जश्न-ए-रेख्ता : उर्दू पुनरुत्थान आंदोलन में मील का पत्थर है

उर्दू का जश्न मनाने के लिए आयोजित तीन दिवसीय जश्न-ए-रेख्ता के समापन पर प्रतिभागी इतने प्रभावित हुए कि उन्हें लगा

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पुस्तक समीक्षा हिचकी : नए साहित्यिक सृजन की ओर एक क़दम

पिछले दिनों नोएडा में एक भव्य कार्यक्रम में कला, साहित्य, संस्कृति और मानविकी को समर्पित एक नई हिंदी मासिक पत्रिका

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पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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वजूद खो रही है भाषाएं

जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे ब़डा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब

गंगा की निर्मलता तभी संभव है, जब गंगा को अविरल बहने दिया जाए. यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है, लेकिन गंगा की स़फाई के नाम पर पिछले 20 सालों में हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए और नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला. एक ओर स़फाई के नाम पर पैसों की लूटखसोट चलती रही और दूसरी ओर गंगा पर बांध बना-बनाकर उसके प्रवाह को थामने की साजिश होती रही.

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मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है

हर भाषा की अपनी अहमियत होती है. फिर भी मातृभाषा हमें सबसे प्यारी है. क्योंकि उसी ज़ुबान में हम बोलना सीखते हैं. बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है. इसलिए भी मातृभाषा हमें सबसे ज़्यादा प्रिय है. लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िंदगी बसर करते हैं यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को तुच्छ समझते हैं.

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संबित त्रिपाठी और संजय कुमार निदेशक बने

1998 बैच के आईआरएस (आईटी) अधिकारी संबित त्रिपाठी को जहाज रानी मंत्रालय में निदेशक बनाया जाएगा. वह विशाल गगन की जगह लेंगे, जिन्हें पर्यटन मंत्रालय भेजा गया है.

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स्त्री विमर्श की बदमाश कंपनी

हिंदी में स्त्री विमर्श का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. हिंदी साहित्य में माना जाता है कि राजेंद्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस में स्त्री विमर्श की गंभीर शुरुआत की थी. दरअसल स्त्री विमर्श पश्चिमी देशों से आयातित एक कांसेप्ट है, जिसे राजेंद्र यादव ने भारत में झटक लिया और खूब शोर शराबा मचाकर स्त्री विमर्श के सबसे बड़े पैरोकार के तौर पर अपने आपको स्थापित कर लिया.

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दान का महत्व

एक बार शिरडी के साई बाबा से उनकी परमभक्तलक्ष्मी ने पूछा, बाबा द्वारका माई में हर समय धूनी जलती रहती है. सुबह-शाम ग़रीबों की भूख मिटाती यह रसोई क्या आपके लिए दो रोटी नहीं दे सकती?

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झीनी-झीनी बीनी नहीं, फटी चदरिया

बुनकर! स़िर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि प्रतीक भारतीयता का, मिट्टी की सोंधी महक का. स्वतंत्रता सेनानियों ने करघा के आसरे क्रांति का ख्वाब देखा और स्वतंत्रता प्राप्ति की तऱफ अग्रसर हुए. स्वतंत्र तो हम हुए, परंतु करघा दम तोड़ता गया. कपास से कपड़े तक के सफर में करघे पर ज़िंदगियां दम तोड़ती नज़र आती हैं. सिलसिला बदस्तूर जारी है. विकास और आधुनिकता की अंधी दौड़ के चलते हमने करघा, बुनकरों और खादी को लगभग बिसार दिया है.

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शेखावाटी उत्सव 2012 राजस्थानी संस्कृति को संजोने का प्रयास

भारत विभिन्न संस्कृतियों एवं परंपराओं का देश है. यही विशेषता इसे दुनिया के अन्य देशों से अलग पहचान दिलाती है, लेकिन इस समय दुनिया में जितनी तेज़ी से परिवर्तन देखने को मिल रहा है, उसमें प्राचीन संस्कृतियों को बरक़रार रख पाना का़फी मुश्किल होता जा रहा है. हालांकि ऐसा नहीं है कि हमने नई चीज़ों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है.

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राजनीति, बीयर और…

यह शोध संस्कृति से जुड़ा है. प्राचीन मेसोपोटामियाई सभ्यता के लोगों की दैनिक गतिविधियों में सेक्स, राजनीति और बीयर पीना उच्च प्राथमिकता के विषय थे.

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अमेरिका : मार्ग से भटकते नागरिक

संयुक्त राज्य अमेरिका की संस्कृति को मेल्टिंग पॉट संस्कृति कहा जाता है. मतलब यह कि वहां रहने वाले लोग चाहे किसी देश, समुदाय, धर्म या क्षेत्र से आए हों, लेकिन अमेरिका आने के बाद उन्हें उसी संस्कृति का हिस्सा बनकर रहना पड़ेगा, जिसे अमेरिका ने स्वीकार किया है.

