प्रधानमंत्री ने कहा: देश में नौकरियों की नहीं, विपक्ष के पास आंकड़ों की कमी

देश में नौकरियों की कमी को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों को प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी तरह से

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अरविन्द केजरीवाल का दावा हर साल देंगे 25,000 नौकरियां

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने अपनी सरकार का बजट पेश कर दिया है, इस बजट को ग्रीन बजट भी

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हाल-ए-रोज़गार दफ्तर, बेरोज़गारी से भी बदतर

ऐसा नहीं है कि भारत में बेरोजगारी की समस्या नई है, लेकिन वर्तमान में इसने विकराल रूप धारण कर लिया

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विपक्ष को ईवीएम मुद्दे पर एकजुट होना चाहिए

ऐसा लगता है कि पूरा विपक्ष अव्यवस्था का शिकार है. हतोत्साहित होना स्वाभाविक है, क्योंकि चुनाव के नतीजे उसके लिए

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खीरी में ख़राब स्वास्थ्य सेवाएं, झूठ के आसरे सीएमओ

चुनावी बिगुल बज चुका है, लेकिन सच मानिए, पूरे प्रदेश की जनता विभिन्न मुद्दों जैसे बिजली, पानी, कानून, रोजगार, शिक्षा

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फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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अपनी माटी से जुड़ते बिहारी कारोबारी

कुछ साल पहले देश में यह धारणा बन चुकी थी कि बिहार में उद्योग-धंधे लगाना किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है. ऐसा मानने वालों का तर्क था कि राज्य में कोई औद्योगिक माहौल ही नहीं है, क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाओं से लेकर आधारभूत संरचनाओं की घोर कमी है.

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राहुल को हार का डर सताने लगा है

उत्तर प्रदेश में मिली हार के बाद राहुल ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. राहुल गांधी बात भले ही पूरे प्रदेश की करते दिखते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका सारा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर लगा है. उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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राजनीति में नैतिकता बहुत ज़रूरी

पिछले साल देश भ्रष्टाचार और विदेश में रखे काले धन की चर्चा में व्यस्त रहा. कुछ मंत्री जेल गए और अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार के खिला़फ आंदोलन शुरू किया. हालांकि भ्रष्टाचार एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, देश में रोजग़ार के अवसरों का अभाव.

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आरटीआई, मनरेगा और जॉब कार्ड

ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार पैदा करने के लिए सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा को सफल बनाने के लिए हज़ारों करो़ड रुपये खर्च करने की योजना बनाई. यह योजना गांवों तक पहुंची भी, लेकिन हर योजना की तरह मनरेगा भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई.

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सामाजिक विशमता मानव नस्ल का

आप पूछ सकते हैं कि भाई, जिन आदमियों के पास खाने को पर्याप्त रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उन सबको समान बंटवारा कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या आप मानते हैं कि वे उस प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं करेंगे? क्या उन्हें प्राथमिकता का ज्ञान या ध्यान रहेगा? वे लोग मिली हुई धनराशि जुए या अन्य किसी दुर्व्यसन में खर्च करके फिर उसी तरह रोटी-कप़डे के मोहताज नहीं बन जाएंगे?

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बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

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विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे.

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राहुल जी, गांव में आपने क्या सीखा

बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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दलित उद्यमिता का संकल्‍प

सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही.

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प्रजातंत्र के नाम पर चीरहरण

भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.

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क्‍या यही ग्राम स्‍वराज है?

मैं घूमने के लिए कई बार यहां-वहां जाती रहती हूं. कभी बड़े शहरों में तो कभी छोटे शहरों में और कई बार उत्तराखंड के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में भी. वैसे तो गांवों में भी अब बदलाव आने लगे हैं, पर कहने में संकोच नहीं होता कि ज़्यादातर बदलावों का परिणाम उल्टा ही हुआ है.

