किताबों में बनता इतिहास

प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे. उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे. समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था. हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की का़फी इज़्ज़त भी थी. उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है.

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निराशा से भरा संपादकीय

मीडिया पर वह यहीं नहीं रुकते, उसी में आगे कहते हैं-देश की राजधानी में हर रोज दर्जनों हत्याएं, बलात्कार और लूटपाट की घटनाएं आम हो चुकी हैं. ग़रीबी-अमीरी के बीच की खाई अपराधों और हत्याओं से पाटी जा रही है.

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