भारत: लोकतंत्र की आशा का वैश्विक अग्रदूत

नेशनल कॉन्सिल ऑफ एशियन इंडियन एसोसिएशन (एनसीएआईए) के सभी सदस्यों और मेहमानों के साथ भारत के स्वतंत्रता दिवस का जश्न

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देश बचाइए, लोकतंत्र बचाइए, संविधान बचाइए

चुनाव किसने जीता, कौन हारा, मेरे लिए ये महत्वपूर्ण नहीं है. लोकतंत्र में हर पांच साल पर ये प्रक्रिया दोहराई

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इस चुनावी शोर में लोकतंत्र खो गया है

चुनाव बीत गए, लेकिन चुनाव की कड़वी यादें हमें बहुत दिनों तक परेशान करती रहेंगी. भारत में चुनाव पहले लोकतांत्रिक

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नेहरू नहीं होते तो कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होता

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद में नेहरू मेमोरियल म्यूजियम में एक समारोह का आयोजन हुआ. विषय की गंभीरता को देखते

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सांसदों के प्रति यह दोहरा मापदंड क्यों

इन दिनों सांसदों के वेतन-भत्तों को बढ़ाने के प्रस्ताव के ऊपर संपूर्ण मीडिया में शोर मचा हुआ है. मीडिया का

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अभिव्यक्ति की आज़ादी की राजनीति

कन्नड़ के साहित्यकार प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद दक्षिण भारत, खासकर कर्नाटक में साहित्यिक विवाद लगातार गहराता जा रहा

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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हमें किस हवा के साथ बहना चाहिए?

दुनिया में बहुत सारे देश हैं, जिनमें सरकार, पुलिस, सेना और अदालत एक तरह से सोचते हैं, एक तरह से फैसला लेते हैं और मिलजुल कर देश की संपदा और जनता पर राज करते हैं, लेकिन बहुत सारे देश ऐसे हैं, जहां एक-दूसरे के फैसलों के ऊपर गुण-दोष के आधार पर यह तय होता है कि एक पक्ष दूसरे का साथ दे या न दे.

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यूपीए-2 के तीन साल : सत्ता के संवेदनहीन होने की कहानी

22 मई की रात. तीन साल पूरे होने के अवसर पर यूपीए-2 सरकार ने एक डिनर पार्टी का आयोजन किया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत सारे महत्वपूर्ण नेता इस पार्टी में शामिल थे. उसी दिन सुबह एक खबर आई थी, हुबली-बंगलुरु एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से 25 लोगों की मौत हो गई. लेकिन सुबह की उस दुर्घटना का रात की डिनर पार्टी पर कोई असर नहीं था.

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शिकागो सम्मेलन और अफ़ग़ान मुद्दा

वर्ष 2014 तक अ़फग़ानिस्तान से नाटो सेना की वापसी हो जाएगी, लेकिन इसके बाद भी नाटो अ़फग़ानिस्तान को सहायता देता रहेगा, ताकि वहां लोकतंत्र मज़बूत हो सके और तालिबान का शासन फिर से स्थापित न हो पाए. हाल में अमेरिकी शहर शिकागो में हुई नाटो की बैठक का मुख्य मुद्दा अ़फग़ानिस्तान से नाटो सेना की वापसी ही रहा.

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भारत-म्यांमार : रिश्तों को बेहतर बनाने की ज़रूरत

म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के प्रयास शुरू होने के साथ ही अमेरिका-यूरोप ने उसके संबंध में अपनी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. अमेरिका की ओर से उस पर आर्थिक प्रतिबंधों में ढिलाई देने का बयान आने लगा है. हिलेरी क्लिंटन ने म्यांमार यात्रा के दौरान इसका संकेत भी दे दिया है.

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हमारे सांसदों को इतनी इज़्ज़त क्यों चाहिए

बीते एक मई को द डेली मेल के एक पत्रकार क्वेनटीन लेट्‌स ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस के स्पीकर के बारे में एक टिप्पणी की. उन्होंने स्पीकर बेरकाऊ की तुलना एक कार्टून करेक्टर मटले से की, जो हमेशा कंफ्यूज्ड रहता था, जिसके कारण वह कभी सफल नहीं हो पाता था. इसी तरह कुछ साल पहले मैथ्यू पेरिस ने द टाइम्स में पार्लियामेंट्री स्केच नामक कॉलम शुरू किया था.

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युवा भ्रष्‍टाचार को लेकर चिंतित हैं

देश का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि युवा वर्ग हमेशा से अपने हक़ के लिए ल़डता रहा है. संचार के इस युग में भी युवाओं में इस लक्षण को देखा जा रहा है. दुनिया एक प्लेटफॉर्म तक सीमित होकर रह गई है, जहां से सूचनाओं का संचार व्यापक स्तर पर हो रहा है.

