जॉर्ज फर्नांडीज जैसी विभूतियां हमारी धरोहर हैं : लोहिया को देखते रह गए जॉर्ज

जॉर्ज फर्नांडीज ने प्रारंभिक जीवन में कोंकड़ी युवक नामक कोंकण समाचार-पत्र के साथ-साथ कन्नड़ साप्ताहिक रैथवाणी में काम किया था.

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

उर्दू और फारसी शायरी के चमन का यह दीदावर यानी मोहम्मद अल्लामा इक़बाल 9 नवंबर, 1877 को पाकिस्तान के स्यालकोट में पैदा हुआ. उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे, लेकिन क़रीब तीन सौ साल पहले उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था

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हंस चुनेगा दाना-तिनका कौआ मोती खाएगा

अजीब इत्ते़फाक़ है. कामिनी जायसवाल ने इस पीआईएल को रजिस्ट्रार के पास जमा किया और अपने केबिन में लौट आईं, इतनी ही देर में यह पीआईएल मीडिया में लीक हो गई. उन्हें किसी ने बताया कि इसमें क्या है, यह मीडिया के लोगों को पता चल चुका है. जब इस पीआईएल की सुनवाई शुरु हुई तो जज ने पहला सवाल कामिनी जायसवाल से पूछा कि किसने लीक की.

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हमें अपने देश का भरोसा बरक़रार रखना है

पिछले हफ्ते मैंने चौथी दुनिया की रिपोर्ट में इंडियन एक्सप्रेस और शेखर गुप्ता की पत्रकारिता पर कई सवाल उठाए. उन सवालों को उठाते हुए मुझे हमेशा याद रहा कि पिछले कुछ सालों में इंडियन एक्सप्रेस ने कैसी पत्रकारिता की और शेखर गुप्ता ने अपना आज का मुक़ाम कितनी मेहनत से बनाया है, लेकिन सवाल तो सवाल हैं और कभी ये सवाल इतने बड़े आकार में हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं कि हमें न चाहते हुए भी वह लिखना पड़ता है, जो नहीं लिखना चाहिए.

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काटजू का जादुई यथार्थवाद

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वरिष्ठ पत्रकारों एवं संपादकों का जमावड़ा हुआ, मौक़ा था पत्रकार शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब स्मार्ट रिपोर्टर के विमोचन का. किताब का औपचारिक विमोचन प्रेस परिषद के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू के साथ-साथ एन के सिंह, आशुतोष, कमर वहीद नकवी एवं शशि शेखर ने किया.

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ताबड़तोड़ विमोचनों का मेला

कुछ दिनों पहले दिल्ली में बीसवां अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला समाप्त हुआ. दरअसल यह मेला एक साहित्यिक उत्सव की तरह होता है, जिसमें पाठकों की भागीदारी के साथ-साथ देशभर के लेखक भी जुटते हैं और परस्पर व्यक्तिगत संवाद संभव होता है. इस बार के मेले की विशेषता रही किताबों का ताबड़तोड़ विमोचन और कमी खली राजेंद्र यादव की, जो बीमारी की वजह से मेले में शिरकत नहीं कर सके. एक अनुमान के मुताबिक़, इस बार के पुस्तक मेले में हिंदी की तक़रीबन सात से आठ सौ किताबों का विमोचन हुआ.

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क्या हम स्वतंत्रता के लायक़ हैं?

गणतंत्र दिवस और महात्मा गांधी की पुण्यतिथि दोनों एक ही महीने में आते हैं. दोनों के बीच के निचोड़ को किस तौर देखा जाए. पाखंड और अतिश्योक्ति से मुक्ति के लिए किए गए कामों की सुरक्षा की जानी चाहिए या उन्हें केवल दस्तावेज़ों में रखा जाना चाहिए. हमने अहिंसा के नैतिक गुण को अपना लिया है, लेकिन जयपुर में हिंसा होने के डर के कारण जो हुआ, उससे तो यही लगता है कि यह सब कहने की बात है.

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संपादकीय विवेक पर सवाल

बात कई साल पुरानी है. प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से आलोचक देवेंद्र चौबे की किताब समकालीन कहानी का समाजशास्त्र प्रकाशित हुई थी. मैंने कथादेश के संपादक हरि नारायण जी से उक्त किताब पर समीक्षा लिखने की अनुमति मांगी.

