उत्तराखंड में गंगा के निकट खनन और स्टोन-क्रशिंग पर पूरी तरह रोक – आखिर काम आया संतों का बलिदान

पर्यावरण की बर्बादी के खिलाफ साधु-संतों और उत्तराखंड की जनता का आक्रोश देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने

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पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का नया युग

भारत एक ऐसा देश है, जिसका पर्यावरण संबंधी आंदोलनों, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और उत्तरदायी उच्च न्यायपालिका का अपना समृद्ध इतिहास रहा है. ऐसे देश में 2011 का वर्ष पर्यावरण संबंधी मुकदमेबाज़ी का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष अर्थात मील का पत्थर साबित हुआ है. यद्यपि पर्यावरण संबंधी मुक़दमेबाज़ी पिछले तीन दशकों में काफ़ी बढ़ गई है, लेकिन पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना के कारण 2011 का वर्ष फिर भी काफ़ी विशिष्ट है.

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इंडिया इन ट्रांजशिनः प्रौद्योगिकी मानव के इरादों को बुलंद करती है

अपने पर्यावरण की देशीय प्रकृति का ज्ञान संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण के प्रबंधन, भूमि संबंधी अधिकारों के आवंटन और अन्य समुदायों के साथ राजनयिक संबंधों के लिए आवश्यक है. भौगोलिक सूचनाएं प्राप्त करना और उनका अभिलेखन समुदाय को चलाने के लिए एक आवश्यक तत्व है.

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हिमालय में दवाओं का ख़ज़ाना

वनस्पति न स़िर्फ इंसानी जीवन, बल्कि पृथ्वी पर वास करने वाले समस्त जीव-जंतुओं के जीवन चक्र का एक अहम हिस्सा है. एक तऱफ जहां यह वातावरण को शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, वहीं दूसरी तऱफ इसकी कई प्रजातियां दवा के रूप में भी काम आती हैं. वन संपदा के दृष्टिकोण से भारत का़फी संपन्न है.

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एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी

खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है.

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जैव विविधता क़ानून में बदलाव और ग्रीन ट्रिब्यूनल

दो जून 2010 को भारत का ग्रीन ट्रिब्यूनल क़ानून अस्तित्व में आ गया. 1992 में रियो में हुई ग्लोबल यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एन्वॉयरमेंट एंड डेवलपमेंट के फैसले को स्वीकार करने के बाद से ही देश में इस क़ानून का निर्माण ज़रूरी हो गया था.

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कराहती नदियां

कभी जीवनदायिनी रहीं हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से कराह रही हैं, दम तोड़ रही हैं. गंगा, यमुना, घाघरा, बेतवा, सरयू, गोमती, काली, आमी, राप्ती, केन एवं मंदाकिनी आदि नदियों के सामने ख़ुद का अस्तित्व बरकरार रखने की चिंता उत्पन्न हो गई है.

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मज़हब पर भारी परिवेश

अचानक एक दिन एक मित्र ने फोन कर बताया कि पत्रकार जैग़म इमाम का एक उपन्यास आया है और वह आपसे मिलकर अपना उपन्यास देना चाहते हैं. फिर एक दिन जैग़म मेरे दफ्तर आए और उपन्यास दे गए. यह जैग़म से मेरी पहली मुलाक़ात थी.

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सौ किमी सड़क के लिए हजारों पेड़ों की बलि

रांची से हज़ारीबाग़ तक लगभग सौ किलोमीटर फोरलेन सड़क बनाने के लिए क़रीब बीस हज़ार पेड़ों को काटा जाएगा. इस परियोजना पर काम शुरू हो गया है. फोरलेन सड़क निर्माण के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने सड़क के किनारे स्थित पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी है.

