नोटबंदी पर नीतीश की दुविधा

अाठ नवम्बर की जिस रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोटबंदी की घोषणा कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अगली सुबह

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मोदी मंत्रिमंडल में देश का पैसा चुराने वाले

केंद्र सरकार ने नोटबंदी का फैसला काले धन पर लगाम लगाने के लिए नहीं बल्कि आर्थिक नुकसान के कारण हांफ

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इस कलंक से मुक्ति के लिए स़िर्फ क़ानून का़फी नहीं

हाथ से मैला उठाने, उसे सिर पर ढोने या मैनुअल स्केवेंजिंग का घिनौना और अमानवीय कार्य आज भी हमारे देश

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समुंद्री देशों के सफर के गहरे मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दुनियाभर में घूम रहे हैं. विपक्ष इसे समय और धन की बबार्दी कह रहा है तो

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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दवा कंपनियां, डॉक्‍टर और दुकानदार: आखिर इस मर्ज की दवा क्‍या है

दवा, डॉक्टर एवं दुकानदार के प्रति भोली-भाली जनता इतना विश्वास रखती है कि डॉक्टर साहब जितनी फीस मांगते हैं, दुकानदार जितने का बिल बनाता है, को वह बिना किसी लाग-लपेट के अपना घर गिरवी रखकर भी चुकाती है. क्या आप बता सकते हैं कि कोई घर ऐसा है, जहां कोई बीमार नहीं पड़ता, जहां दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती? यानी दवा इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे अधिक है. किसी न किसी रूप में लगभग सभी लोगों को दवा का इस्तेमाल करना पड़ता है, कभी बदन दर्द के नाम पर तो कभी सिर दर्द के नाम पर.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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प्रधानमंत्री विदेशी पूंजी लाएंगे

विदेशी पूंजी निवेश के बारे में पिछली बार सरकार ने फैसला ले लिया था, लेकिन संसद के अंदर यूपीए के सहयोगियों ने ही ऐसा विरोध किया कि सरकार को पीछे हटना पड़ा. खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश का विरोध करने वालों में ममता बनर्जी सबसे आगे रहीं. सरकार ने कमाल कर दिया. भारत दौरे पर आई अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ममता से मिलने सीधे कोलकाता पहुंच गईं.

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आत्‍महत्‍या की कीमत हम सब चुकाते हैं

वर्ष 2006 में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री नवीन जिंदल ने संसद में एक मुद्दा उठाया कि भारतीय छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं की वजह क्या है और सरकार किस तरह आत्महत्या के आंकड़े बढ़ने से रोक सकती है. इसके बाद संसद की तऱफ से कुछ विशेष क़ानून बनाए गए. सबसे पहले तो परीक्षाओं से जुड़ी हेल्पलाइन शुरू की गई, जो परीक्षा से पहले विद्यार्थियों को फोन पर साइकोलॉजिकल एडवाइस देती है.

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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मुद्रास्फीति और बैंकिंग

स्टेट बैंक से किसी भी शहर या क़स्बे में आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकती है. हालांकि अभी तक स्टेट बैंक का संचालन पूर्ण रूप से राष्ट्रीयकरण की पद्धति पर हुआ नहीं है. अब भी सब ओहदेदार ऑफिसर वर्ग या कर्मचारीगण उसी पुराने साम्राज्य के प्यादे ही हैं, जो पूंजीपतियों के अधीन था. अतएव वर्षों से चली आ रही अपनी आदतों को वे सहसा छोड़ नहीं सकते.

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मुद्रा की शक्ति और उसकी मान्यता

भारत को आज़ाद हुए 12 साल बीत गए. इन 12 वर्षों में 5 या 6 वित्त मंत्री बदल चुके हैं. हर मंत्री की मुद्रा नीति भिन्न-भिन्न थी.

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शिरडी साईं बाबा संस्थान में घोटाला

एक मुहावरा है, जहां धन एकत्र होगा, वहां चोर की नज़र पड़ेगी ही. शिरडी के साईं बाबा तो फकीर थे और फकीरी में ही उन्होंने सारा जीवन गुजार दिया. हां, उन्होंने गरीब-लाचार लोगों की मदद करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी.

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शेयर बाज़ार का जुआ

अब मान लीजिए कि आप थोड़े-बहुत जुआरी भी हैं. आप जुए से अत्यंत नफरत करते हों तो भी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के ढांचे को समझने के लिए जुए की जानकारी भी आवश्यक है. शेयर बाज़ार में व्यापार के अलावा एक विशेष खेल खेला जाता है, जिसे सट्टा कहते हैं. इसमें खयाली शेयरों की खयाली क़ीमतें दी-ली जाती हैं.

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पूर्वांचल के बुनकरों का दर्दः रिश्‍ता वोट से, विकास से नहीं

केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.

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बढ़ती जनसंख्या अभिशाप नहीं

आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि जनसंख्या वृद्धि हानिकारक है. इससे किसी भी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है. आर्थिक दृष्टिकोण के सभी पैमाने भी इसी की पुष्टि करते हैं. अर्थशास्त्रियों की परिभाषा का निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या वृद्धि के कारण ही खाद्यान्न की कमी होती है, क्योंकि जिस अनुपात में आबादी में इज़ा़फा होता, उस अनुपात में पैदावार नहीं हो पाती है.

