बात ज्यादा पुरानी नहीं है. यही कोई सात-आठ साल पहले मैं कानपुर (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में कार्यरत था. होली का मौका था, मैं घर पर अपने कमरे में बैठा पुराने अ़खबार पलट रहा था.
यह साल का वह समय है, जबकि लोग होली की तैयारियों में व्यस्त हैं. कुछ लोग इस त्योहार के लिए विभिन्न प्रकार के रंग एकत्र करने में लगे हैं तो कई लोग रंगों से बचने के लिए शहर से दूर जाने की योजना बना रहे हैं. कुछ लोग तो अपने घरों के अंदर ही कैद रहकर रंगों से बचने की सोच रहे हैं. हालांकि, सच यह है कि लोग रंगों से उतना नहीं डरते, जितना रंग के नाम पर चेहरे पर लगाई जाने वाली ख़तरनाक चीज़ों से, जिनकाहोली के मौक़े पर इस्तेमाल किया जाता है और कई बार नुक़सानदायक साबित होता है.
ईद पर हमने प्रार्थना की थी कि सभी के घर ख़ुशियां दस्तक दें, लेकिन दस्तक महंगाई ने दी, दरवाज़ा ऩफरत ने खटखटाया, यहां तक कि देश में होने वाले कॉमन वेल्थ खेलों को न होने देने की धमकी बाहर से भी मिली और अंदर से भी.