मैला उठाने की प्रथा : स्वचछ भारत में ये अस्वच्छ तस्वीर कहां रखेंगे

सिर पर मैला ढोने या हाथ से मैला उठाने का घिनौना और अमानवीय कार्य आज भी हमारे देश में न

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मोदी सरकार ने तीन साल में हटाए 1159 पुराने क़ानून : क़ानूनी किताब का ‘अंग्रेजी’ पाठ

कानून की किताब में जितने नए अध्याय ज़ुडे हैं, उससे कहीं अधिक हटाए गए हैं. ये ब्रिटिशकालीन अध्याय कानूनी किताब

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वनाधिकार कानून : जंगल का अधिकार जमीन पर उतरता ही नहीं

वन व अन्य प्राकृतिक संपदा पर आश्रित समुदायों के स्वतंत्र एवं पूर्ण अधिकार का विषय वनाधिकार आंदोलन में हमेशा से

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पहचान का संकट ही कश्मीर की समस्या है

आज कश्मीरियों को इस बात की शिकायत है कि भारत में शायद ही किसी को यह पता हो कि कश्मीर

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चलो गांव की ओर: एक अभियान

आजादी के बाद जिस अनुपात में महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों का विकास हुआ उसी अनुपात में गांव पिछड़ता चला

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मंगल मिशन की कामयाबी

हमने यूजीसी को ब्रिटिश ढांचे से उठाया है, लेकिन स़िर्फ शब्दों में, आत्मा से नहीं. यूनिवर्सिटी को इस बात की

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ग्रेट ब्रिटेन से इंग्लैंड की ओर

ब्रिटेन को समझ आ जाना चाहिए कि अब औपनिवेशिक समय का दुनिया से अंत हो चुका है. उससे जु़डे देश

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ख़तरे में पाकिस्तान का लोकतंत्र

तालिबान के साथ कई साल तक अनिश्‍चितता के संबंधों में रहने के बाद पाकिस्तान ने आख़िरकार यह फैसला किया है

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अद्भुत अभिव्यक्ति और जिजीविषा का अनूठा दस्तावेज़

आत्मकथा-हमारे पत्र पढ़ना की लेखिका, कवयित्री एवं कथाकार उर्मिल सत्यभूषण का जन्म पंजाब के गुरुदासपुर ज़िले में बीसवीं शताब्दी के

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न्यायिक सुधारों का समय आ गया हैं

बहुत तेज़ धूप में कोई भी अपनी छत की मरम्मत नहीं करता और न गर्मी के मौसम में बाढ़ राहत

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विदेश नीति में पड़ोसियों को वरीयता

आज़ादी के बाद भारत की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है. भारत की विदेश नीति

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हिंदी को मिले उसका हक़

आज़ादी के तक़रीबन दो दशक पहले 1928 के आसपास चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था, जनता की भाषा एक और शासन

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कमज़ोर विपक्ष कितना कारगर

राजनीतिक लोकतंत्र का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही पुराना है सरकार और विपक्ष के बीच का अंतर. भारत की

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आख़िर कैसे होगा देश का विकास

संघ किस तरह भारत की जनता के जीवन में खुशहाली लाएगा यह देखने की चीज है. नरेंद्र मोदी को जो

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मैं भी मुंह में ज़ुबान रखता हूं…

जितने अजीब भैय्या हैं, उतने ही विचित्र उनके सवाल. वह पूछते हैं कि चुनाव के ही मौसम में नेता लोग

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जिन्हें अपने ही देश में वोट देने का हक़ नहीं

क्या मेघालय हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं है? अगर यह सूबा इस देश का अंग है, तो मेघालय के क़रीब सात

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नरेंद्र मोदी क्या सोचते हैं?

संघ परिवार ने हर तरफ़ हर्ष का माहौल तैयार कर रखा है. संघ का कहना है कि नरेंद्र मोदी बहुमत

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पुराने क़ानूनों में बदलाव की ज़रूरत

हाल में धारा 377, जो अप्राकृतिक सेक्स कोे दंडनीय अपराध मानती है, पर सुप्रीम कोर्ट ने देश के लिए फिर

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…और घटता गया मुसलमानों का असर

आज 23 वर्षों बाद आवश्यकता महसूस होती है कि विश्‍लेषण किया जाए कि टैक्टिकल वोटिंग वास्तव में कितनी प्रभावी और

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कौन बनेगा समलैंगिकों की राजनीतिक आवाज़?

समलैंगिक संबंधों की स्वतंत्रता को लेकर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को इस निर्णय से दु:खी नहीं होना चाहिए और न

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राष्ट्र की एकता को बचाइए

आज भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मुझे जो नितांत आवश्यकता प्रतीत होती है वह है लड़ाई की! लड़ाई किसके विरुद्ध?

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कॉल अन्ना को सफल बनाया बिग वी टेलीक़ॉम ने

अन्ना हजारे द्वारा लड़ी गई जनलोकपाल की निर्णायक लड़ाई के दौरान समूचे देश को अन्ना से जोड़ने और उनके विचारों

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दंगा पीड़ितों के पुर्नवास का संकट

आज़ादी के बाद से अब तक भारत में दंगों का लंबा इतिहास रहा है. पीड़ित अपने पैतृक निवासों से विस्थापित

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मंगल अभियान और आधुनिक भारत

कांग्रेस एक हथियार था जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी ने जनता के संघर्ष के लिए किया. लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने

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भ्रष्टाचारी सरकार का अधिनायकवाद

राष्ट्र के राजनैतिक संकट  का मूल कारण सत्ताधारी दल की अलोकतांत्रिक और सत्तावादी अकांक्षा है. वर्तमान सत्ता देश पर एक

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सामाजिक विसंगतियों का धर्मक्षेत्र

वर्तमान समय में हर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है. आगे बढ़ने की इच्छा में वह कितना हासिल करेगा और कितना

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लक्ष्‍मी सहगल : लड़ाई अब भी जारी है

कैप्टन लक्ष्मी सहगल कभी पहचान की मोहताज नहीं रहीं. उनकी ज़िंदगी का हर पड़ाव उनके राजनीतिक उदय की एक अप्रत्याशित कहानी कहता है. आज़ाद हिंद फौज में कैप्टन बनने से लेकर 2002 में राष्ट्रपति के चुनाव लड़ने तक वह भारतीय राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाती रहीं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की क़रीबी मानी जाने वाली लक्ष्मी सहगल का 94 वर्ष की उम्र में कानपुर में निधन हो गया.

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सरकार खिलाडि़यों से खेल रही है

कुछ दिन पहले पान सिंह तोमर नाम की एक फिल्म आई थी. फिल्म के निर्देशक तिगमांशु धूलिया ने खिलाड़ी से बाग़ी बनने की एक कहानी को रूपहले परदे पर दिखाया. हिमांशु ने इस फिल्म को उन खिलाड़ियों को समर्पित किया, जिन्होंने देश के गौरव और सम्मान के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया और इसके बाद भी वे गुमनामी और बदहाली में जीने को मजबूर रहे.

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इस बार सरकार ने गांधी को मारा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खून से सनी घास एवं मिट्टी, उनका चश्मा और चरखा सहित उनसे जुड़ी 29 चीज़ें ब्रिटेन में नीलाम हो गईं और इस देश का दुर्भाग्य देखिए, सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं किया. इतना ही नहीं, इसके बारे में न तो सरकार ने किसी को बताया और न देश के मीडिया ने यह जानने की कोशिश की कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धरोहर खरीदने वाला व्यक्ति कौन है,

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