नवलगढ़ एजेंडाः किसानों को मिले डबल-डबल फार्म इन्कम

मोरारका फाउंडेशन के चेयरमैन श्री कमल मोरारका ने इस मौके पर किसानों को संबोधित करते हुए जैविक कृषि का महत्व

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ऐसे करें घर बैठे मशरुम की खेती

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत काम करने वाले भारतीय बाग़वानी अनुसंधान संस्थान बंगलुरू ने घरेलू स्तर पर मशरूम उत्पादन को प्रोत्साहित करने का एक कार्यक्रम तैयार किया है, जिसके तहत महिलाओं को घर बैठे उपभोग के लिए मशरूम मिलने के अलावा आय अर्जित करने का भी मौक़ा मिलता है.

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अरबों रुपए की राशि खर्च होने के बाद भी नहीं हुआ पानी का बहाव पचास साल में भी अधूरी है तिलैया सिंचाई परियोजना

दक्षिण बिहार के गया-नवादा जिले के साथ-साथ झारखंड के करीब एक लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के लिए शुरू की

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झारखंड में अधिकारियों और बिचौलियों का बेजोड़ गठजोड़ : घोटालों में डूबा डोभा प्रोजेक्ट

राज्य की महत्वाकांक्षी डोभा निर्माण योजना भी घोटालों की भेंट चढ़ गया. गांव एवं खेतों में बने गड्ढे का फोटो

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रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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यूपीए सरकार का नया कारनामा : किसान कर्ज माफी घोटाला

आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.

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शेखावटी- जैविक खेती : …और कारवां बनता जा रहा है

पंजाब में नहरों का जाल है. गुजरात और महाराष्ट्र विकसित राज्य की श्रेणी में हैं. बावजूद इसके यहां के किसानों को आत्महत्या करनी प़डती है. इसके मुक़ाबले राजस्थान का शेखावाटी एक कम विकसित क्षेत्र है. पानी की कमी और रेतीली ज़मीन होने के बाद भी यहां के किसानों को देखकर एक आम आदमी के मन में भी खेती का पेशा अपनाने की इच्छा जागृत होती है, तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई ठोस वजह होगी. आखिर क्या है वह वजह, जानिए इस रिपोर्ट में:

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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मक्का उत्पादकों का दर्द : अनाज की क़ीमत किसान तय करें

जनकवि नागार्जुन ने अकाल के बाद शीर्षक से यह कविता उस दौर में लिखी थी, जब देश में न तो हरित क्रांति आई थी और न आधुनिक तरीक़े से खेती होती थी. उस समय किसान अपनी खेती पूरी तरह परंपरागत ढंग से करते थे.

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वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं.

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जैविक खेती समय की जरूरत

राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है.

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शेखावटीः जैविक खेती और बाजार प्रणाली

कुछ व़क्त पहले तक लोग ऑर्गेनिक फूड की ख़ूबियों से वाक़ि़फ नहीं थे. यह विदेशियों की पसंद ज़्यादा हुआ करता था, पर अब हालात बदल चुके हैं. अब भारतीय बाज़ार न स़िर्फ ऑर्गेनिक उत्पादों से भरे पड़े हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर जैविक खेती भी की जा रही है. भारत में जैविक उत्पादों को बढ़ावा देने का श्रेय देश के मशहूर उद्योगपति कमल मोरारका द्वारा संचालित मोरारका फाउंडेशन को जाता है.

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बिहारः पांच हजार एकड़ भूमि पर माओवादी प्रतिबंध

प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने ज़िले के विभिन्न प्रखंडों में सौ से अधिक लोगों की लगभग पांच हज़ार एकड़ भूमि पर आर्थिक नाकेबंदी लगा रखी है, जिसके कारण पिछले कई वर्षों से इस भूमि पर खेती नहीं हो पा रही है. माओवादियों के डर से प्रतिबंधित भूमि पर कोई भी व्यक्ति बटाई खेती करने के लिए भी तैयार नहीं है. जिन लोगों की भूमि पर खेती प्रतिबंधित की गई है, उनमें अधिकांश अपने-अपने गांव छोड़कर ज़िला मुख्यालय गया अथवा अन्य शहरों में रह रहे हैं.

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अंधाधुंध औद्योगिकरणः विकास या विनाश?

विकास के वैसे तो अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं, लेकिन जब विकास का रास्ता आगे चलकर विनाश पैदा करे तो ऐसे विकास की कितनी ज़रूरत सरकार को होनी चाहिए? खासकर तब, जब मामला लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ा हुआ हो. ऐसे में लोगों की ज़िंदगी पर कितना असर पड़ता है, यह बात सोचने पर जेहन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं.