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कुलपति और बदहाल उच्‍च शिक्षा

जदयू सांसद शिवानंद तिवारी की हाल ही में की गई टिप्पणी, जिसमें वह कहते हैं कि बिहार में कुलपतियों की नियुक्तियां संदेह के घेरे में रही हैं. इसलिए विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को सुधारने के लिए कुलपतियों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक है, बताती है कि उच्च शिक्षा की वर्तमान हालत क्या है.

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ग्राम स्‍वराज की ओर बढ़ते कदम

कहते हैं कि जब सरकारी तंत्र पूरी तरह से सड़ने लगे और लोकतंत्र स़िर्फ नाम का ही रह जाए तो ऐसे में विकास का रास्ता ज़डों की ओर लौटने से ही मिलता है. किसी भी देश के विकास की इमारत में उस देश के गांव और किसान नींव का काम करते हैं.

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पानी कब बनेगा चुनावी मुद्दा?

देश भर में रोज़गार मुहैया कराने वाली अति महत्वाकांक्षी परियोजना मनरेगा की सफलता प्रचार माध्यमों द्वारा गाए जाने के बावजूद गांवों से पलायन थमा नहीं है. पेयजल मिशन का यशोगान इस चुनावी माहौल में पवित्र ॠचाओं से कम सात्विक नहीं लगा, मगर इस साल भी गांव-शहर पानी की कमी से आतंकित ज़रूर रहे.

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मनरेगा का काला सच

बीते तीन सालों से तमाम आशंकाओं और अटकलों के बीच देश में ठीक-ठाक बारिश होती रही है. औसत बारिश का 78 प्रतिशत, जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं. दैनिक ज़रूरतों और दूसरे कामों के लिए हमें जितना पानी चाहिए, उससे दोगुनी मात्रा में पानी बरस कर जल- संकायों एवं धरती के गर्भ में जमा हो रहा है.

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कोहरे में लिपटी परदेसियों की उम्‍मीद

वतन से दूर, बीवी बच्चों से अलग, मां बहनों की नज़रों से ओझल एक परदेसी के लिए अपनी मिट्टी पर त्यौहार मनाने की ख़ुशी कुछ और ही होती है. वह भी ऐसे समय पर जब लोकतंत्र का महान पर्व यानी चुनाव साथ-साथ हो. नवंबर का महीना आख़िरी पड़ाव पर है.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

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भारत में मुसलमानों की रोज़गार समस्या

सच्चर कमेटी ने देश में मुसलमान समुदाय के विभिन्न पक्षों का विस्तृत विश्लेषण किया और सारी बातें कमेटी की रिपोर्ट में उल्लिखित हैं. मुसलमानों की पहचान ही उनके विकास की सबसे बड़ी बाधा है, यह बात भी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कही गई है. साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इससे ही कई और बाधाएं भी पैदा हो जाती हैं.

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गरीब रिक्‍शेवाले कहां जाएंगे

मानव श्रम के दोहन के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है सड़कों पर चलने वाला रिक्शा. और यह रोजी-रोटी कमाने के सबसे पुराने तरीक़ों में से भी एक है. न जाने कब से इस सवारी के घूमते तीन चक्कों के साथ न जाने कितनी ज़िंदगियों की क़िस्मत घूमती रही है. अशिक्षा और भूमिहीनता के चलते भुखमरी झेलने को अभिशप्त समाज के सबसे निचले और कमज़ोर तबके के लिए रिक्शा पेट पालने का अभिन्न और अक्सर एकमात्र साधन रहा है.

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अंडमान में खाद्य प्रसंस्‍करण की पहल

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पर्यावरणीय संतुलन क़ायम रखने के लिए कुछ समय पूर्व न्यायालय ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी. लंबे समय तक काष्ठ उत्पादों के निर्माण से जुड़े लोगों के सामने ऐसे में रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ.

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पूर्ण स्वच्छता अभियान और मनरेगा

मनरेगा की उपयोगिता और इसके उद्देश्यों को लेकर कोई संदेह नहीं. यह भी सच्चाई है कि इसमें ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक का अनुभव यही बताता है कि इसके क्रियान्वयन में सुधार की ज़रूरत है. यदि इसे पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसी व्यक्तिगत लाभ योजनाओं से जोड़ दिया जाए तो दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है.

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