समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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समकालीन हिंदी कविता और उसकी आलोचना

किसी रचना को देखने-परखने के लिए वैचारिक, राजनीतिक एवं सामाजिक चिंताओं जैसे उसके बाहरी संदर्भों के साथ-साथ बनावट-बुनावट एवं उसके अंतर्लोक में प्रवेश का प्रयास भी आलोचना में होना चाहिए. आई ए रिचड्‌र्स के ज़माने से शुरू हुई टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म छिटपुट प्रयत्नों के अलावा गहरी कोशिश कहीं नहीं दिख रही है.

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जहां चाह, वहां राह

एक अच्छी कोशिश हमेशा प्रशंसनीय होती है, लेकिन जब ऐसी कोई कोशिश नए और संसाधनों का अभाव झेलने वाले लोग करते हैं तो वे दो-चार अच्छे शब्दों और शाबाशी के हक़दार ख़ुद-बख़ुद हो जाते हैं. त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका समसामयिक सृजन इसकी मिसाल है.

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