भारतीय बीज जीन बैंक पर खतरा : निजी कृषि कंपनियों के हाथों बेचने की साजिश

यूनेस्को ने भारत के कई स्थानों की जैव विविधता को विश्व के लिए महत्वपूर्ण कृषि विरासत एवं खाद्य सुरक्षा के लिए उपयोगी मानते हुए उन्हें संरक्षित करने की बात कही है. 12वीं शताब्दी में ही रूस के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी निकोलाई वाविलो ने भारत को कई फसलों का उत्पत्ति केंद्र (ओरिजिन ऑफ क्रोप) बताया था. फिर भी जैव विविधताओं से भरे इस देश में जब एक किसान को विदेशी कंपनियों से बीज खरीदने पड़ें तो इसे क्या कहेंगे?

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निगाहें भ्रष्‍टाचार पर, निशाना 2014

अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के बाक़ी सदस्य जब जुलाई 2012 के अनशन के लिए मांगों की लिस्ट तैयार कर रहे होंगे, तब उन्हें भी यह अहसास रहा होगा कि वे असल में क्या मांग रहे हैं? 15 दाग़ी मंत्रियों (टीम अन्ना के अनुसार), 160 से ज़्यादा दाग़ी सांसदों और कई पार्टी अध्यक्षों के खिला़फ जांच और कार्रवाई की मांग, अब ये मांगें मानी जाएंगी, उस पर कितना अमल हो पाएगा, इन सवालों के जवाब ढूंढने की बजाय इस बात का विश्लेषण होना चाहिए कि अगर ये मांगें नहीं मानी जाती हैं तब टीम अन्ना का क्या होगा, तब टीम अन्ना क्या करेगी?

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.

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भूख से खत्‍म होती जिंदगी

इधर सरकारी गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है उधर कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है. इस भयावह तस्वीर के बीच शासन-प्रशासन के अधिकारी खूब फल-फूल रहे हैं.

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यह संसद और सर्वोच्च न्यायालय की परीक्षा है

अब फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है. साठ साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. बिना किसी प्रमाण के कोर्ट ने कहा है कि राम का जन्म वहां हुआ है, जहां बीस साल पहले बाबरी मस्जिद के गुम्बद थे. यह आस्था है और इसे अदालत ने प्रमाण के रूप में माना है. अगर जन्म स्थान कोर्ट मानता है तो कहीं उनका महल होगा, कहीं राजा दशरथ का दरबार होगा, कहीं तीनों महारानियों का निवास रहा होगा.

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सार-संक्षेपः गृहयुद्ध का रूप है नक्सलवाद

पुरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरू निश्चलानंद सरस्वती देश में बढ़ते नक्सलवादी प्रभाव और आतंक को भारत में गृहयुद्ध का एक रूप मानते हैं. इनका कहना है कि नेपाल की तरह ही हिन्दू बहुल भारत राष्ट्र की एकता अखंडता और सुरक्षा को विदेशी षड़यंत्रकारी नष्ट करना चाहते हैं और इसके लिए वह नक्सलवादियों को खुला प्रोत्साहन देने के साथ हर तरह की मदद भी कर रहे हैं.

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रोटी के नाम पर धोखा

गरीबों का पेट भर सकने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल में तमाम विसंगतियां हैं, जो भारत की ग़रीब जनता के हित में नहीं है. महिला बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय और कृषि एवं खाद्य मंत्रालय भूख और ग़रीबी के उन्मूलन के लिए कुल 25 योजनाएं चला रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में इन योजनाओं का नतीजा कहीं देखने को नहीं मिल रहा है.

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अन्‍न का अनादर

महंगाई और भूख से परेशान इस देश में भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने से अन्न सड़ रहा है. और, यह देश के नीति नियंताओं के लिए शर्म की बात है. महंगाई के मुद्दे पर हो रहे हंगामे को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई में गिरावट दर्ज़ होगी, लेकिन शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि पिछले वर्ष भी देश में अनाज की कमी नहीं थी.

