जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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विद्वान प्रधानमंत्री विफल प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सौम्य हैं, सभ्य हैं, मृदुभाषी एवं अल्पभाषी हैं, विद्वान हैं. उनके व्यक्तित्व की जितनी भी बड़ाई की जाए, कम है, लेकिन क्या उनकी ये विशेषताएं किसी प्रधानमंत्री के लिए पर्याप्त हैं? अगर पर्याप्त भी हैं तो उनकी ये विशेषताएं सरकार की कार्यशैली में दिखाई देनी चाहिए. अ़फसोस इस बात का है कि मनमोहन सिंह के उक्त गुण सरकार के कामकाज में दिखाई नहीं देते.

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पीछे हट गए रामदेव

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, योगगुरु बाबा रामदेव के दोस्त और दुश्मन खुलकर सामने आने लगे हैं. बाबा के खिला़फ हरिद्वार के संत समाज के कुछ संत, अखाड़ा परिषद के कुछ बड़े-बड़े धर्माचार्य दुश्मन बनकर खड़े हो गए हैं. कांग्रेस पार्टी से उनकी दुश्मनी अब गहराती जा रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोस्ती रंग बिखेरने लगी है.

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चुनावी तड़काः विधायक जी नहीं बोल सकते क्या!

राहुल की सभा में उत्तर बिहार के कई ज़िलों के कांग्रेसी नेता एवं टिकटार्थी पूरे दल-बल के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे. सभा आयोजन के 24 घंटे पूर्व से ही समस्तीपुर शहर के सभी आवासीय होटल एवं रेस्ट हाउस कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं से फुल हो चुके थे.

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