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कमज़ोर संस्मरण, ढीला संपादन

लम्बे समय तक कई अंग्रेजी अख़बारों के संपादक रहे एस निहाल सिंह ने अपनी संस्मरणात्मक आत्मकथा इंक इन माई वेन-अ लाइफ इन जर्नलिज्म में देश पर इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गई इमरजेंसी पर लिखते हुए जय प्रकाश नारायण को रिलक्टेंट रिवोल्यूशनरी (अनिच्छुक क्रांतिकारी) कहा है. एक लेखक को शब्दों के चयन में सावधान रहना चाहिए और अगर वह दो दशकों से ज़्यादा समय तक संपादक रहा है तो यह अपेक्षा और बढ़ जाती है.

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आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है.

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पुराने तथ्य, नई किताब

कुछ दिनों पहले ही हिंदी-अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित वेबसाइट फेस एंड फैक्ट्स के प्रबंध संपादक जयप्रकाश पांडे का बेहद गुस्से में फोन आया. उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक जोसेफ लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी का अपमान करते हुए एक किताब लिखी है-ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया.

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पत्रिकाओं से बनता परिवेश

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हिंदी के विकास में इनकी एक ऐतिहासिक भूमिका भी रही है. व्यवसायिक पत्रिकाओं के विरोध में शुरू हुए लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन ने एक व़क्त हिंदी साहित्य में विमर्श के लिए एक बड़ा और अहम मंच प्रदान किया था, लेकिन बदलते व़क्त के साथ इन पत्रिकाओं की भूमिका भी बदलती चली गई.

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बड़े संपादकों के छोटे सवाल

किसी भी प्रजातंत्र में मीडिया का काम एक प्रहरी का होता है. वह सरकार का नहीं, जनता का पहरेदार होता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सरकार जो करती है और जो नहीं करती है, वह उसे जनता के सामने लाए. जब कभी सत्तारूढ़ दल, विपक्षी पार्टियां, अधिकारी और पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं, तब मीडिया उन्हें उनके कर्तव्यों का एहसास कराता है.

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वर्धा में दो दिन

बेहद सर्द सुबह थी, कोहरा इतना घना था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. मैं बात कर रहा हूं जनवरी के पहले हफ्ते की, जब अचानक दिल्ली में सर्दी कम हुई थी और कोहरा घना हो गया था. मुझे वर्धा जाना था और उसके लिए नागपुर की फ्लाइट लेनी थी, जो दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह सवा पांच बजे थी.

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भारतीय व्‍यवस्‍था का काला सच

नीरा राडिया के टेप भारतीय व्यवस्था के उस पहलू को उजागर करते हैं, जो सत्ता सूत्र और भ्रष्ट तत्वों के बीच की साठगांठ पर आधारित है और देश के कॉरपोरेट एवं राजनीतिक तंत्र के बीच गोंद का काम करता है. जैसा कि स्कूल जाने वाला कोई सुकुमार बच्चा अच्छी तरह जानता है कि चीर-फाड़ का काम बड़ा ही मुश्किल होता है. कुछ बच्चे इससे बचने के लिए हरसंभव उपाय करते हैं तो कुछ बच्चे घबरा जाते हैं या डर जाते हैं.

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फकीर की याद में तकदीर की तलाश

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को गुजरे दो बरस हो गए. उनकी पुण्यतिथि चुपके से गुजर गई. कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ. पिछड़े वर्ग के हिमायती बनने वाले तमाम संगठनों को भी उनकी याद नहीं आई. पिछड़ों की राजनीति के दम पर मुख्यमंत्री बनने वाले नेता भी उन्हें भूल गए. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कार्यक्रम हुआ, जो पूरी तरह ग़ैर राजनीतिक था. इस आयोजन के ज़रिए कुछ सवाल उठे, जो आज के दौर में भी मौजूद हैं. मसलन विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की स़िफारिशें जिस मक़सद से लागू कीं, क्या वह पूरा हो सका, पिछड़े वर्ग में राजनीतिक चेतना आई, उनका आर्थिक स्तर कितना सुधर सका? सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर पिछड़े कितने अगड़े हुए? अकलियतों के विकास के लिए वीपी सिंह ने जो प्रयास किए, वे आज के संदर्भ में कितने सफल दिखाई देते हैं? इन सवालों के घेरे में पिछड़े और अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुस्लिम समाज के वे तमाम नेता आते हैं, जिन्होंने खुद को इनका रहनुमा घोषित कर रखा है. भ्रष्टाचार के खिला़फ वीपी सिंह ने ही पहली बार आवाज़ बुलंद की, लेकिन आज प्रधानमंत्री कार्यालय तक सवालों के घेरे में है. कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार से देश शर्मसार है, वहीं बैंकों से लोन दिलाने में घपलेबाज़ी को मामूली बात कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिशें हो रही हैं.

