आरबीआई के मज़बूत होने से ही सुधरेगी अर्थव्यवस्था

राहुल बजाज एकमात्र उद्योगपति हैं, जिन्होंने कहा है कि यह सरकार क्या चाहती है? अगर सरकार चाहती है कि हिन्दुस्तानी

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देश में आर्थिक अराजकता ला रहा जीएसटी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक विशेषज्ञों के साथ ताबड़तोड़ बैठक कर जीएसटी में बदलाव के संकेत दिए, जिन पर अमल

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नोटबंदी का फैसला अर्थव्यवस्था को कई साल पीछे ले गया है

भारत में सरकार जैसे काम कर रही है उसकी प्रशंसा होनी चाहिए. जब प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता संभाली थी, उसके

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बिखरता तिलिस्म, दरकती अर्थव्यवस्थाएं

एक बहुत पुरानी ग्रीक कहावत है, योर ग्रेटेस्ट स्ट्रेंग्थ कैन बी योर ग्रेटेस्ट वीकनेस. यानी आपकी सबसे बड़ी ताकत ही

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पूंजीपतियों का साथ लेना क्रोनी कैपिटलिज्म नहीं है

बीता महीना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए काफी हलचल का था. पिछले 25 वर्षों के दौरान दुनिया चीन के दोहरे अंक

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किसकी मिलीभगत से चल रहा है नकली नोट का खेल

आरबीआई के मुताबिक़, पिछले 6 सालों में ही क़रीब 76 करोड़ रुपये मूल्य के नक़ली नोट ज़ब्त किए गए हैं. ध्यान दीजिए, स़िर्फ ज़ब्त किए गए हैं. दूसरी ओर संसद की एक समिति की रिपोर्ट कहती है कि देश में क़रीब एक लाख 69 हज़ार करोड़ रुपये के नक़ली नोट बाज़ार में हैं. अब वास्तव में कितनी मात्रा में यह नक़ली नोट बाज़ार में इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसका कोई सही-सही आंकड़ा शायद ही किसी को पता हो.

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अंतराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2012 सशक्‍त कृषि नीति बनाने की जरूरत

संसद द्वारा सहकारिता समितियों के सशक्तिकरण के लिए संविधान संशोधन (111) विधेयक 2009 को मंज़ूरी मिलने के बाद भारत की सहकारी संस्थाएं पहले से ज़्यादा स्वतंत्र और मज़बूत हो जाएंगी. विधेयक पारित होने के बाद निश्चित तौर पर देश की लाखों सहकारी समितियों को भी पंचायतीराज की तरह स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा. हालांकि इस मामले में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अभी कुछ और पहल करने की ज़रूरत है, ख़ासकर वित्तीय अधिकारों और राज्यों की सहकारी समितियों में एक समान क़ानून को लेकर.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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ओमिता पॉल महान सलाहकार

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. ऐसे में उनके चार दशक पुराने राजनीतिक करियर की समीक्षा की जा रही है. देश की वर्तमान खराब आर्थिक हालत और उसमें प्रणब बाबू की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है, लेकिन इस सबके बीच एक और अहम मसला है, जिस पर ज़्यादा बात नहीं हो रही है. खासकर ऐसे समय में, जबकि बिगड़ी आर्थिक स्थिति को न सुधार पाने के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा हो. यह सवाल सीधे-सीधे वित्त मंत्री के सलाहकार से जुड़ा हुआ है.

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ओलांद के हाथों में फ्रांस की बागडोर

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव संपन्न हो चुका है. सरकोज़ी चुनाव हार गए हैं और फ्रांस्वा ओलांद अब देश के नए राष्ट्रपति होंगे. सोशलिस्ट पार्टी के ओलांद ने फ्रांस की जनता से कुछ वायदे किए हैं. अब उन वायदों को पूरा करना उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होगी. सरकोज़ी की हार की सबसे बड़ी वजह यूरो ज़ोन का आर्थिक संकट और उससे निपटने में नाकामयाबी है. यूरोप के राष्ट्र आर्थिक संकट से बाहर आने के लिए मितव्ययता की नीति अपना रहे हैं.

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ब्रिक्स सम्मेलन 2012 : चुनौतियां और संभावनाएं

नई दिल्ली में चौथे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन का आयोजन किया गया. सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति देमित्री मेदवेदेव, ब्राजील के राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा तथा भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाग लिया. सम्मेलन का मुख्य विषय वैश्विक स्थायित्व, सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए ब्रिक्स की भागीदारी थी.

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कॉरपोरेट्स की सामाजिक ज़िम्मेदारी तय हो

यह आलेख कॉरपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली द्वारा दिए गए एक भाषण और नए कंपनी बिल-2011 पर आधारित है. वीरप्पा मोइली ने बंगलुरु में हुए एक सम्मेलन, जिसका विषय था-भारत में कॉरपोरेट्‌स का भविष्य, में बोलते हुए नए कंपनी बिल-2011 और कॉरपोरेट्‌स की सामाजिक ज़िम्मेदारी यानी सीएसआर पर अपने विचार रखे थे.

