छत्तीसगढ़ पुलिस पर ‘बलात्कार’ का आरोप, मानवाधिकार आयोग ने भेजा नोटिस

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : राष्ट्रीय मनावाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ के पुलिसकर्मियों द्वारा 16 महिलाओं से बलात्कार और हिंसा को

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राष्ट्र हित पर भारी पडा़ कांग्रेस हित

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के विरुद्ध प्रस्ताव लाया गया, जिसमें श्रीलंका द्वारा लिट्टे के विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई के समय मानवाधिकार हनन की निंदा की गई. 47 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में 24 सदस्यों ने प्रस्ताव के समर्थन में मत दिया, जबकि 15 ने इसके विरोध में मतदान किया.

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भारत-श्रीलंका : फिर उठा तमिल मुद्दा

श्रीलंका पर आरोप लग रहा है कि तमिल विद्रोहियों के खिला़फ चलाए गए सैन्य अभियान में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार का हनन हुआ है. यह मुद्दा तो एलटीटीई के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने के समय से ही उठाया जा रहा था, लेकिन अभी जब चैनल 4 पर एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई तो एक बार फिर से यह चर्चा में आ गया.

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रूस : पुतिन की वापसी

रूस की जनता ने ब्लादिमीर पुतिन को अपना राष्ट्रपति चुना है. विगत चार मार्च को रूस में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराए गए, जिसमें पुतिन को लगभग 64 फीसदी मत मिले. उनके विरोधियों में से किसी ने बीस प्रतिशत मत नहीं पाए. कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार गेन्नादी ज्युगानोव को लगभग 18 फीसदी मत मिले, जबकि अन्य उम्मीदवार दहाई के अंक तक नहीं पहुंच सके. रूस के एक बड़े उद्योगपति मिखाइल प्रोखोरोव को लगभग 7.9 फीसदी मत मिले.

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मनोज झलानी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालए गए

1987 बैच के आईएएस अधिकारी मनोज झलानी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में संयुक्त सचिव बनाए गए हैं. वह ब्रज किशोर प्रसाद की जगह लेंगे.

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मालदीव में सत्ता परिवर्तन : भारत के सामने चुनौती

मालदीव में शांतिपूर्ण तरीक़े से सत्ता परिवर्तन हो गया है. मोहम्मद नशीद ने राष्ट्रपति पद से इस्ती़फा दे दिया तथा उपराष्ट्रपति मोहम्मद वाहिद हसन को राष्ट्रपति बना दिया गया. कुछ दिनों से चल रहा राजनीतिक संकट समाप्त होता दिखाई दे रहा है. लेकिन मोहम्मद नशीद का इस्ती़फा देना, सत्ता परिवर्तन को राष्ट्र हित में घोषित किया जाना, वर्तमान राष्ट्रपति का यह बयान कि उसे पुलिस और सेना का समर्थन हासिल है

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धर्म के नाम पर राजनीति के शिकार मुसलमान

मुस्लिम विद्वान को पहले नियुक्त किया और फिर उन्हें हटा दिया. इस घटना को अभी अधिक दिन नहीं हुए थे कि उसने सलमान रुश्दी और सैटेनिक वर्सेस का मुद्दा छेड़ दिया. उसने कहा कि सलमान रुश्दी को वीज़ा न देकर भारत आने से रोक दिया जाए. तस्लीमा नसरीन को भी धमकी दी जाती है. वह बांग्लादेश की हैं और एक महिला भी हैं. यहां तक कि वामदल भी तस्लीमा नसरीन और उनकी मानवाधिकार की लड़ाई में उनके साथ नहीं है

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चुनौती बनता चीन

चीन की नई-नई गतिविधियां चिंतित कर रही हैं. वह अपने आगे भारत सरीखे देशों को तो कुछ समझता ही नहीं है, उसके लिए अमेरिका की भी कोई खास अहमियत नहीं है. वह अमेरिका विरोधी गतिविधियां भी संचालित कर रहा है. वैसे भारत के लिए यह सुखद है कि वह चाहे तो चीन को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकता है. चीनी गतिविधियों से अमेरिका भी ख़़फा है और चीन के विरुद्ध कार्रवाई के लिए मौक़े की तलाश में है. चीन दुनिया के कई देशों के लिए चुनौती बनता जा रहा है. वह भारत, जापान, नार्वे, दक्षिण कोरिया जैसे देशों को जब-तब झिड़क देता है और अब अमेरिका के विरुद्ध भी चलने की हिम्मत जुटाने लगा है. बावजूद इसके यह समझ से परे है कि आख़िर कोई भी देश चीन के विरुद्ध ठोस क़दम क्यों नहीं उठा रहा है. खासकर अमेरिका को तो चीन के मसले पर कोई न कोई निर्णय लेना ही चाहिए. दुनिया में चीन की दबंगई बढ़ती जा रही है और अन्य देश चुपचाप इसे देख रहे हैं. चुनौती बनते चीन की चतुराई भरी गतिविधियों को सहन करना भविष्य के लिए ठीक नहीं है.

