उनका यक़ीन है कि वे मुझे चुप करा सकते हैं, मगर यहां तक कि अगर कल मैं मर जाता हूं तो कब्र से भी आवाज़ दूंगा. मुझे जिस विचार पर विश्वास है, उसका त्याग मैं इतनी आसानी से नहीं करूंगा. मैं पूरी ताक़त से आवाज़ दूंगा, जगो जगो! केवल तुम्हीं हो, जिसमें एक बेहतर गोरखालैंड बनाने की ताक़त है.
हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.
गोरखा जन मुक्ति मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग अपने आंदोलन को गांधीवादी करार देते हैं, पर ज़रूरत पड़ने पर वह सुभाषपंथी होने में देर नहीं करते. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार दिखा है. पहाड़ पर चलने वाले वाहनों में गोरखालैंड की नंबर प्लेट लगाने, अपने इलाक़े में समानांतर पुलिस व्यवस्था बहाल करने और हाल में [...]
कोई भी शासन करे, उसे समझ लेना चाहिए कि समस्याओं को टालना ख़तरनाक होता है. तेलंगाना एक ऐसी ही समस्या है. इससे पहले जब भाजपा ने छत्तीसग़ढ, झारखंड और उत्तरांचल बनाए थे, तभी लगने लगा था कि राज्यों के बंटवारे की मांग उठेगी और मज़बूती से उठेगी.
गोरखालैंड के मसले पर 2008 से कुल चार दौर की बातचीत हो चुकी है, पर गतिरोध जस का तस है. दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल पंगु बनी हुई है. इलाक़े को छठीं अनुसूची में शामिल करने की पहल विमल गुरुंग ने बहुत पहले ही ठुकरा दी और गोरखालैंड राज्य बनाने के विरोध में बंगाल के सभी बड़े दल उतर आए हैं.