अमिताभ बच्चन के घर के बाहर आग, इलाके में मचा हडकंप

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : बॉलीवुड के शहंशाह अभिनेता अमिताभ बच्चन के जूहु स्थित प्रतीक्षा बंगले के पास सोमवार को

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गुजरात चुनाव सब की परीक्षा लेगा

गुजरात विधानसभा चुनाव किसके लिए फायदेमंद होगा और किसके लिए नहीं, यह तो आख़िरी तौर पर दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में पता चलेगा, जब परिणाम आ जाएंगे. लेकिन परीक्षा किस-किस की है, इसका आकलन करना ज़रूरी है. गुजरात विधानसभा चुनाव में पहली परीक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की है. कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके जाने से भीड़ इकट्ठी हो सके. यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभा में भी सारे ख़र्चों और सारी कोशिशों के बावजूद लोगों की संख्या कुछ हज़ारों तक सीमित रहती है.

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अजगर करे रखवाली

यह ख़बर पढ़कर आप चौंक भी सकते हैं, क्योंकि यह चौंकाने वाली ही बात है. इसे पढ़ने के बाद आपके मुंह से भी यही निकलेगा कि भला ऐसा भी होता है क्या? अभी तक तो आपने कुत्तों को घर की रखवाली करते देखा होगा, लेकिन सांप को घर के बाहर रखवाली करते नहीं देखा होगा.

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बाटला हाउस मुठभेड़ कांड पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट क्‍या कहती है

बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के डेढ़ वर्ष बीतने के बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग फिर से तेज़ हो गई है. मानवाधिकार के विभिन्न संगठनों और आम लोग इस मुठभेड़ पर लगातार प्रश्न उठाते रहे हैं और अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उनके सवालों को अधिक गंभीर बना दिया है.

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देश की आधी मुठभेड़ फर्जी हैं

सोलह साल में 2560 पुलिस और कथित अपराधी मुठभेड़. और इनमें से 1224 फर्ज़ी. यानी, भारत की हरेक दूसरी मुठभेड़ फर्ज़ी है. इतना ही नहीं, इस 1224 फर्जी मुठभेड़ की लिस्ट में बाटला हाउस मुठभेड़ का नाम भी शामिल हो गया है. हालांकि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिल्ली पुलिस को पहले क्लीन चिट दे दी थी.

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प्रशासनिक अनुशासनहीनता और अराजकता का चरम दौर

मध्य प्रदेश में इन दिनों शासन-प्रशासन में अनुशासनहीनता और अराजकता का चरम दौर चल रहा हैं. मंत्री आपस में एक दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं, तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे तत्व सरकारी कर्मचारी, विधायकों और मंत्रियों से खुलकर लड़ झगड़ रहे हैं.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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