विभाजन, युद्ध और प्यार की फिल्में

हिंदी फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उसमें हिंदू-मुस्लिम, पारसी, सिख परिवारों के द्वंद्व पर भी कई फिल्में आईं. भारत-पाकिस्तान

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प्रधानमंत्री जी और राष्ट्रपति जी के भाषण ने मेरी आंखें खोल दी

इस बार 15 अगस्त ने हमें बहुत सारे नए ज्ञान दिए. एक ज्ञान तो ये दिया कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति

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कश्मीर का हल कश्मीर में है : दिल्ली या इस्लामाबाद में नहीं

एक परिप्रेक्ष्य (पर्सपेक्टिव) में अपनी बात रखूंगा. जब एक परिप्रेक्ष्य में बात होती है तो उसमें आपको राजनीति के साथ-साथ

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मोदी के काम आ रही है सरेशवाला की दोस्ती

वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के बाद जब मुसलमानों ने वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र

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संसद दलालों को चिन्हित और बहिष्कृत करे

सुुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैैसले में कोयला घोटाले की रिपोर्ट को सच साबित कर दिया और उसने चार कोल

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कोइ सरहद ना इन्हे रोके….

हिंदुस्तान-पाकिस्तान का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि दोनों देशों के बीच मोहब्बत और नफरत साथ-साथ चलती हैं. कुछ दिनों

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सांप्रदायिकता की राजनीति

सांप्रदायिकता का आरोप झेलने वाले दल या व्यक्ति ये कैसे मान लेते हैं कि मुसलमानों का विरोध करना ही सांप्रदायिकता

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हिंसा हमारी संस्कृति का अंग नहीं है

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के परिप्रेक्ष्य में राहुल गांधी का हालिया बयान सुनाने के बाद एक विषय दिमाग में उथल-पुथल मचाने लगा

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भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए आईओएस का 25 वर्षों का प्रयास

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक बिरादरी का दर्जा रखता है. देश के संविधान ने दूसरे वर्गों के साथ-साथ इस देश के मुसलमानों को भी बराबर के अधिकार दिए हैं, लेकिन आज़ादी के 60 साल से भी ज़्यादा का वक़्त गुज़र जाने के बाद भी, आज मुसलमानों को अपना हक़ मांगना पड़ रहा है.

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मानदेय का अर्थशास्त्र नहीं बदला

बात नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. उस व़क्त मैं अपने शहर जमालपुर से दिल्ली आया था. अख़बारों में लिखना-पढ़ना तो अपने शहर से ही शुरू कर चुका था. लिहाज़ा दिल्ली आने के बाद जब बोरिया-बिस्तर लगा और पढ़ाई शुरू हुई तो उसके साथ-साथ अख़बारों के दफ्तर में इस उम्मीद में चक्कर काटने लगा कि कोई असाइनमेंट मिले, ताकि घर से मिलने वाले पैसों के अलावा कुछ और पैसों का इंतज़ाम हो सके.

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काटजू का जादुई यथार्थवाद

पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वरिष्ठ पत्रकारों एवं संपादकों का जमावड़ा हुआ, मौक़ा था पत्रकार शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन की वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब स्मार्ट रिपोर्टर के विमोचन का. किताब का औपचारिक विमोचन प्रेस परिषद के अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू के साथ-साथ एन के सिंह, आशुतोष, कमर वहीद नकवी एवं शशि शेखर ने किया.

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सत्ता की वसीयत सियासत की विरासत

हिंदुस्तान में अब विरासत की ही सियासत होगी. वंशवाद की ही राजनीति होगी. इस सियासी दुनिया में आम आदमी के लिए जगह पाना तो पहले भी मुश्किल था, अब तो नामुमकिन सी बात होगी. हां, अगर राजनीति में आपका कोई माई-बाप है, तब तो आप सपने संजोने की क़ाबिलियत रखते हैं. अगर नहीं है तो आपको राजनीति में रहने का कोई हक़ नहीं है.

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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का इन पांच राज्यों में न घूमना शुभ संकेत है. शुभ संकेत इसलिए है, क्योंकि अन्ना हजारे की भाषा कांग्रेस विरोधी थी और बाबा रामदेव तो कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालने का ही काम कर रहे थे. इससे ये जनता की शक्ति के प्रतीक न बने रहकर कांग्रेस पार्टी की विरोधी ताक़त के प्रतीक बन रहे थे. इन्होंने कभी जनता की ताक़त, खराब होते लोकतंत्र, खराब होते चुनाव और आशाएं तोड़ते नेताओं को अपना निशाना नहीं बनाया.

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पीत पत्रकारिता : लोकायुक्त प्रारूप पर फ़र्ज़ी ख़बर छापी

बिहार में पत्रकारिता का स्तर कितना गिर रहा है, इसकी एक ताज़ा मिसाल है पटना से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल के नाम से प्रकाशित समाचार, जिसका शीर्षक है- लोकायुक्त का यह प्रारूप रोल मॉडल है.

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यह सवाल नहीं, चिंगारी है

भारतीय जनता पार्टी अपना तर्क रखे और प्रशांत भूषण न रखें. हमारा मानना है कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र को उसके बुरे पहलुओं के जाल में मत फंसने दीजिए. हिंदुस्तान का लोकतंत्र सारी दुनिया में आदर्श लोकतंत्र है. यह ज़िम्मेदारी है स्वयं संघ प्रमुख मोहन भागवत, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली एवं राजनाथ सिंह जैसे लोगों की.

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नालंदा के गौरव के साथ खिलवाड़: यह विश्वविधालय भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है

हिंदुस्तान को सचमुच किसी की नज़र लग गई है. ईमानदारी से कोई काम यहां हो नहीं सकता है. निचले स्तर के अधिकारी अगर भ्रष्टाचार करते हैं तो ज़्यादा दु:ख नहीं होता है, लेकिन जिस प्रोजेक्ट के साथ प्रोफेसर अमर्त्य सेन एवं पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे लोग जुड़े हों और वहां घपलेबाजी हो, बेईमानी हो, ग़ैरक़ानूनी और अनैतिक काम हों तो दु:ख ज़्यादा होता है.

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सरकार आर्थिक अत्याचार बंद करे

हिंदुस्तान में एक अजीब चीज है. महंगाई बढ़ाने में सरकार को बहुत मज़ा आता है. सरकार जानबूझ कर महंगाई बढ़ाती है या ऐसा करना सरकार की मजबूरी है, यह सरकार जाने, वे अर्थशास्त्री जानें, जो झूठे आंकड़े तैयार करते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के लोगों की ज़िंदगी कितनी मुश्किल हो रही है, यह बात न राजनीतिक दल समझ रहे हैं और न सरकार समझ रही है.

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