बिजली मिलेगी, लेकिन बैगाओं पर तो गिरेगी

मंडला ज़िले के चुटका नामक ग्राम में न केवल महाकौशल बल्कि पूरे मध्य भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र स्थापित करने की तैयारियां चल रही हैं. यह भूभाग बैगा आदिवासियों का प्रमुख क्षेत्र है और पर्यावरण की दृष्टि से भी का़फी महत्वपूर्ण है.

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बैगन पर बवाल, सेहत का सवाल

काफी दिनों से बीटी बैगन को लेकर पूरे देश में व्यापक बहस चल रही है. इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं. कहने का मतलब यह है कि बीटी बैगन सुर्ख़ियों में है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आख़िर बीटी बैगन है क्या?

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दिल्‍ली का बाबू : हरित ऊर्जा को अपनाएं

हालांकि सरकार हरित ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने में मुश्किलें आ रही हैं. हालांकि न्यू एंड रीन्यूवल एनर्जी विभाग के मंत्री ने विभिन्न मंत्रालयों को इस मुद्दे पर पत्र लिखा है, जिनमें रक्षा, रेल और पर्यटन मंत्रालय शामिल हैं.

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इस जलवायु में कोई बदलाव नहीं

वर्ष 2009 भारतीय वन क्षेत्र, तटीय इलाक़ों और कृषि योग्य भूमि के लिए बेहद अव्यवस्थित रहा. इस वर्ष लगभग हर महीने उद्योग और बुनियादी ढांचों के निर्माण की 100 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. नतीजतन आवास, जीविका और उन पर अपने अधिकारों की लड़ाई का नज़ारा हर तरफ़ देखने को मिला.

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केलो नदी को बचाने की जरूरत

ख़मरिया गांव भारत के बाक़ी गांवों से कम भाग्यशाली नहीं है. इसकी सा़फ-सुथरी गलियां, सलीके से बनाए गए मिट्टी के घर यह बताते हैं कि दूसरे ग्रामीण इलाक़ों की समृद्धि किस तरह हो सकती है. केलो नदी इसी

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विज्ञापनों का झूठ और आम उपभोक्ता

किसी वर्ग, लिंग या फिर सामाजिक परिदृश्य में विज्ञापनों की विवेचना कोई नई बात नहीं है. वास्तव में ऐसी बहस परिवार और मित्रों के बीच होती रहती है. मुझे यह जानने की जिज्ञासा है कि इस सभ्य समाज में रहने का सबसे बेहतर तरीक़ा क्या है? किस क़िस्म का भोजन हमारे लिए सबसे उचित है या फिर बच्चों के लिए मनोरंजन के क्या साधन सही हैं? विकास का वह कौन सा स्तर है, जो हमारे लिए ज़रूरी है, लेकिन जिसे पाना बहुत ही कठिन है?

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क्यों पूजते हैं पत्थर

पत्थर भी हमारी तरह जीवात्मा हैं. फिर, हमें यह भी ज्ञात है कि वैज्ञानिक पत्थर की उम्र भी निकालते हैं और किसी पत्थर को डेड स्टोन अर्थात मृत पाषाण भी घोषित करते हैं. उनके इस प्रकरण से स्पष्ट होता है कि पत्थर का अपना जीवन-काल होता है. उसकी उत्पत्ति होती है और अंत भी होता है. ये सारे लक्षण सजीव के होते हैं, अत: पत्थर भी सजीव हुआ.

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इतनी बडी कीमत चुकाएगी देवभूमि?

आज स्थिति यह है कि दिसंबर के महीने में औली में हम कृत्रिम बर्फ पर निर्भर हो रहे हैं. आज यहां का हर पर्यावरण प्रेमी इस चिंता से ग्रसित है कि हज़ारों पेड़ों और बुग्यालों की बलि चढ़ाकर सैफ खेल भले ही संपन्न हो जाएं, लेकिन क्या इसके बाद भी औली में बर्फबारी स्नोगन मशीनें ही करेंगी? हर पहाड़ प्रेमी को पर्यावरण के नाम पर शोर मचाने वालों की चुप्पी रहस्यमय लग रही है और अखर भी रही है

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खुद को बदलें, पर्यावरण बदलेगा

जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा प्रभाव ग़रीब और समाज के सबसे निचले तबके पर पड़ेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इनके हाथों में बहुत ही सीमित क्षमता, योग्यता और स्रोत हैं. इसलिए समाज के इन वर्गों के जीविकोपार्जन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की ज़रूरत है. जलवायु परिवर्तन की गंभीर समस्या में नगण्य योगदान के बावजूद सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वालों में यही लोग होंगे.

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विनाशकारी विकास मंजूर नहीं

विकास प्रक्रिया आज एक हक़ीक़त है और?इस हक़ीक़त से पैदा हो रहे सवालों को जानना इससे भी अधिक दिलचस्प है. जैसा कि हम जानते हैं कि आज शहरों में विकास की तेज़ रफ़्तार की वजह से ही भूमि सबसे बड़ी पूंजी के तौर पर उभर रही है.

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यह सादगी नज़रों का धोख़ा है !

यदि आप अगाथा क्रिस्टी-पोइरट की किसी भी मर्डर मिस्ट्री ड्रामा में हत्यारे के बारे में जानना चाहते हैं, तो एक आसान से सवाल का जवाब दीजिए. आख़िर पैसा किसे मिला? यदि आप दिल्ली की पेचीदगी भरी भूलभुलैया से निकलना चाहते हैं, तो आप भी यही सवाल पूछिए.

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ग़ायब हो रहे हैं जंगल

गैरसरकारी संस्था आदिवासी जनजाति अधिकार मंच के संरक्षक प्रताप लाल मीणा इसे प्रशासन की कमज़ोरी बताते हैं. वह कहते हैं कि ‘सरकार सौ दिन के रोज़गार को सही ढंग से लागू नहीं करा पा रही, इसलिए लोग जंगलों की खुदाई कर रहे हैं.’ हक़ीक़त भी कुछ ऐसी ही है. नरेगा के अंतर्गत लोगों को जितने दिन रोज़गार मिलता है, काम करते हैं, बाक़ी दिन जंगल ही इन्हें रोज़गार देता है.

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