वनाधिकार कानून : जंगल का अधिकार जमीन पर उतरता ही नहीं

वन व अन्य प्राकृतिक संपदा पर आश्रित समुदायों के स्वतंत्र एवं पूर्ण अधिकार का विषय वनाधिकार आंदोलन में हमेशा से

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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दिल्‍ली का बाबूः ईमानदारी की सजा

हरियाणा में भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की समस्या बरकरार है. यह वही अधिकारी हैं, जिन्होंने राज्य के वन विभाग में हो रहे घोटालों का पर्दाफाश किया था. सरकार के रवैये से परेशान चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार से यह आग्रह किया था कि उन्हें केंद्र में डेपुटेशन पर बुला लिया जाए, लेकिन उनका आग्रह नामंजूर कर दिया गया.

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वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं.

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केन्द्रीय विशिष्ट वनाधिकार कानून : वन विभाग और पुलिस की मनमानी जारी

उत्तर प्रदेश में वन विभाग एवं पुलिस-प्रशासन द्वारा वनाश्रित समाज पर लगातार हो रहे हमलों में बीते 22 अक्टूबर को एक नया अध्याय तब जुड़ गया, जब जनपद गोंडा की तहसील मनकापुर के वनक्षेत्र में बसे बुटाहनी टांगिया गांव में रहने वाले दलितों पर एसडीएम के नेतृत्व में जमकर लाठियां बरसाई गईं, जिसमें विशेष रूप से महिलाओं को निशाना बनाया गया.

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बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते ख़तरे की घंटी बज चुकी है. हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है. महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन मा़फ़िया नियम-क़ायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं.

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दिल्‍ली का बाबूः जयंती और जंगल में सुधार

वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को मंत्रालय संभाले अभी करीब दो महीने हुए हैं, लेकिन उन्होंने विभाग के भ्रष्ट बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. उन्होंने इस बीच तीन वरिष्ठ वन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की. वन विभाग के महानिरीक्षक सी डी सिंह, जो वन सलाहकार समिति (एफएसी) में भी थे, का तबादला कर दिया गया.

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वनाधिकार कानून और महिलाएं

देश को आज़ादी मिलने के साठ साल बाद 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक क़ानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) क़ानून. यह क़ानून बेहद है. यह केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का क़ानून है.

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पुलिस की तानाशाही और वन गुजरों की जीत

देश में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बावजूद वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनके मूल स्थान से भगाने के प्रयास किए जाते रहते हैं, जिससेउन्हें का़फी परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले दिनों ऐसा ही एक मामला सामने आया. राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के वन गूजर नूर जमाल की गिरफ्तारी के विरोध में वन गूजरों और टांगिया गांव की महिलाओं ने बीते 29 जून को सहारनपुर की बेहट तहसील अंतर्गत आने वाले थाना बिहारीगढ़ का घेराव कर पुलिस को उसे बिना शर्त रिहा करने को मजबूर कर दिया.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए.

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कैलेंडर में कश्मीरा

पहले बिपाशा बसु, फिर मंदिरा बेदी और अब कश्मीरा शाह टॉपलेस हो गईं. यस बॉस, पप्पू पास हो गया, जंगल और सिटी ऑफ गोल्ड जैसी फिल्मों से लोगों के बीच जगह बनाने वाली कश्मीरा बॉलीवुड में बी ग्रेड अभिनेत्री के तौर पर जानी जाती हैं.

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कलम का सच्चा सिपाही

आलोक तोमर के निधन की ख़बर समूचे मीडिया जगत में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. एक पत्रकार साथी ने जैसे ही मुझे बताया कि कलम के सिपाही आलोक तोमर सदा के लिए सो गए तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ.

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अपने बूते जिंदा हैं आदिवासी

कैमूर पर्वत श्रृखंला भारत की प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से है, जहां पर सोन, घाघरा, कर्मनाशा आदि नदियां बहती हैं. वनों से आच्छादित इस क्षेत्र में आदिवासियों का वास रहा है. लेकिन मुगलों व अंग्रेजों के दख़ल के बाद से इस इला़के के आदिवासियों का जीना दूभर हो गया.

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औषधीय पौधों की तस्‍करी

प्राकृतिक वन संपदाओं से संपन्न पूर्वोत्तर के राज्यों में वन क़ानून की ढिलाई और प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त न होने के कारण वन औषधि भंडारों का चीन सहित अन्य पड़ोसी देश दोहन कर रहे हैं. असम, अरुणाचल, मेघालय एवं मिजोरम सहित क्षेत्र के अन्य राज्यों में एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय है, जो हर वर्ष 15 से 20 करोड़ रुपये मूल्य की औषधीय वनस्पतियों की तस्करी करता है.

