रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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गुजरात जीतने को कांग्रेस बेकरार

इस साल के अंत में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए राज्य की हर राजनीतिक पार्टी कमर कस चुकी है. एक ओर जहां सत्तारूढ़ भाजपा से अलग होकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी नामक अपनी अलग पार्टी बनाकर वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी भी गुजरात का गढ़ जीतने के लिए कोई कोताही नहीं बरत रही है.

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भारत-पाकिस्तान : अमन क़ायम करने की मुहिम

इस समय पाकिस्तान पर फौजी हुकूमत द्वारा सत्ता पलट के साये बुरी तरह मंडरा रहे हैं. पाकिस्तान क्या अपने देश में लोकतंत्र की बलि चढ़ाएगा, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. पिछले दिनों पाकिस्तान-इंडिया फोरम फोर पीस एंड डेमोक्रेसी द्वारा दोनों देशों की जनता के प्रतिनिधियों ने अमन और दोस्ती का पैग़ाम देते हुए एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया.

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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का इन पांच राज्यों में न घूमना शुभ संकेत है. शुभ संकेत इसलिए है, क्योंकि अन्ना हजारे की भाषा कांग्रेस विरोधी थी और बाबा रामदेव तो कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालने का ही काम कर रहे थे. इससे ये जनता की शक्ति के प्रतीक न बने रहकर कांग्रेस पार्टी की विरोधी ताक़त के प्रतीक बन रहे थे. इन्होंने कभी जनता की ताक़त, खराब होते लोकतंत्र, खराब होते चुनाव और आशाएं तोड़ते नेताओं को अपना निशाना नहीं बनाया.

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पश्चिम बंगालः वाममोर्चा की विदाई आसान नहीं

यह एक महज़ संयोग नहीं था कि जिस दिन बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे, ठीक उसी दिन बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने राज्य में पंचायतों की 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया. तमाम झिझक के बावजूद बांग्ला मीडिया के एक हलके में इस बात पर चर्चा हुई कि कामयाबी का बिहार मॉडल बंगाल में भी कारगर हो सकता है.

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असमः मंत्रियों की संप‍त्ति की घोषणा पर सवाल

बीती 14 जनवरी को असम सरकार ने अपनी वेबसाइट पर राज्य के सभी मंत्रियों की संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक कर दिया. काफी समय पहले असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने वादा किया था कि वह और उनके मंत्रिमंडल के सभी सहयोगी अपनी-अपनी संपत्ति की घोषणा करेंगे, लेकिन कई बार समय सीमा तय करने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका.

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सरकारी घोषणाएं कहां और क्यों गुम हो जाती हैं?

आमतौर पर एक सरकार जनता की सुविधाओं के लिए कोई योजना बनाती है या उसकी घोषणा करती है और बाद की कोई सरकार आकर उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल देती है. इसके अलावा कई मौक़ों पर (ख़ासकर किसी आपदा के व़क्त) सरकार की तऱफ से मदद की घोषणा की जाती है, लेकिन व़क्त बीतने के साथ ही वह अपना वायदा भूल जाती है.

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