भारत का रवैया चीन के प्रति हमेशा दोस्ताना रहा है. भारत की हमेशा यही कोशिश रही है कि चीन के साथ उसके संबंध अच्छे हों. इसके लिए वह शुरू से ही सकारात्मक प्रयास करता रहा है, लेकिन चीन एक तऱफ तो भारत को अपना मित्र बताता है, वहीं दूसरी तऱफ उसकी हरकतें ऐसी होती हैं कि किसी भी तरह उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता.
Tags: China, India, Trust, court, diplomatic, military, respect, चीन, न्यायालय, भारत, राजनयिक, विश्वास, संबंध, सैनिक Posted in कानून और व्यवस्था, जरुर पढें, राजनीति, विदेश, विधि-न्याय, समाज by Author: राजीव कुमार | No Comments » | Read More... |
फ्लायड मेवैदर आजकल अपनी गर्लफ्रेंड से बॉक्सिंग पर उतारू हैं. वर्ल्ड बॉक्सिंग काउंसिल वेल्टरवेट चैंपियन फ्लायड मेवैदर को पिछले दिनों लास वेगास की एक अदालत ने अपनी पूर्व गर्लफ्रेंड पर हमला करने के आरोप में तीन महीने कैद की सज़ा सुनाई है.
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कई बार लोक सूचना अधिकारी किसी आरटीआई आवेदन के जवाब में कहता है कि फलां सूचना तीसरे पक्ष से जुड़ी है, इसलिए आपको नहीं दी जा सकती या मामला अदालत में विचाराधीन है या फिर अमुक सूचना सार्वजनिक करने से संसद की अवमानना होगी
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सत्यमेव जयते. आख़िरकार दस साल पुराने एक मामले में बीते 2 सितंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से यही साबित हुआ. ऊंचा रसूख, ऊंचे अधिकारी, ऊंचे वकील. फिर भी झूठ और भ्रष्टाचार हार गया.
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बार-बार कहने के बावजूद सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है. सरकार से मतलब सिर्फ मंत्री नहीं, बल्कि सरकार से मतलब पूरा सिस्टम, दारोगा से लेकर गृह सचिव तक. ये सब नशे की गोली खाकर सो रहे हैं और देश हर दूसरे-तीसरे महीने खतरे का सामना कर रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट में तीन महीने के भीतर हुआ दूसरा बम धमाका हमारे सिस्टम के खोखलेपन और सबसे अंत में प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के नकारेपन को चीख-चीखकर बयान कर रहा है.
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Rahul Gandhi on Lokpal – II
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गत दिनों राजस्थान में दारा सिंह की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे का प्रयोग करते हुए कहा है कि फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिस वालों को फांसी पर लटका देना चाहिए. दारा सिंह एक संदिग्ध डाकू था, जिसकी राजस्थान पुलिस ने 23 अक्टूबर को एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी थी.
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न्यायालयों में न्याय होता है. कहा जाता है न्याय तो अंधा है, उसके लिए धनी-निर्धन सब बराबर हैं. न्याय के सामने किसी में भेदभाव नहीं होगा, पर वस्तुतः क्या यह सत्य है? पुस्तकों में जो भी क़ानून हैं वे ज़रूर सारे देश के लिए समान रूप से लागू हैं, पर उनका संचालन या नियमन किस ढंग से होता है, ज़रा ग़ौर कीजिए.
Tags: barrister, court, courts, discrimination, part, rich, कचहरी, धनी, न्यायालय, बैरिस्टर, भेदभाव, हिस्सा Posted in आर्थिक, जरुर पढें by Author: महावीर प्रसाद आर मोरारका | No Comments » | Read More... |
मुंबई हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस सी धर्माधिकारी ने सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटिल के होश उड़ा दिए हैं. स़िर्फ हर्षवर्धन पाटिल ही ऐसे मंत्री नही हैं. अगर आप मंत्रियों के वातानुकूलित कक्ष के पास से गुजरें तो आपको हर जगह एक जैसा अनुभव होगा. अधिकतर मंत्री विलासी प्रवृत्ति के होते हैं. उनकी इस प्रवृत्ति से आम आदमी अचंभित और हैरान-परेशान होता है, परंतु सत्ताधीशों को इस संदर्भ में कोई अफसोस नहीं होता.
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जमीन वह संपत्ति है, जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को बस हस्तांतरित करती है यानी कोई इसका मालिक नहीं होता. हां, केयर टेकर कह सकते हैं. ज़मीन और किसान के बीच कुछ ऐसा ही संबंध था. लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में उदारीकरण और निजीकरण की आंधी आने के साथ ही ज़मीन और किसान के इस सनातन संबंध को कमज़ोर बनाने का प्रयास किया जाने लगा, जो सरकार, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगपतियों की साठगांठ का नतीजा था.
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आज भारत की न्यायपालिका को किन बीमारियों ने जकड़ रखा है, यह एक कठिन विषय है. सीधे-सीधे इसका जवाब हां या ना में देना संभव नहीं है. आज ज़रूरत है सच्चाई से रूबरू होने और उसका सामना करने की. न्यायपालिका का ट्रैक रिकॉर्ड या इतिहास आज़ादी के बाद से आज तक बहुत ही गौरवशाली है.
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भारत की न्यायपालिका पर काम का बोझ बहुत है, जिसकी वजह से बहुत सारी परेशानियों ने जन्म लिया है. आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इसका तोड़ निकालें. साथ ही ज़रूरत है कुछ और विषयों पर सोचने की, जैसे उच्च स्तर पर न्यायपालिका में पारदर्शिता. इसी से जुड़ा हुआ मुद्दा है न्यायपालिका की जवाबदेही का.
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जनता भोली होती है, बेवक़ू़फ नहीं |
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