झारखंड: रेल परियोजनाओं की कछुआ चाल

खनिज संसाधनों के मामले में देश के सबसे धनी सूबे झारखंड में शायद ही ऐसी कोई योजना है, जो समय पर पूरी हुई हो. एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाने वाली योजनाएं 3 से लेकर 5 साल तक खिंच जाती हैं. योजना के लिए प्राक्कलित राशि भी दोगुनी से तीन गुनी हो जाती है. राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त एवं भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी, असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप और शासन में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारण इस समस्या के मूल में हैं.

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भाजपा और कांग्रेस में रेलवे ट्रैक पर श्रेय की दौड़

ग्‍वालियर से श्योपुर तक चलने वाली छोटी लाईन रेल को बड़ी लाईन में किसने परिवर्तित करवाया, इसका श्रेय लेने के लिए इन दिनों कांग्र्रेस और भाजपा के मध्य संघर्ष चल रहा है. भाजपा के नेता इसे अपनी मांग की पूर्ति बताकर विजयी मुद्रा में खड़े हैं, तो वहीं क्षेत्र के प्रभावशाली केंद्रीय मंत्री सिंधिया भी अन्य केंद्रीय मंत्रियों से अपनी वाहवाही का गान करवा रहे है.

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विधायक कोष : आपके विधायक जी ने कितना काम किया?

कोई नेता जब आप से वोट मांगने आता है तो क्या कहता है? वह कहता है कि आप उसे वोट दें ताकि वह आने वाले पांच सालों तक आपकी सेवा करता रहे. मतलब, जनता मालिक और नेता सेवक. लेकिन चुनाव जीतने के बाद क्या होता है? क्या आपको यह पता चलता है कि विधायक जी को स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए जो करोड़ों रुपये सरकार की तऱफ से मिलते हैं, वो कहां जाते हैं?

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