जनता खामोश है लेकिन आपके खिलाफ है

अगले साल आम चुनाव होने वाले हैं. चार साल पहले नरेंद्र मोदी ने लोगों में यह उम्मीद पैदा कर दी

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एक पाठक का प्रधानमंत्री के नाम खुला खत

मै संपादकीय में कभी-कभी उन लोगों की आवाज भी शामिल करता हूं, जो मेरा संपादकीय पढ़ते हैं. मेरे एक पाठक

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आप इस संपादकीय को ग़लत साबित कीजिए

आज का संपादकीय संभवत: पूर्ण रूप से झूठ पर आधारित है. मैं चाहूंगा कि आप इस लेख में लिखी हुई

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किताबों में बनता इतिहास

प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे. उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे. समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था. हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की का़फी इज़्ज़त भी थी. उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है.

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निराशा से भरा संपादकीय

मीडिया पर वह यहीं नहीं रुकते, उसी में आगे कहते हैं-देश की राजधानी में हर रोज दर्जनों हत्याएं, बलात्कार और लूटपाट की घटनाएं आम हो चुकी हैं. ग़रीबी-अमीरी के बीच की खाई अपराधों और हत्याओं से पाटी जा रही है.

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