3डी फिल्में देखते हैं तो हो जाएं सावधान, शरीर में होगी ये बड़ी समस्या

नई दिल्ली : आजकल के दौर में मनोरंजन की बात करें तो 3डी फिल्मों का चलन तेज़ी से बढ़ता जा

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इंसानों के लिए घातक है ये कीड़ा, देखते ही हेल्पलाइन को सूचित करने के आदेश

नई दिल्ली : वैसे तो हमारे घरों में अक्सर कई ऐसे कीड़े दिखाई दे जाते हैं जिन्हें हमने पहले कभी

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स्वाइन फ्लू : भीड़-भाड़ वाले इलाकों में जाने से बचें

किसी भी इंफ्लुएंजा के वायरस का मानवों में संक्रमण श्‍वास प्रणाली के माध्यम से होता है. आम फ्लू के वायरस

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प्राकृतिक आपदा के लिए इन्सान जिम्मेदार

कश्मीर में बाढ एक विशेष स्थिती थी लेकिन इसे विशेष सहायता नहीं मिली. हां, स्वैच्छिक सहायता मुस्तैदी से पहुंच रही

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सरल शब्दों में जीवन की अभिव्यक्ति

हाल में आरोही प्रकाशन ने रेणु हुसैन की कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित किए हैं. पहला कविता संग्रह है पानी-प्यार और दूसरे कविता संग्रह का नाम है जैसे. अंग्रेज़ी की वरिष्ठ अध्यापिका रेणु हुसैन स्कूल के व़क्त से ही कविताएं लिख रही हैं.

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समकालीन हिंदी कविता और उसकी आलोचना

किसी रचना को देखने-परखने के लिए वैचारिक, राजनीतिक एवं सामाजिक चिंताओं जैसे उसके बाहरी संदर्भों के साथ-साथ बनावट-बुनावट एवं उसके अंतर्लोक में प्रवेश का प्रयास भी आलोचना में होना चाहिए. आई ए रिचड्‌र्स के ज़माने से शुरू हुई टेक्सचुअल क्रिटिसिज्म छिटपुट प्रयत्नों के अलावा गहरी कोशिश कहीं नहीं दिख रही है.

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कुत्तों की त्रासदी

इस बात से तो सभी वाक़ि़फ हैं कि कुत्ते इंसान से भी अधिक संवेदनशील होते हैं, लेकिन आप इस बात से वाक़ि़फ नहीं होंगे कि वे मानसिक रोग के भी शिकार हो जाते हैं. युद्ध प्रभावित इराक और अ़फग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना के साथ तैनात कुत्ते युद्ध की भयावह यादों से संबंधित विकृति का शिकार हो रहे हैं.

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कोई मालिक नहीं

प्रकृति का नियम है कि कुछ न कुछ काम आदमी को करना ही पड़ता है. काम न करने में भी एक विशेष क्रिया की प्रेरणा सन्निहित है. अगर एक आदमी काम नहीं कर रहा है तो उसके हिस्से का काम किसी दूसरे को करना ही पड़ेगा.

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रंगों की कहानी रंगों की ज़ुबानी

मानव सभ्यता में रंगों का का़फी महत्व रहा है. हर सभ्यता ने रंगों को अपने तरीक़े से अपनाया. दुनिया में रंगों के इस्तेमाल को जानना भी बेहद दिलचस्प है. कई सभ्यताओं को उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों की वजह से ही पहचाना गया.

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सामाजिक विशमता मानव नस्ल का

आप पूछ सकते हैं कि भाई, जिन आदमियों के पास खाने को पर्याप्त रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उन सबको समान बंटवारा कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या आप मानते हैं कि वे उस प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं करेंगे? क्या उन्हें प्राथमिकता का ज्ञान या ध्यान रहेगा? वे लोग मिली हुई धनराशि जुए या अन्य किसी दुर्व्यसन में खर्च करके फिर उसी तरह रोटी-कप़डे के मोहताज नहीं बन जाएंगे?

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इंसानों की बलि

अभी तक आपने जानवरों की बलि से जुड़ी कई घटनाओं के बारे में सुना होगा, लेकिन पेरू के पुरातत्वविदों की मानें तो एक ऐसी जगह भी है, जहां छठवीं शताब्दी में इंसानों की बलि दी जाती थी. इस जगह का नाम लैम्बेक है. यह पेरू के उत्तरी भाग में स्थित है.

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तस्‍करी की शिकार महिलाओं का पुनर्वास कैसे हो?

यह कविता (बांग्ला से अनुवाद) है यौवन की दहलीज पर खड़ी चांदनी की, जो कोलकाता के एक होम में अपनी नई ज़िंदगी के सपने के साथ खुले आकाश में उड़ना चाहती है. चांदनी जैसी लाखों लड़कियां देश भर के सैकड़ों सरकारी और ग़ैर सरकारी होम या सुधारगृहों में बैठकर सपने बुनती हैं, पर कितनों को उज्ज्वल भविष्य की सौगात मिलती है, इस पर बहुतों का ध्यान नहीं जाता.

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दिल्‍ली का बाबू : कपिल सिब्बल का बदला मिजाज

ऐसा लगता है, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने शिक्षा क्षेत्र में शीर्ष पदों पर नौकरशाहों को नियुक्त न करने के अपने पुराने फैसले को तिलांजलि दे दी है. पिछले साल तक सिब्बल का स्पष्ट रवैया था कि वह शिक्षा विभाग में शीर्ष पदों पर नौकरशाहों की अपेक्षा शिक्षाविदों की नियुक्ति के पक्ष में हैं, लेकिन अब वह अपनी बात से पीछे हटते दिख रहे हैं.

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सार-संक्षेप

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था.

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मजदूरों की रोज़ी—रोजी छीनी

कहते हैं, पेट की भूख इंसान से कुछ भी करा सकती है. इसी के चलते कुछ लोग वतन बदर होकर परदेश में रोजी-रोटी की तलाश करते हैं. घर छोड़ अपनों से दूर रहकर कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी और झमाझम बरसात के मौसम में उन्हें पेट की खातिर स़िर्फ और स़िर्फ काम करना होता है. कुछ ऐसी ही व्यथा है झारखंड राज्य के पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, लोहरदगा आदि ज़िलों से बिहार के रोहतास, कैमूर एवं भोजपुर में मज़दूरी करने आने वाले प्रवासी मज़दूरों की.

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