आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.
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पंजाब में नहरों का जाल है. गुजरात और महाराष्ट्र विकसित राज्य की श्रेणी में हैं. बावजूद इसके यहां के किसानों को आत्महत्या करनी प़डती है. इसके मुक़ाबले राजस्थान का शेखावाटी एक कम विकसित क्षेत्र है. पानी की कमी और रेतीली ज़मीन होने के बाद भी यहां के किसानों को देखकर एक आम आदमी के मन में भी खेती का पेशा अपनाने की इच्छा जागृत होती है, तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई ठोस वजह होगी. आखिर क्या है वह वजह, जानिए इस रिपोर्ट में:
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ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.
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जनकवि नागार्जुन ने अकाल के बाद शीर्षक से यह कविता उस दौर में लिखी थी, जब देश में न तो हरित क्रांति आई थी और न आधुनिक तरीक़े से खेती होती थी. उस समय किसान अपनी खेती पूरी तरह परंपरागत ढंग से करते थे.
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राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है.
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कुछ व़क्त पहले तक लोग ऑर्गेनिक फूड की ख़ूबियों से वाक़ि़फ नहीं थे. यह विदेशियों की पसंद ज़्यादा हुआ करता था, पर अब हालात बदल चुके हैं. अब भारतीय बाज़ार न स़िर्फ ऑर्गेनिक उत्पादों से भरे पड़े हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर जैविक खेती भी की जा रही है. भारत में जैविक उत्पादों को बढ़ावा देने का श्रेय देश के मशहूर उद्योगपति कमल मोरारका द्वारा संचालित मोरारका फाउंडेशन को जाता है.
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प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने ज़िले के विभिन्न प्रखंडों में सौ से अधिक लोगों की लगभग पांच हज़ार एकड़ भूमि पर आर्थिक नाकेबंदी लगा रखी है, जिसके कारण पिछले कई वर्षों से इस भूमि पर खेती नहीं हो पा रही है. माओवादियों के डर से प्रतिबंधित भूमि पर कोई भी व्यक्ति बटाई खेती करने के लिए भी तैयार नहीं है. जिन लोगों की भूमि पर खेती प्रतिबंधित की गई है, उनमें अधिकांश अपने-अपने गांव छोड़कर ज़िला मुख्यालय गया अथवा अन्य शहरों में रह रहे हैं.
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भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत काम करने वाले भारतीय बाग़वानी अनुसंधान संस्थान बंगलुरू ने घरेलू स्तर पर मशरूम उत्पादन को प्रोत्साहित करने का एक कार्यक्रम तैयार किया है, जिसके तहत महिलाओं को घर बैठे उपभोग के लिए मशरूम मिलने के अलावा आय अर्जित करने का भी मौक़ा मिलता है.
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विकास के वैसे तो अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं, लेकिन जब विकास का रास्ता आगे चलकर विनाश पैदा करे तो ऐसे विकास की कितनी ज़रूरत सरकार को होनी चाहिए? खासकर तब, जब मामला लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ा हुआ हो. ऐसे में लोगों की ज़िंदगी पर कितना असर पड़ता है, यह बात सोचने पर जेहन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं.
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महोबा जनपद कभी पान कृषि का एक बड़ा गढ़ रह चुका है. कुछ दशक पूर्व तक यहां बड़े पैमाने पर पान की खेती आबाद थी. सैकड़ों बीघा भूमि में पैदा होने वाला यहां का देशावरी पान बिक्री हेतु देश के कोने-कोने में भेजा जाता था, लेकिन अब इस पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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