. हर गली-चौराहे से लेकर देश की संसद तक में इस पर हंगामा मचा हुआ है, लेकिन इस सारे हो-हल्ले के बीच यह बात दबकर रह गई है कि देश का सबसे बड़ा खेल आयोजन माने जा रहे इन खेलों से दुनिया के टॉप एथलीट धीरे-धीरे किनारा करते जा रहे हैं.

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कॉमनवेल्थ गेम्स का खेल से कोई रिश्ता नहीं है

हम कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण तथ्य को शायद नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, समस्या खेलों के साथ नहीं है, बल्कि समस्या तो कॉमनवेल्थ के साथ है. कॉमनवेल्थ के गठन की शुरुआत में ब्रिटेन खेलों के आयोजन को लेकर गंभीर रहता था, क्योंकि यह उपनिवेशों की प्रगति को जानने का एक अच्छा ज़रिया था, लेकिन अब तो महारानी की भी इसमें कोई रुचि नहीं है.

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राष्‍ट्रमंडल खेल गौरव या शर्म

अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के संबंध में पूर्व खेल मंत्री एवं कांग्रेस सांसद मणिशंकर अय्यर के एक बयान को लेकर खासा हल्ला-हंगामा हुआ. अय्यर ने अपने बयान में कहा था कि इन खेलों का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ तो उन्हें निराशा होगी. पहली नज़र में उनका यह बयान ग़ैर ज़िम्मेदारी भरा और राष्ट्रविरोधी लगता है.

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ऐसे कानून का क्‍या मतलब है

पिछले साल जब निशा शेट्टी की गिरफ्तारी हुई तो देश में खेल और खिलाड़ियों की हालत की असलियत सामने आ गई. छत्तीसगढ़ के रायपुर में पुलिस ने निशा को वेश्यावृत्ति के जुर्म में गिरफ़्तार किया था. काम गैरक़ानूनी है और असामाजिक भी, लेकिन अपना और अपनी बच्ची का पेट पालने के लिए निशा मजबूर थी. खेल मंत्री और खेल संघों के कर्ताधर्ताओं के लिए यह एक शर्मनाक घटना थी, क्योंकि निशा राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वाली एथलीट थी.

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चाणक्य इस दौर में भी प्रासंगिक हैं

ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो इस बात पर चहक सकते हैं कि आख़िर आज भी आचार्य चाणक्य प्रासंगिक हैं. यह वही तबका है, जिसने 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद के भारत को ही असली भारत मान लिया है. जब उदारीकरण की बयार बही तो वह अपने साथ बेहतर जीडीपी आंकड़े और शेयर बाज़ारों में उछाल लेकर तो आई, लेकिन उसने भारत को अंदर से खोखला कर दिया.

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राष्ट्रमंडल खेल : सुरक्षा पर संशय, प्रायोजकों का टोटा

इंडियन प्रीमियर लीग 2010 के दौरान बंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुए बम विस्फोट ने राष्ट्रमंडल खेलों की सुरक्षा को लेकर भी संशय पैदा कर दिया है. बंगलुरू में उक्त विस्फोट तब हुए, जब मुंबई और बंगलुरू की टीमों के बीच मुक़ाबला होने वाला था. हालांकि इसमें किसी की जान नहीं गई, लेकिन मैच के बाद भी स्टेडियम के अलग-अलग हिस्सों से विस्फोटक बरामद किए गए.

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दिल्‍ली का बाबू : पीएमओ का जवाबी हमला

एक बार फिर बच गए सुरेश कलमाड़ी. राष्ट्रमंडल खेलों के लिए अमिताभ बच्चन को ब्रांड एंबेसडर बनाने से इंकार कर उन्होंने खुद को बचा लिया, वरना उनकी गिल्लियां बिखरने ही वाली थीं. फिर भी यह जीवनदान उनके लिए क्षणिक हो सकता है.

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