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अमन कारवां : फिलिस्तीनियों का दु:ख-दर्द बांटने की कोशिश

इज़रायल की नीतियों की वजह से फिलिस्तीनी हिंसा का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें शायद इज़रायल और फिलिस्तीन का मतलब पता नहीं है. ताज़ा स्थिति यह है कि इज़रायल के हवाई हमलों की वजह से फिलिस्तीन के लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं. सबसे बड़ी समस्या दवाइयों की है. आर्थिक नाकेबंदी की वजह से लोग मर रहे हैं. मरने वालों में नवजात बच्चे हैं, बूढ़े हैं और महिलाएं हैं. इज़रायल की ओर से ग़ज़ा की आर्थिक नाकेबंदी की वजह से ग़ज़ा की स्थिति बहुत कष्टदायी है. ऑक्सफेम, एमनेस्टी इंटरनेशनल और स्योदी चिल्ड्रन जैसे 21 संगठनों की रिपोर्ट भी यही कहती है. फिलिस्तीन में काम कर रहे मानवाधिकार संगठन वहां की बदहाली के बारे लगातार बता रहे हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने चुप्पी साध रखी है

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उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्य और आतंकित ड्रैगन

आख़िरकार भारत ने एक अच्छा काम किया. इसने चीन के लू श्याबाओ को मिले नोबल पुरस्कार समारोह में शिरकत करने का फैसला किया. भारत ने उन देशों से अलग रहने का निर्णय किया, जो इस मुद्दे पर चीन के समर्थन में थे और ली को मिलने वाले पुरस्कार का बहिष्कार कर रहे थे. इस मुद्दे पर चीन का साथ देने वाले ज़्यादातर देशों का रिकॉर्ड मानवाधिकार के मामले में बहुत ख़राब रहा है. मैं जानता हूं, इनमें से कई गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में भारत का गुट निरपेक्ष आंदोलन में बने रहना बेतुका लगता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सउदी अरब, क्यूबा और सोमालिया चीन के साथ खड़े नज़र आए. लेकिन विचित्र बात यह है कि चीन अंतरराष्ट्रीय अनुमोदन से कैसे डरा हुआ है? एक असहमत आदमी को मिले पुरस्कार से चीन इतना चिंतित है कि उसने इसके बहिष्कार की घोषणा कर दी और बाक़ी देशों से भी इसके लिए अपील की. यही कारण है कि चीन ने जल्दबाज़ी में कन्फ्यूशियस पुरस्कार की घोषणा कर दी. मुझे शक है कि हो न हो, अगले साल फिर एक किसी असंतुष्ट चीनी को कहीं नोबल पुरस्कार न मिल जाए.

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बाल शोषण के खिला़फ जनजागरण ज़रूरी

बाल शोषण आज हमारे लिए कोई अंजान शब्द नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज का एक विकृत और ख़ौ़फनाक सच बन चुका है. मौजूदा दौर में निर्दोष एवं लाचार बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं कि अब तो लोग इस ओर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देते.

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देश की आधी मुठभेड़ फर्जी हैं

सोलह साल में 2560 पुलिस और कथित अपराधी मुठभेड़. और इनमें से 1224 फर्ज़ी. यानी, भारत की हरेक दूसरी मुठभेड़ फर्ज़ी है. इतना ही नहीं, इस 1224 फर्जी मुठभेड़ की लिस्ट में बाटला हाउस मुठभेड़ का नाम भी शामिल हो गया है. हालांकि इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिल्ली पुलिस को पहले क्लीन चिट दे दी थी.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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दोस्तों ने जॉर्ज को बचाने की अपील की

जॉर्ज फर्नांडिस. एक ऐसा नाम, जो ग़रीब मज़दूरों, दलितों, समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों, मानवाधिकारों और हर तरह के अन्याय के खिला़फ संघर्ष में पिछले क़रीब तीन दशकों से हमेशा सबसे आगे रहा, आज खुद अपनी ज़िंदगी के लिए संघर्ष को मजबूर है. अथवा यूं कहें कि ज़िंदगी नहीं, जॉर्ज अपनी मौत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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इंसाफ की आवाज पर पाबंदी

चिंता यह कि ऑपरेशन ग्रीन हंट की धमक ने आदिवासियों को आतंक और असुरक्षा के गहरे अंधेरे में धकेल देने का काम किया है. नतीजा यह कि विस्थापन की भगदड़ बेतहाशा फैल रही है, गांव के गांव उजड़ रहे हैं.

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