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कार्बेट नेशनल पार्कः धनवानों की थाप पर नाच रहे हैं वनाधिकारी

विश्वप्रसिद्ध जिम कार्बेट नेशनल पार्क की सीमा पर बने होटल रिसार्ट में वन एवं वन्य क़ानून की तमाम पाबंदियों को तार-तार कर जंगल में मंगल मनाने वाले धनवानों का जमावड़ा लगा हुआ है. धनवानों के धन की थाप पर वनाधिकारी नाच रहे हैं, और यह सब कुछ इस नेशनल पार्क में क्र्रिसमस के दिन से न्यू ईयर तक होगा.

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दिल्‍ली का बाबूः नया चेयरमैन नहीं मिला

राष्ट्रीय राजमार्गों पर आसानी से दिख जाने वाला गड्‌ढा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की अंदरूनी हालत की असली तस्वीर पेश करता है. सरकार ने एनएचएआई के नए अध्यक्ष की तलाश में एक साल तक कोशिश की, लेकिन उपयुक्त उम्मीदवार न मिलता देख वह इसके मौजूदा अध्यक्ष ब्रजेश्वर सिंह को तीन महीने का सेवा विस्तार देने का फैसला लेने के लिए मजबूर हो गई.

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वनाधिकार मान्‍यता कानून का दुरूपयोग

वनाधिकार मान्यता क़ानून के अब तक के क्रियान्वयन के अनुभव बताते हैं कि अब भी आदिवासियों और वनों में रहने वाले कबिलाई लोगों को अन्याय से मुक्ति दिलाने की कोशिशें हो रही हैं. विगत डेढ़ सौ सालों में सरकार ने वन विभाग को जंगलों का मालिक बनाने की पुरज़ोर कोशिशें की, परंतु उनकी खिला़फत होती रही.

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कभी नहीं से देर भली

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि वन और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत वन एवं वन्य जीवों और पर्यावरण मामलों के लिए अलग-अलग विभाग होंगे. मौजूदा व्यवस्था में पर्यावरण मंत्रालय के अधीन वन्यजीवों के लिए एक अलग शाखा है, जिसके मुखिया पर्यावरण सचिव विजय शर्मा हैं.

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सार-संक्षेप

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था.

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विंध्‍य हर्बल सफल सहकारी संस्‍था

सरकारी प्रयासों से जनकल्याण के काम बिना रुकावट पूरे होते रहें, यह लगभग असंभव बात मानी जाती है. पर जब आप मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के द्वारा बनाई गई विंध्य हर्बल संस्था के कामकाज को देखेंगे तो मानेंगे कि जनकल्याण के लिए सरकारी प्रयासों की कमी नहीं है. विंध्य हर्बल संस्था प्रदेश स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेदिक औषधियों से संबंधित संग्रहण, उत्पादन, शोधन, दवा निर्माण एवं उसकी बिक्री का काम करती है.

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वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा

यदि मानवजनित गतिविधियां अपनी मौजूदा गति से जारी रहीं तो औद्योगिक युग से पहले के मुक़ाबले औसत वैश्विक तापमान में सात डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो जाएगी. तापमान में यह वृद्धि 15000 साल पहले, आख़िरी हिमयुग (आइस एज) के बाद पृथ्वी के तापमान में आई वृद्धि से भी ज़्यादा है.

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जीवाश्‍मों की अवैध तस्‍करी

मध्य प्रदेश के धार ज़िले में यत्र-तत्र उपलब्ध साढ़े छह करोड़ वर्ष पुराने जुरासिक काल के जीवाश्मों की बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है. धार ज़िले में डायनासोर जीव के अंडे और कंकाल कई बार मिल चुके हैं. इस वजह से देश-विदेश के पुराजीव वैज्ञानिकों और जीवाश्म शोधकर्ताओं की इस क्षेत्र में रुचि बढ़ी है.

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हाथी हिंसक क्यों हो रहे हैं?

यदि ख़बरों पर विश्वास किया जाए तो पिछले दो दशकों के दौरान हाथियों ने केवल छत्तीसगढ़ में 120 से ज़्यादा मनुष्यों की जान ली है. आंकड़ों की यह सच्चाई बताती है कि विकास के नाम पर जंगलों के कटने और वनस्पतियों के अभाव के कारण पर्यावरण को कितना नुक़सान हो रहा है. अपने ठिकानों पर क़ब्ज़ा होते देखकर जानवर शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं. इसी आपाधापी में वे हिंसक भी होते जा रहे हैं.

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तस्करों के निशाने पर बेज़ुबान

उत्तर प्रदेश में इन दिनों वन्यजीव तस्करों की तूती बोल रही है. वन भूमि पर अवैध क़ब्ज़े किए जा रहे हैं. जंगल सिमट रहे हैं तो जानवर शहर की ओर निकल आने को बाध्य हैं. और, तस्कर यही चाहते हैं कि जानवर कब उनकी निगाह में आएं और कब उन्हें निशाना बनाया जाए.

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