सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.
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बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है.
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अभिषेक मनु सिंघवी, कांग्रेस के प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं. इससे भी बड़ा परिचय उनका यह है कि वह सांसद हैं. ऐसे-वैसे सांसद नहीं, बल्कि संसद की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन हैं. वह देश में क़ानून बनाने की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली केंद्र हैं.
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भारत में जैसे ही कोई मुद्दा उठता है, लोग उसे ज्वलंत की संज्ञा प्रदान कर देते हैं. भारतीय न्याय व्यवस्था क्या है, इस बात पर आराम से बैठकर धैर्यपूर्वक चर्चा होनी चाहिए. मैं लोगों और खासकर न्यायाधीशों से कहना चाहता हूं कि भारतीय न्यायपालिका किसी भी ऐसी बीमारी से ग्रस्त नहीं है, जिसे लाइलाज कहा जा सकता है.
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हिमाचल प्रदेश में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीषा श्रीधर पर लगे अवज्ञा के आरोप का मुद्दा इन दिनों यहां के बाबुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. राज्य सरकार ने 1984 बैच की इस अधिकारी के खिला़फ जांच शुरू कर दी है.
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केंद्र सरकार की मनमानी ने दिल्ली सरकार को परेशान कर दिया है. इसमें बाबुओं के तबादले से जुड़े मामले भी शामिल हैं. हाल में दिल्ली सरकार के चार बाबुओं के तबादले से तो ऐसा ही लगा. ये चारों बाबू का़फी महत्वपूर्ण पदों पर थे. इससे मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का़फी परेशान हो गईं.
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में 30 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया. आशंकाओं के विपरीत उस दिन और उसके बाद देश में कहीं हिंसा नहीं हुई. इसका श्रेय आमजनों की परिपक्व सोच को जाता है. जहां तक इस निर्णय का सवाल है, यह तीनों पक्षकारों यानी रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा एवं सुन्नी व़क्फ बोर्ड के बीच संतुलन क़ायम करने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है.
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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है |
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