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यह देश के लिए परीक्षा की घड़ी है

जितना हम अनुभव करते हैं, उससे ज़्यादा कठिन दौर से हमारा देश गुज़र रहा है. 1991 में हुए आर्थिक सुधारों ने ढेर सारी संभावनाएं पैदा कीं, जिन्होंने इस बात की उम्मीद बढ़ाई कि देश की आर्थिक विकास दर में वृद्धि होगी. पिछले बीस सालों में बहुत सारी घटनाएं घटीं. आर्थिक विकास दर में लगातार वृद्धि हुई, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले विकास में देखा जा सकता है.

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पूंजी की निर्धारित सीमा

पूंजी संपत्ति पूंजीवाद का मूल स्तंभ है. इसे मिटाना ही होगा. इस श्रेणी में प्रधानत: दो ही संपत्तियों का समावेश होता है- (1) ज़मीन जायदाद, (2) पूंजी. भारत सरकार ने जबसे समाजवादी अर्थव्यवस्था को अपना ध्येय घोषित किया है, प्रथम कक्षा के लिए कई संशोधन हुए हैं, नए क़ानून बने हैं.

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यूपीए का अवसान हो रहा है

भारत में शिशु मृत्यु दर के आंकड़े अच्छे नहीं हैं. हर साल बहुत सारे बच्चे पांच साल की आयु सीमा पार नहीं कर पाते हैं. यही स्थिति भारत सरकार की भी दिखाई पड़ती है. ऐसी कोई भी चुनी हुई सरकार, जिसके समय में आर्थिक विकास की काफी अच्छी संभावनाएं दिखाई दें, वह कम ही अपना कार्यकाल पूरा करने से वंचित रहती है.

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प्रधानमंत्री का मणिपुर दौरा : जनता के ज़ख़्मों पर विकास का मरहम

बीते एक अगस्त से मणिपुर के दोनों राष्ट्रीय राजमार्गों (एनएच-39 एवं 53) पर यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने आर्थिक नाकेबंदी कर रखी थी. इस 100 दिनों की बंदी ने यहां के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया. हर वस्तु के दाम आसमान छूने लगे.

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युवा शक्ति को पहचानने की ज़रुरत

किसी भी देश का सामाजिक और आर्थिक विकास उसकी युवा शक्ति पर निर्भर करता है. भारत जैसे देश, जहां युवाओं की संख्या अच्छी-खासी है, वहां यह बात और अधिक प्रासंगिक हो जाती है. भारत के आर्थिक नियोजक इस पर ध्यान भी देते हैं.

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यूरोप का लोकतंत्र खतरे में

लोकतंत्र की जन्मभूमि ग्रीस में पिछले दिनों इसके साथ मज़ाक़ हुआ. लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रु को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया गया. पापेंद्रु ग्रीस की समाजवादी पार्टी पासोक के नेता हैं तथा उनके पिता और दादा ग्रीस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.

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बेआबरु होकर बर्लुस्कोनी को जाना

कई मसलों पर उदाहरण स्वरूप एक पुरानी कहावत कही जाती है- रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था. यह जुमला इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी पर कुछ ज़्यादा ही फिट बैठता है. वरना, शायद इतने बेआबरू होकर उन्हें सत्ता के गलियारे से नहीं जाना पड़ता.

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जी-20 आईएमएफ की भूमिका बढ़ानी होगी

ग्रीस की आर्थिक बदहाली ने यूरोपीय देशों की परेशानी बढ़ा दी है. यूरो जोन के देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं. अमेरिकी वित्तीय संकट से विश्व पूरी तरह उबर भी नहीं पाया कि एक और वित्तीय संकट ने दरवाजे पर दस्तक दे दी.

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एक आदर्श लोकपाल बिल चाहिए

कई महीनों से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है. यूं तो भ्रष्टाचार कोई नई घटना नहीं है, लेकिन 1991 के बाद जबसे नई आर्थिक नीति लागू हुई है, भ्रष्टाचार का स्तर का़फी बढ़ गया है, जिसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है.

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अररिया जिले का भजनपुर गांवः दबंगई का अंतहीन सिलसिला

यह भजनपुर गांव है. बिहार के राजनीतिक एवं भौगोलिक नक्शे के अनुसार एक ऐसा गांव, जो ज़िला अररिया के अनुमंडलीय नगर फारबिसगंज से मात्र दो किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से इतना पिछड़ा है कि वहां आज तक न्याय और विकास जैसे राजनीतिक नारे की आवाज़ तक नहीं पहुंच सकी.

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बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

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वितरण का माध्यम मुद्रा

साम्यवाद के संबंध में अख़बारों से पढ़कर आपने शायद सोचा होगा कि यह रूस द्वारा चलाई गई भयानक आर्थिक नीति है, जिसके द्वारा मानव की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एकांत रूप से उपेक्षित होती है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है. साम्यवाद तो वित्त वितरण का बड़ा ही आदरणीय और सुगम मार्ग है, जो हज़ारों वर्षों से, किसी न किसी रूप में, कुछ अंशों में भारत में विद्यमान रहा है.

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दलित उद्यमिता का संकल्‍प

सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही.

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