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एंडरसन से ज्यादा अपनों ने दिए हैं जख्म

चौथी दुनिया के पास वे सारे दस्तावेज़ मौजूद हैं ,जो चीख-चीख कर इन महानुभावों की पोल खोल रहे हैं. बता रहे हैं कि कैसे गैस पी़डीतों की भावनाओं की बलि च़ढा कर नेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों ने डाओ को बचाने का काम किया. चौथी दुनिया की प़डताल में ऐसे ही लोगों की करतूतों का खुलासा किया जा रहा है. हर उस चिट्ठी के बारे में बताया जा रहा है, जो इन लोगों ने डाओ को बचाने के लिए लिखी है.

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पर्यावरण का रखवाला जय श्रीराम

बख्तियारपुर (पटना) निवासी आरक्षी जितेंद्र शर्मा उ़र्फ जय श्रीराम उन चंद पुलिसकर्मियों में शामिल हैं, जिनके कार्य से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता. पटना के यातायात थाने में तैनात बिहार पुलिस का यह जवान एक अलग कार्य संस्कृति और जीवनशैली के लिए मशहूर हो रहा है.

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साख बचाने के लिए पहल ज़रूरी

हिमालय के ग्लेशियर पिघलने की रिपोर्ट पर ग़लती मानकर नोबेल पुरस्कार प्राप्त संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) बुरी तरह फंस गई है. बाली में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य सत्तर देशों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक में इस विषय पर गहन विचार-विमर्श हुआ.

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दिल्‍ली का बाबूः सीसीआई ने कसी कमर

कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) के गठन को एक साल से ज़्यादा समय गुज़र चुका है, लेकिन किसी भी विचाराधीन मामले पर वह अब तक अपना फैसला नहीं दे पाया है. आलोचनाओं के बढ़ते शोर के बीच हालांकि ऐसा लगता है कि सीसीआई अब कमर कस रहा है.

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प्रिंटर से सेहत को खतरा!

कंप्यूटर आज लोगों की ज़रूरत बन गया है. इसके बिना ऐसा लगता है, जैसे कुछ खो गया है. आज ऊमन हर घर में कंप्यूटर है और साथ में प्रिंटर भी. आप भी सोच में पड़ गए होंगे कि इसमें आख़िर नई बात कौन सी है? नई बात है जनाब! प्रिंटर हमारी सेहत के लिए घातक है. लेजर प्रिंटर तो सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है.

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राजस्‍थान के रास्‍ते महाविनाश की दस्‍तक

यह पंचांग बांचने वाले किसी पंडित की भविष्यवाणी नहीं है. यह सरहद पार के किसी दुश्मन की साजिश भी नहीं है. यह हमारी अपनी करनी है, जिसका फल हमें भुगतना पड़ेगा. जी हां, राजस्थान के रास्ते महाविनाश देश में दस्तक दे रहा है. थार मरुस्थल के लिए पहचाना जाने वाला राजस्थान हमें अपने मतलबपरस्त और अदूरदर्शी कामों के लिए सजा देने का ज़रिया बनेगा.

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कभी नहीं से देर भली

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि वन और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत वन एवं वन्य जीवों और पर्यावरण मामलों के लिए अलग-अलग विभाग होंगे. मौजूदा व्यवस्था में पर्यावरण मंत्रालय के अधीन वन्यजीवों के लिए एक अलग शाखा है, जिसके मुखिया पर्यावरण सचिव विजय शर्मा हैं.

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बांग्‍लादेश ग्‍लोबल वार्मिंग से निबटने की तैयारी

बांग्लादेशी समाज का तक़रीबन हर तबका सरकारी तंत्र, नागरिक संस्थाएं और देश के प्रमुख विश्वविद्यालय, पर्यावरण पर मची हलचल को लेकर कौतूहल में हैं. सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि अब आगे क्या होने वाला है. इस साल की शुरुआत से ही देश भर में इस विषय पर सभा-सेमिनारों की संख्या लगातार ब़ढ रही है.

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पर्यावरण सुरक्षा और भारत

क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति भारत का दृष्टिकोण

भारत ने अगस्त, 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और उसका अनुमोदन किया. इस प्रोटोकॉल की कई शर्तों से भारत को छूट हासिल है और तकनीकी हस्तांतरण एवं विदेशी निवेश के क्षेत्र में फायदा हो सकता है.