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इंडिया इन ट्रांजिशनः भारत और दक्षिण एशिया संतुलन से लेकर आपसी सहयोग तक

क्या अतीत की पिछली घटनाओं और उनके तर्क से यह संकेत नहीं मिलता कि अपने पड़ोसियों को लेकर हमारी नीति में परिवर्तन की शुरुआत होने जा रही है, जिसमें भारत को संतुलित करने के प्रयास से लेकर लंबे समय तक इसके साथ आपसी सहयोग भी शामिल है? क्या कारण है कि हमारे पड़ोसी देश, ख़ास तौर पर पाकिस्तान और किसी हद तक बांग्लादेश, श्रीलंका एवं नेपाल अपने ही हित में क्षेत्र की सबसे बड़ी और सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर सहयोग नहीं करते?

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मनुष्य का यंत्रीकरण

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने आदमी को एक तरह से मशीन बना दिया है. उदाहरण के लिए घर में काम आने वाली सुइयां या कीलें आज से 200 वर्ष पहले ग्राम का कोई लोहार बनाता था. उसके बनाने में जो साजो-सामान लगता था, उसको प्राप्त करने से लेकर तैयार सुई या कील घर- घर जाकर बेचकर पैसा इकट्ठा करने तक का सारा काम वह स्वयं या उसका परिवार कर लेता था.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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सरकार को जनता के बीच जाना चाहिए

यह बड़ी राहत की बात है कि सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को लाने (एफडीआई) के अपने निर्णय को फिलहाल स्थगित कर दिया है. इस पर कॉरपोरेट सेक्टर और शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया प्रतिकूल रही.

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मनरेगा : सरकारी धन की बंदरबाट

नक्सलवाद, भौगोलिक स्थिति और पिछड़ापन आदि वे कारण हैं, जो विंध्याचल मंडल को प्रदेश के विकसित हिस्सों से अलग करते हैं. मंडल के तीन ज़िलों में से एक भदोही को विकसित कहा जा सकता है, किंतु कालीन उद्योग में आई मंदी ने जनपद की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया.

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क्या बड़े खुदरा व्यापारी भारत के लिए फायदेमंद साबित होंगे?

घरेलू खुदरा बाज़ार के क्षेत्र में अचानक बड़े विदेशी खिलाड़ियों को आमंत्रित करने के सरकारी फैसले से विवाद का पिटारा खुल गया है. इन बड़े-बड़े खुदरा व्यापारियों (विदेशी रिटेलर्स) के नफे-नुक़सान पर एक विस्तृत चर्चा होनी चाहिए.

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राष्ट्रीय शहरी सड़क विक्रेता नीति 2009 : सिर्फ़ क़ानून बनाने से काम नहीं चलेगा

पिछले कई वर्षों से फुटपाथों, पार्कों और सब-वे जैसे सार्वजनिक स्थलों पर सामान बेचने वाले विक्रेताओं की पहुंच सही उपभोक्ताओं तक न हो पाने का मामला दुनिया भर के बड़े शहरों में विवादग्रस्त बन गया है.

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सर्वोदय अर्थव्यवस्था

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने अपनी अर्थव्यवस्था का जो स्वरूप बतलाया था, उसे सर्वोदय अर्थव्यवस्था की संज्ञा मिली है. शायद यह व्यवस्था भारत की दयनीय दशा को देखते हुए इस देश के लिए उपयुक्त और आदर्श मान भी ली जाए.

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यूरोप का लोकतंत्र खतरे में

लोकतंत्र की जन्मभूमि ग्रीस में पिछले दिनों इसके साथ मज़ाक़ हुआ. लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रु को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया गया. पापेंद्रु ग्रीस की समाजवादी पार्टी पासोक के नेता हैं तथा उनके पिता और दादा ग्रीस के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.

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व्यक्तिगत और निजी संपत्ति

समाजवादी अर्थव्यवस्था की प्रतिष्ठा से पहले इसे ठीक से समझना होगा. जब तक इसके विपरीत पक्ष पूंजीवाद को हम सही मायनों में समझ नहीं लेते, तब तक समाजवाद का तात्विक अर्थ समझना कठिन है.

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राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन के मायने

राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आजकल आम तौर पर किया जाता है. प्राय: यह शत्रु देश के आक्रमण से सुरक्षा से संबंधित होता है अथवा उन हथियारबंद आतंकवादियों से सुरक्षा से, जो राष्ट्र के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं या राष्ट्रीय एकता-अखंडता को नुक़सान पहुंचाते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिप्राय केवल इसी से नहीं है, बल्कि इसे और अधिक वृहद अर्थों में समझने की आवश्यकता है.

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पाकिस्तान : सामंतवादी तंत्र की हकीकत

फ्यूडलिज्म या सामंतवादी तंत्र एक सोच का नाम है. एक ऐसे व्यक्ति की सोच, जो दूसरों को अपने मुक़ाबले तुच्छ मानता हो और उनका हक़ छीनना जायज़ समझता हो. ऐसी नकारात्मक सोच और चिंता रखने वाले वर्ग सामंतवादी तंत्र को जन्म देते हैं. यह तंत्र अमीरों को कमज़ोरों के शोषण का गुण सिखाता है, नाजायज़ तरीक़े से दौलत जमा करता है, ग़रीब को और ग़रीब बनाता है, अमीर को और अमीर बनाता है.

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