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भूख ने एक और आदिवासी परिवार लीला

केंद्र एवं राज्य सरकार इस बात का दावा करती रही है कि देश में भूख और तंगहाली के कारण कोई मौत नहीं होती. लेकिन मंडला ज़िले के राष्ट्रीय मानव कहे जाने वाले बैगा जनजाति के एक दंपत्ति ने पांच बच्चों के भरण पोषण और भूख से तंग आकर, अपने आप को आग के हवाले कर दिया. मौके के गवाह रहे लोगों का कहना है कि दंपत्ति ने भूख से तंग आकर अपनी जान दी.

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अनाज के लिए तरसते आदिवासी

मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले के कोरकू आदिवासी बहुल खालवा विकासखंड में आदिवासी अनाज के लिए तरस रहे हैं. पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के समय यह क्षेत्र भुखमरी से पीड़ित आदिवासियों की व्यथा-गाथा के कारण चर्चा में आया था. लगभग दो माह की अवधि में खालवा में 50 से ज़्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय काल के गाल में समा गए.

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ममता दीदी, जरा नज़र इधर भी डालें

देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली भारतीय रेल में कल्याणकारी योजना के तहत कई अर्द्धसरकारी संस्थाएं चलाई जाती है जिनमें रेलवे मनोरंजन संस्थान, कैंटीन, को-ऑपरेटिव, सिलाई सेंटर, आर्युवेदिक एवं होम्योपैथिक स्वास्थ्य केंद्र आदि हैं. इन संस्थानों में हज़ारों श्रमिक कार्यरत हैं लेकिन विडंबना है कि रेलवे के इन उपक्रमों में कार्यरत श्रमिकों को जो मासिक वेतन दिया जा रहा है उसमें श्रम अधिनियम एवं रेलवे बोर्ड के नियमों की खुल्लम-खुल्ला अवहेलना की जा रही है.

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मजदूरों की रोज़ी—रोजी छीनी

कहते हैं, पेट की भूख इंसान से कुछ भी करा सकती है. इसी के चलते कुछ लोग वतन बदर होकर परदेश में रोजी-रोटी की तलाश करते हैं. घर छोड़ अपनों से दूर रहकर कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी और झमाझम बरसात के मौसम में उन्हें पेट की खातिर स़िर्फ और स़िर्फ काम करना होता है. कुछ ऐसी ही व्यथा है झारखंड राज्य के पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, लोहरदगा आदि ज़िलों से बिहार के रोहतास, कैमूर एवं भोजपुर में मज़दूरी करने आने वाले प्रवासी मज़दूरों की.

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महंगाई का विकास

प्रधानमंत्री जी, लगता है कि आप सचमुच गरीबी खत्म कर देंगे।
क्या कह रहे हो? यह कैसे हो सकता है?
तो सुनिए. बढती महंगाई ने गरीबों की कमर तोड दी है. आलू, टमाटर, प्याज, दाल, चावल…. सभी खाने की चीजों के दाम इतने बढ गए हैं कि गरीब जनता खरीद नहीं सकती. भोजन के अभाव में गरीब लोग भूख से तडप कर मर रहे हैं, कुछ दिनों बाद न रहेगा गरीब न रहेगी गरीबी।।
ओह यानी हमें तुरंत ही कोई विकल्प तलाशना पडेगा गरीबों की भूख मिटाने के लिए.
सिर्फ एक विकल्प है—मवेशियों की तरह घास खाना।
घास।। वंडरफुल आइडिया. इससे तो लोगो के भोजन के पैसे बचेंगे और ईधन पर भी कुछ खर्च नहीं होगा बचत ही बचत. कमाल का विकल्प है.
सर, आपको पब्लिक प्लेटफार्म पर यह बात नहीं कहनी चाहिए थी. महंगाई फिर बढ गई.
कौन सी चीज महंगी हो गई अब?
घास।।

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