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मनमोहन ने बंद कराई गंगा परियोजना : संतों के सामने कांग्रेस भाजपा से ज्‍यादा नतमस्‍तक

गंगा की अविरल जल धारा को बनाए रखने के मामले में संतों के कहने पर कांग्रेस की यूपीए सरकार भाजपा से भी आगे निकल गई है. अब वह मानने लगी है कि अगर गंगा की धारा से ज़्यादा छेड़छाड़ की गई तो उत्तराखंड का विकास हो कि न हो, पर्यावरण पर इसका सीधा असर पड़ेगा.

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बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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जोहानेसबर्ग पृथ्‍वी सम्‍मेलन था दीर्घकालिक विकास के लिए

दक्षिण अफ्रीका के जोहानेसबर्ग में जो वैश्विक सम्मेलन (डब्ल्यूएसएसडी), 2002 में हुआ था, वह मूल रूप से दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित था, हालांकि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने उसका बहिष्कार किया था. इसीलिए उसके एजेंडे में ग्लोबल वार्मिंग का मुद्‌दा उतना अहम नहीं था.

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वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा

यदि मानवजनित गतिविधियां अपनी मौजूदा गति से जारी रहीं तो औद्योगिक युग से पहले के मुक़ाबले औसत वैश्विक तापमान में सात डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो जाएगी. तापमान में यह वृद्धि 15000 साल पहले, आख़िरी हिमयुग (आइस एज) के बाद पृथ्वी के तापमान में आई वृद्धि से भी ज़्यादा है.

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ग्‍लोबल वॉर्मिंग कानूनी पहलू और अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय

पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण में जो बदलाव आ रहे हैं, उनके कारण देश भर में इस विषय पर गंभीर बहस चलने लगी है. इन बदलावों को नियमित करने वाले क़ानून पर्यावरण से जुड़े विस्तृत न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा हैं. इस संदर्भ में आम राय यह है कि प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे है और जिसको नियंत्रित करने की दिशा में हर राष्ट्र को पहल करनी चाहिए.

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पत्थर उद्योग पर बंदी का खतरा

रोहतास और कैमूर ज़िलों में पूर्व से स्थापित बड़े एवं छोटे उद्योगों की बंदी या अवसान के बाद अब सासाराम में भी पत्थर उद्योग पर बंदी का खतरा मंडरा रहा है. तत्कालीन राजद सरकार की पर्यावरण नीतियों के कारण 2001 में अनेक खदानें बंद हो गई थीं. नई सरकार बनने के बाद उम्मीद बंधी थी कि अब मजदूरों के जीवन में कुछ नया होगा, लेकिन जो कुछ देखा जा रहा है, वह उम्मीद से परे है.

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पर्यावरण से संबंधित फैसलों में हितों का टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके, जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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दिल्‍ली का बाबू: शरण राज्यमंत्री होंगे!

अफवाहों का बाज़ार गर्म है कि पूर्व विदेश सचिव और क्लाइमेट चेंज पर प्रधानमंत्री के विशेष प्रतिनिधि श्याम शरण को केंद्रीय राज्यमंत्री का दर्ज़ा मिल सकता है.

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कचरे के चलते रोजी-रोटी का संकट

नई परियोजनाओं पर आठ महीने के लिए रोक लगना धनबाद में गर्त में जाते उद्योग जगत के लिए एक और चुनौती है. खासकर रोजगार के दृष्टिकोण से यह निर्णय विकट स्थिति पैदा करने के लिए का़फी है. धनबाद ज़िला प्रशासन, कोल कंपनियों के प्रबंधन और राज्य सरकार की अदूरदर्शी सोच के कारण यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है. अगर तीनों में से किसी ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई होती तो आज इस स्थिति का सामना न करना पड़ता. इतना ही नहीं, अगर अगले आठ महीनों में भी कोई परिवर्तन न हुआ तो निश्चित रूप से लोगों के सामने और भी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.

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