सहकारी बैंक और वित्तीय समावेशन

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2012 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है. यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का सहकारिता के क्षेत्र में बहुत अहम योगदान रहा है. इसने कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए जिस तरह से सहकारी बैंकों का उपयोग किया है, वह सरहानीय है. इसने न केवल सैद्धांतिक तौर पर सहकारी बैंकों की भूमिका को माना है, बल्कि इसे लागू करने के लिए भी महत्वपूर्ण क़दम उठाया है.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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सहकारी बैंक प्रकरणः अपने ही चक्रव्‍यूह में फंसी राकापा

रिज़र्व बैंक ने महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के संचालक मंडल को बर्खास्त कर प्रशासक नियुक्त करने का आदेश क्या दिया, राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया. राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं का एकाएक रक्तचाप बढ़ गया और दम फूलने लगा. राकांपा में हड़बड़ाहट सा़फ देखी गई और वह बचाव की मुद्रा में खड़ी नज़र आई.

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विंध्‍य हर्बल सफल सहकारी संस्‍था

सरकारी प्रयासों से जनकल्याण के काम बिना रुकावट पूरे होते रहें, यह लगभग असंभव बात मानी जाती है. पर जब आप मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के द्वारा बनाई गई विंध्य हर्बल संस्था के कामकाज को देखेंगे तो मानेंगे कि जनकल्याण के लिए सरकारी प्रयासों की कमी नहीं है. विंध्य हर्बल संस्था प्रदेश स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेदिक औषधियों से संबंधित संग्रहण, उत्पादन, शोधन, दवा निर्माण एवं उसकी बिक्री का काम करती है.

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