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प्रशासन की उदासीनता से पान की खेती को लगा ग्रहण

महोबा जनपद कभी पान कृषि का एक बड़ा गढ़ रह चुका है. कुछ दशक पूर्व तक यहां बड़े पैमाने पर पान की खेती आबाद थी. सैकड़ों बीघा भूमि में पैदा होने वाला यहां का देशावरी पान बिक्री हेतु देश के कोने-कोने में भेजा जाता था, लेकिन अब इस पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

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विचारधारा का फासीवाद

चीन से एक दिल दहला देने वाली ख़बर आई है. क़ानून का ज़बरदस्ती और कड़ाई से पालन कराने की कई ख़बरें चीन से आती ही रहती हैं, लेकिन अभी जो ख़बर बाहर निकल कर आई है, वह एक विकसित राष्ट्र और शासन करने वाली पार्टी की विचारधारा पर कलंक की तरह है.

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जैविक खेती में देशी प्रजाति को बढ़ावा मिलाः मुकेश गुप्‍ता

मुकेश गुप्ता मोरारका फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक होने के साथ-साथ जैविक खेती के विशेषज्ञ भी हैं. चौथी दुनिया संवाददाता शशि शेखर ने नवलगढ़ यात्रा के दौरान मुकेश गुप्ता से जैविक खेती के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की. मसलन, किसानों को अपनी जैविक उपज के लिए बाज़ार कैसे मिले?

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जैविक बनाम रासायनिक खेती

आमतौर पर यह माना जाता है कि ज़्यादा मात्रा में रासायनिक खाद एवं कीटनाशक इस्तेमाल करने से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और उत्पादन बढ़ने से किसान का मुना़फा बढ़ सकता है. सरकार भी किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की सलाह देती है, लेकिन इस वैज्ञानिक विधि का अर्थ स़िर्फ और स़िर्फ रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल तक ही सीमित होता है.

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जैविक खेतीः सफलता की कहानी किसानों की जुबानी

एक बहुत पुराना नुस्खा है, जब समस्या बहुत बढ़ जाए तो मूल की ओर लौटो. आज देश में किसानों के आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं ने साफ कर दिया है कि अब व़क्त मूल की ओर लौटने का है. इसका अर्थ यह है कि खेती तब भी होती थी, जब रासायनिक खाद और ज़हरीले कीटनाशक उपलब्ध नहीं थे. तब गोबर किसानों के लिए बेहतर खाद का काम करता था.

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शेखावटी का चेहरा बदल रहा है

वीरों और धनकुबेरों की भूमि शेखावाटी बदल रही है. शेखावाटी के झुंझुनू, चुरु और सीकर ज़िलों में बदलाव की बयार महसूस की जा सकती है. अर्द्ध रेतीली ज़मीन पर विकास की बहती धारा साफ देखी जा सकती है. ऐसा विकास, जो किसी सरकारी दान का मोहताज नहीं है.

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किसानों की उम्मीदों पर पानी

आज़ादी मिलने के 63 वर्षों के बाद भी कृषि आधारित सारण ज़िले के पश्चिमी सीमांत क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों की ज़िंदगी फटेहाल है. सरकार के लाख दावों के बावजूद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है. दशकों पूर्व मांझी विधानसभा क्षेत्र के अधीन एकमा, रसूलपुर, ताजपुर, पकवारइनार एवं दाऊदपुर आदि गांवों में लगाए गए सरकारी ट्यूबवेल बिजली के अभाव में बंद पड़े हैं,

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सार-संक्षेपः गृहयुद्ध का रूप है नक्सलवाद

पुरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरू निश्चलानंद सरस्वती देश में बढ़ते नक्सलवादी प्रभाव और आतंक को भारत में गृहयुद्ध का एक रूप मानते हैं. इनका कहना है कि नेपाल की तरह ही हिन्दू बहुल भारत राष्ट्र की एकता अखंडता और सुरक्षा को विदेशी षड़यंत्रकारी नष्ट करना चाहते हैं और इसके लिए वह नक्सलवादियों को खुला प्रोत्साहन देने के साथ हर तरह की मदद भी कर रहे हैं.

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जमीन छीनकर मदजूर बनाया

कोरबा ज़िले के रैकी गांव के 360 भूविस्थापित खातेदार दो साल से इंतजार कर रहे हैं कि 126 मेगावॉट क्षमता के विद्युत संयंत्र वाले एस.व्ही. पॉवर प्लांट प्रबंधन उन्हें कब सहारा देता है.

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