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समाज अपनी खामियों को पहचाने

हमें अपने भारतीय पारिवारिक मूल्यों पर गर्व होता है. अपने पारिवारिक मूल्यों को हम अन्य संस्कृतियों के पारिवारिक मूल्यों से श्रेष्ठ समझते हैं. अगर किसी से स्वर्ग के बारे में पूछा जाए तो वह कहेगा कि वैसा जीवन, जिसमें ब्रिटिश घर हो, अमेरिकी वेतन हो, चाइनीज खाना हो और भारतीय परिवार हो, स्वर्ग कहा जा सकता है.

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राष्ट्रीय शहरी सड़क विक्रेता नीति 2009 : सिर्फ़ क़ानून बनाने से काम नहीं चलेगा

पिछले कई वर्षों से फुटपाथों, पार्कों और सब-वे जैसे सार्वजनिक स्थलों पर सामान बेचने वाले विक्रेताओं की पहुंच सही उपभोक्ताओं तक न हो पाने का मामला दुनिया भर के बड़े शहरों में विवादग्रस्त बन गया है.

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रंगों की कहानी रंगों की ज़ुबानी

मानव सभ्यता में रंगों का का़फी महत्व रहा है. हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया. दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है. कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया.

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‘सांस्‍कृतिक क्रांति’ पर बवाल

चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कुछ दिनों पहले मैंने बिहार सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय की कॉफी टेबल बुक-बिहार विहार के बहाने सूबे में सांस्कृतिक संगठनों की सक्रियता, उसमें आ रहे बदलाव और सरकारी स्तर पर उसके प्रयासों की चर्चा की थी.

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बिहार में सांस्कृतिक क्रांति

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि विद्रोह, क्रांति या बग़ावत कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका विस्फोट अचानक होता है. घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है. दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृहराज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती हैं.

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भारत की संस्कृत-उर्दू सभ्यता

यह प्रवासियों का देश है. 92 फीसदी लोग जो आज यहां रह रहे हैं, उनके पुरखे विदेश से आए थे. हम सबके पुरखे विदेश से आए थे. हमारे देश में लोग पिछले दस हजार साल से आते रहे हैं. क्यों आते जा रहे हैं? यहां के लोग नहीं जाते थे बाहर. आधुनिक मशीनीकरण के आने के पहले कृषि प्रधान समाज होता था तो खेती के लिए जो चाहिए था, जैसे समतल उपजाऊ ज़मीन और पानी, वह यहां इफरात में था.

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जन आस्था का केंद्र

दून के संस्थापक श्रीगुरु राम राय जी का पदार्पण तीन सौ वर्ष पूर्व हुआ. सन्‌ 1676 में गुरु महाराज उत्तराखंड की पावन भूमि देहरादून आए. इन दिनों दुर्गम मार्ग से होकर संत समाज को यहां आने के लिए कंटीले मार्ग से आना पड़ा.

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एक और अयोध्‍या

भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पूरे विश्व में गौरवपूर्ण स्थान हासिल है. संसार ने हमारे प्राचीन महाकाव्यों, पुराणों एवं ग्रंथों का लोहा माना है. विश्व के कई देशों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति का अनुकरण किया है. दक्षिण पूर्व एशिया स्थित देश थाइलैंड भी प्रभु श्रीराम के जीवन से प्रेरित है.

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पुरानी बांसुरी खोलेगी राज़

आमतौर पर दुनिया भर के खोजकर्ता ऐसी चीजों की खोज करते रहते हैं, जिनसे पुरानी संस्कृतियों-सभ्यताओं के मूल का पता चलता है. जर्मनी में खोजकर्ताओं ने एक लगभग 35 हज़ार साल पुरानी बांसुरी खोज निकाली है. उनका कहना है कि यह दुनिया का पहला संगीत यंत्र हो सकता है.

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शेखावाटी की आधी आबादी घूंघट विकास में बाधा नहीं

राजस्थान अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है. यह परंपरा और संस्कृति आज भी यहां की ग्रामीण महिलाओं एवं युवतियों की बदौलत ज़िंदा है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पर्दा और परंपरा के आगे इनके सपनों का कोई मोल नहीं है. नवलगढ़ तहसील के एक गांव सिंहासन का ही उदाहरण लीजिए, मीनाक्षी कंवर नामक युवती घूंघट में तो है, लेकिन लैपटॉप पर उसकी उंगलियां बेहिचक चल रही हैं.

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