कहा जाता है कि क्रांति अपने पुत्रों को निगल जाती है. क्या मिस्र में कुछ ऐसा ही होने वाला है? जिन लोगों ने देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना क़ीमती समय ख़र्च किया, संसाधन लगाए और होस्नी मुबारक को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया, आज उन्हीं के साथ फिर से अन्याय किया जा रहा है.
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एक बार फिर लोकपाल विधेयक को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. मानों यह एक पहेली बन गया हो. पहले सरकार को खुदरा बाज़ार में एफडीआई पर पीछे लौटना पड़ा और अब लगता है कि उसे पेंशन और कंपनी बिल के मामलों में भी ऐसा ही करना पड़ेगा. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ख़ुद अपने ही निर्णय में उलझ गई हो, कैद हो गई हो.
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लोकतंत्र की जन्मभूमि ग्रीस में पिछले दिनों इसके साथ मज़ाक़ हुआ. लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रु को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया गया. पापेंद्रु ग्रीस की समाजवादी पार्टी पासोक के नेता हैं तथा उनके पिता और दादा ग्रीस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.
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जब हमने समाज में सुधार के लिए संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार कर लिया है तो फिर इसके लिए किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी करने की आवश्यकता नहीं है. हमें सांसदों और विधायकों की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार प्रयास करना है, जिससे शासन की गुणवत्ता में सुधार होगा.
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वर्तमान समय में देश का ध्यान समाज के कुछ तबकों के बीच की विषमता और उनके गुस्से को कम करने की ओर होना चाहिए. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन यहां लोकतंत्र का मतलब केवल प्रत्येक पांच सालों के बाद होने वाला चुनाव रह गया है, जिसमें मतदाता भाग लेते हैं और अपना मत डालते हैं.
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वर्ष 2010-11 दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली की समृद्धि के लिए हुई क्रांतियों का गवाह रहा है. इस दरम्यान न सिर्फ आंदोलनकारी चर्चा में रहे, बल्कि कथित तानाशाह शासक भी. चीन में भी लोकतंत्र की बहाली के लिए जमीन तैयार की जा रही है.
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भारतीय जनता पार्टी अपना तर्क रखे और प्रशांत भूषण न रखें. हमारा मानना है कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र को उसके बुरे पहलुओं के जाल में मत फंसने दीजिए. हिंदुस्तान का लोकतंत्र सारी दुनिया में आदर्श लोकतंत्र है. यह ज़िम्मेदारी है स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली एवं राजनाथ सिंह जैसे लोगों की.
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अन्ना हजारे मूल बातें कहते हैं, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान उनसे बहस नहीं कर सकते. सांसद सेवक हैं और देश की जनता मालिक है. अगर सेवक मालिक की बात न माने तो मालिक को यह हक़ है कि वह उसे बाहर कर दे. यही दलील अन्ना हजारे की है. देश को भ्रष्ट सांसदों से छुटकारा दिलाने के लिए राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम आंदोलन करने वाली है.
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक मंत्रिमंडलीय साथी से कहा कि अन्ना बदमाश हैं और उनके साथी बदमाशी कर रहे हैं. आम तौर पर मनमोहन सिंह इस भाषा के लिए जाने नहीं जाते, लेकिन शायद देश में चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन का दबाव इतना था कि वह भाषा की शालीनता भूल गए. उसी तरह, जैसे मनीष तिवारी उम्र और राजनैतिक शिष्टाचार के सामान्य नियम भूलकर अन्ना हजारे को तुम और भ्रष्टाचार में लिप्त बता बैठे.
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क्या कहें, अपना माथा पीटें, भगवान को, अल्लाह को, गॉड को दोष दें, किस पर अपनी खीज निकालें? सीएजी की रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में क्या नहीं है! देखने पर लगता है कि हम जिस देश में रह रहे हैं, उसमें ईमानदार प्रबंधन नाम की कोई चीज ही नहीं बची है. यह टू जी स्पेक्ट्रम का मसला नहीं है, जिसमें प्रधानमंत्री जी ने कह दिया कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. लोग उनको धमकाते रहे. उनके मंत्री ही उनको धमकाते रहे. प्रधानमंत्री खामोश रहे.
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विकेंद्रीकरण संघीय व्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन पाकिस्तान में तो विकेंद्रीरण कहीं दिखता ही नहीं है. सवाल यह है कि क्या राज्य सभी शक्तियां अपने पास रखने का अधिकारी है और वह स्थानीय निकायों को कोई भी अधिकार देना अस्वीकार कर सकता है? 18वें संविधान संशोधन के अनुसार, अनुच्छेद 270-एए का क्लॉज-1 लोकल गवर्नमेंट ऑर्डिनेंस 2001 को निरस्त करता है.
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जनता भोली होती है, बेवक़ू़फ नहीं |
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