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अप्रासंगिक लेखक संगठन

वर्ष 1935 में लंदन के नानकिंग रेस्तरां में बैठकर सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद, ज्योति घोष, प्रमोद सेन गुप्ता एवं मोहम्मद दीन तासीर जैसे लेखकों ने एक संगठन की बुनियाद रखने की बात पर विचार विमर्श किया था और यही विमर्श बाद में इंडियन प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का आधार बना और इसी नाम से संगठन की नींव पड़ी.

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आलोचक का अकेलापन

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है, माधुरी, कल्पना एवं रूपाभ से लेकर हंस, पहल एवं तद्‌भव तक. साठ के दशक में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसने कई दशकों तक साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप किया. 86 के दशक में जब राजेंद्र यादव ने हंस पत्रिका का संपादन शुरू किया तो वह एक बेहद अहम साहित्यिक घटना साबित हुई.

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बाज़ार को भुनाने की चाहत

पिछले लगभग एक दशक के प्रकाशनों पर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि कई वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों की मीडिया और उससे जुड़े विषयों पर किताबें प्रकाशित हुई हैं. इन पुस्तकों में जो समानता दिखाई देती है, वह यह है कि पत्रकारों, संपादकों ने पूर्व में लिखे लेखों को संयोजित कर एक थीम, आकर्षक शीर्षक और चर्चित समकालीन वरिष्ठ पत्रकार की गंभीर भूमिका के साथ पुस्तकाकार में छपवाया है.

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बेव़फाई का सुपर धमाका

हिंदी साहित्य में रवींद्र कालिया की ख्याति उपन्यासकार, कहानीकार और संस्मरण लेखक के अलावा एक ऐसे बेहतरीन संपादक के रूप में भी है, जो लगभग मृतप्राय: पत्रिकाओं में भी जान फूंक देते हैं.

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समकालीन साहित्‍य में सार्थक हस्‍तक्षेप

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का लंबा और समृद्घ इतिहास रहा है. दरअसल हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत छठे दशक में व्यावसायिक पत्रिका के जवाब के रूप में की गई. इस आंदोलन का श्रेय हम हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा को दे सकते हैं. उन्होंने 1957 में बनारस से कवि का संपादन-प्रकाशन शुरू किया था.

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बड़े पत्रकार, बड़े दलाल

पद्मश्री बरखा दत्त और वीर सांघवी. दो ऐसे नाम, जिन्होंने अंग्रेज़ी पत्रकारिता की दुनिया पर सालों से मठाधीशों की तरह क़ब्ज़ा कर रखा है. आज वे दोनों सत्ता के दलालों के तौर पर भी जाने जा रहे हैं. बरखा दत्त और वीर सांघवी की ओछी कारगुज़ारियों के ज़रिए पत्रकारिता, सत्ता, नौकरशाह एवं कॉरपोरेट जगत का एक ख़तरनाक और घिनौना गठजोड़ सामने आया है.

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साहित्यकार फोसवाल में ऊबे दिखे

कला और साहित्य ज़मीन पर खींची गई किसी लकीर के दायरे में नहीं बांधे जा सकते. ऐसा ही कुछ देखने को मिला सार्क देशों से आए साहित्यकारों के सम्मेलन में. लगा जैसे इस कार्यक्रम के लंबे सत्र से अनेक साहित्यकार ऊब गए थे. जो सुबह आए,वे शाम तक रुक नहीं सके. फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर (फोसवाल) की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित इस सालाना आयोजन में सार्क के आठ देशों से आए नए और पुराने साहित्यकारों ने तीन दिनों तक (26-28 मार्च) अपनी-अपनी कविताओं, कहानियों और नज्मों से लोगों को रूबरू कराया.

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किसका कितना हिस्सा ले गए प्रभाष जी

इंडिया टुडे का हिंदी संस्करण 1986 में शुरू हुआ था. शुरू में इसमें महज़ पांच लोग थे और उनमें से चार जनसत्ता से लिए गए थे. मैं भी उनमें एक था. हमें बताया गया था कि अरुण पुरी को जनसत्ता की हिंदी सबसे ज़्यादा पसंद है, इसलिए वे यहां काम करने वालों को तरजीह देते हैं. जिस दिन हमें छोड़ कर जाना था, उस दिन एक्सप्रेस बिल्डिंग में हमारे लिए विदाई कार्यक्रम रखा गया. उसमें कई लोग बोले. अंत में प्रभाष जी का भाषण हुआ. भाषण के बीच उन्होंने कहा, कुछ लोग हवा में उड़ने की इच्छा रखते हैं.

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