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संसद को अरविंद केजरीवाल का जवाब

मुझे आपकी तऱफ से श्री राजनीति प्रसाद एवं प्रोफेसर रामकृपाल यादव द्वारा प्रेषित नोटिस प्राप्त हुए हैं, जिनमें मुझ पर यह आरोप लगाया गया है कि मैंने संसद का अपमान किया है. मैं इस बात का पूरी तरह से खंडन करता हूं कि मैंने अपने शब्दों या किसी कार्य से संसद का अपमान किया है. मैं संसद की बहुत इज़्ज़त करता हूं, संसद का बहुत सम्मान करता हूं, मैं संसद को जनतंत्र के मंदिर की तरह मानता हूं.

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पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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भारत-पाकिस्तान : अमन क़ायम करने की मुहिम

इस समय पाकिस्तान पर फौजी हुकूमत द्वारा सत्ता पलट के साये बुरी तरह मंडरा रहे हैं. पाकिस्तान क्या अपने देश में लोकतंत्र की बलि चढ़ाएगा, यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा. पिछले दिनों पाकिस्तान-इंडिया फोरम फोर पीस एंड डेमोक्रेसी द्वारा दोनों देशों की जनता के प्रतिनिधियों ने अमन और दोस्ती का पैग़ाम देते हुए एक संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया.

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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्र की गरिमा को पुनर्स्थापित किया

एक बार फिर उच्चतम न्यायालय ने देश की प्रतिष्ठा बचाई और उसका मान रखा. जहां एक तऱफ देश की कार्यपालिका भ्रष्ट मंत्रियों के ख़िला़फ कार्रवाई करने में असफल रही, वहीं एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सम्मान को बचाया और उसकी गरिमा को पुनर्स्थापित किया. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी के सभी लाइसेंस निरस्त कर दिए. सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह बुद्धिमानी का परिचय देते हुए निष्पक्षता दिखाई, वह इस देश के लोकतंत्र के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है.

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राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र को मज़ाक़ बना दिया

उत्तर प्रदेश के चुनाव में या फिर सभी पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है कि हम लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील हैं भी या नहीं. चुनाव के व़क्त सभी पार्टियां अपना अच्छा चेहरा जनता के पास लाती हैं. अच्छा चेहरा लाने का मतलब होता है उनका घोषणापत्र, जिसमें वे झूठे ही सही, लेकिन वायदे करती हैं. उन वायदों में जहां एक तरफ आम लोगों को यह बताया जाता है कि पार्टी उनके लिए क्या करने वाली है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी यह भी दर्शाती है कि वह लोगों के प्रति कितनी ईमानदार और संवेदनशील है.

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विवाद में फंसी पाकिस्तान सरकार

पाकिस्तान और विवाद का चोली दामन का रिश्ता है. कभी उसे आतंकवाद को समर्थन देने के आरोपों का सामना करना पड़ता है, तो कभी सेना और सरकार के बीच के तनाव के कारण लोकतंत्र ही खतरे में पड़ता मालूम होता है. मेमोगेट का मामला अभी चल ही रहा है कि सरकार को एक अन्य मामले का सामना करना पड़ गया है.

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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का इन पांच राज्यों में न घूमना शुभ संकेत है. शुभ संकेत इसलिए है, क्योंकि अन्ना हजारे की भाषा कांग्रेस विरोधी थी और बाबा रामदेव तो कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालने का ही काम कर रहे थे. इससे ये जनता की शक्ति के प्रतीक न बने रहकर कांग्रेस पार्टी की विरोधी ताक़त के प्रतीक बन रहे थे. इन्होंने कभी जनता की ताक़त, खराब होते लोकतंत्र, खराब होते चुनाव और आशाएं तोड़ते नेताओं को अपना निशाना नहीं बनाया.

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मिस्र : मार्शल तांतवी का तांडव

कहा जाता है कि क्रांति अपने पुत्रों को निगल जाती है. क्या मिस्र में कुछ ऐसा ही होने वाला है? जिन लोगों ने देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना क़ीमती समय ख़र्च किया, संसाधन लगाए और होस्नी मुबारक को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया, आज उन्हीं के साथ फिर से अन्याय किया जा रहा है.

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नई संसद लोकपाल बिल पास करे

एक बार फिर लोकपाल विधेयक को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. मानों यह एक पहेली बन गया हो. पहले सरकार को खुदरा बाज़ार में एफडीआई पर पीछे लौटना पड़ा और अब लगता है कि उसे पेंशन और कंपनी बिल के मामलों में भी ऐसा ही करना पड़ेगा. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ख़ुद अपने ही निर्णय में उलझ गई हो, कैद हो गई हो.

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मिस्रः यह संकुचित लोकतंत्र है

मिस्र में संसदीय चुनाव शुरू हो गए हैं. तीन चरणों में होने वाले ये चुनाव जनवरी तक चलेंगे. प्रथम चरण के चुनाव संपन्न हो चुके हैं और उनके नतीजे भी आ चुके हैं. जो नतीजे सामने आए हैं, उन पर कई प्रश्न उठाए जा सकते हैं.

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