मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के भोले-भाले मेहनतकश किसानों की सहानुभूति बटोर कर अपनी राजनीति चमकाना तो जानते हैं, लेकिन वे किसानों के हित में काम कैसे करते हैं, इसकी नज़ीर यह है कि किसानों की क़र्ज़ मा़फी की घोषणा हुए एक वर्ष हो गया, लेकिन आज भी नौ लाख किसान अपनी क़र्ज़ मा़फी का इंतजार कर रहे हैं
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मगध प्रमंडल के गया ज़िले के अतरी प्रखंड में नरावट पंचायत के साठ दलित परिवारों ने दृढ़ इच्छाशक्ति, सामूहिकता एवं एकता की जो मिसाल क़ायम की है, वह समाज के सभी वर्गों के लिए प्रेरणाप्रद है. मुरली पहाड़ी की तलहटी में बसा है नरावट पंचायत का टोला वनवासी नगर.
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धान के कटोरे के रूप में विख्यात रोहतास की धरती पर दिन-रात मेहनत करने वाले किसानों की कहानी देश के अन्य हिस्सों में खेती करने वाले किसानों से अलग होती जा रही है. जहां ऐन वक़्त पर खाद की किल्लत से किसानों की कमर लगातार टूटती जा रही है, वहीं सरकारी खरीद केंद्रों पर सक्रिय बिचौलिए किसानों का हक़ मार रहे हैं.
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यह वही चंपारण है, जहां कभी गांधी जी ने भूमिहीन एवं ग़रीब किसानों को भय से मुक्ति और राहत दिलाने के लिए मशाल जलाई तथा उसे देश के कोने-कोने में ले गए थे.
Tags: Agriculture, Champaran, Gandhi G, Kumar, Uttar Pradesh, farmers, sugar, sugar cane, उत्तर प्रदेश, कृषि, गन्ना, चंपारण, चीनी, नीतीश Posted in आर्थिक, जरुर पढें, राज्य, समाज by Author: चौथी दुनिया ब्यूरो | No Comments » | Read More... |
कृषि आधारित राज्य बिहार के किसान बड़े ही अजीबोगरीब दौर से गुज़र रहे हैं. सूबे की भौगोलिक बनावट और आपदाओं की मार ने किसानों की कमर तोड़ दी है. उनके जख्मों पर मरहम लगाने का दावा करने वाली सरकारी एवं गैर सरकारी एजेंसियों के कारनामे किसानों के नाम पर हो रही हीलाहवाली साफ बयां करते हैं. पूर्वोत्तर ज़िले का अधिकांश भू-भाग हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है. गंगा, गंडक, कोसी और कमला बलान किसानों को खून के आंसू रूलाती हैं. वहीं दक्षिण बिहार का अधिकांश भू-भाग पठारी है या फिर नक्सल प्रभावित. इस वजह से इलाक़े के किसानों के लिए खेती अब निर्भरता का जरिया नहीं रह गई है.
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भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाले वी पी सिंह कई वर्षों से किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, लेकिन उन्होंने किसान आंदोलन का जो बीज बोया है, उसके फलने-फूलने का समय आ गया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश भर के किसानों की आशा जगी है.
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बीते 19 नवंबर को दिल्ली का नज़ारा आम दिनों से अलग था. स़डक पर वाहनों की जगह जनसैलाब. हाथों में गन्ने का पौधा लेकर सरकार के खिला़फ नारा लगाते हज़ारों किसान. जंतर-मंतर के एक तऱफ हुक्का गु़डगु़डाते किसान यूनियन के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत तो दूसरी ओर राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख चौधरी अजीत सिंह अपने-अपने समर्थकों के साथ डटे थे. उसी दिन संसद का सत्र शुरू होकर अगले दिन तक के लिए स्थगित भी हो चुका था. सो, नेताओं के पास समय की कमी नहीं थी. अलग-अलग घाट का पानी पीने वाले विभिन्न नेता यानी समूचा विपक्ष एक साथ, एक ही मंच से यूपीए सरकार का मर्सियां प़ढने में जुटा हुआ था. ज़ाहिर है, ऐसा मौक़ा बार-बार नहीं मिलता, वह भी बिना कुछ किए-धरे. दरअसल यह सारा विरोध केंद्र सरकार की नई गन्ना नीति को लेकर है. केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया है, जिसके तहत गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) साल 2009-10 के लिए 129 रुपये 85 पैसे प्रति क्विटल तय किया गया है. साथ ही इस अध्यादेश के मुताबिक़, अगर राज्य सरकारें गन्ने का मूल्य एफआरपी से अधिक तय करती हैं तो उसकी भरपाई भी राज्य सरकार को ही करनी प़डेगी.
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आप सांसद हैं, देवता नहीं |
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