स्कूल की इमारत ख़स्ताहाल क्यों है

सरकारी स्कूल देश के करोड़ों बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण जगह है. यह छात्रों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के वश की बात नहीं, जो रोजाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर जीवनयापन करती है.

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सब्सिडी का लाभ किसे मिलता है

क्‍या भाजपा के ग़लत नेता अनशन पर गए, अनशन पर जिन्हें जाना चाहिए था, वे नहीं गए, बल्कि किसी दूसरे नेता ने अनशन कर लिया? समाचारों में यही आ रहा है कि नितिन गडकरी को अपना मोटापा घटाने के लिए उपाय करने जाना था, जो दु:खद है और हास्यास्पद भी. जैसा कि मुझे ध्यान है, जब गडकरी संघ की शाखा में हाफ पैंट पहन कर व्यायाम करने जाते थे, तब वह बिल्कुल ठीक थे, लेकिन भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें भी नेताओं वाला रोग लग गया.

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महंगाई की मार झेल रहेः गरीबों का मजाक मत उड़ाइए

32 रुपये में कैसे ज़िंदा रहा जा सकता है, यह कला योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को पूरे देश को सिखानी चाहिए. मोंटेक सिंह अहलुवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोस्त हैं. योजना आयोग की भूमिका देश के विकास में बहुत ही अहम है. इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या हम ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां की सरकार को मालूम नहीं है कि देश में कितने ग़रीब हैं.

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आय का सामान वितरण ही समाजवाद है

अब स़िर्फ आ़खिरी योजना यानी समाजवादी वित्त-वितरण की योजना का परीक्षण ही शेष रहा. आपको ध्यान होगा कि यह बात इस विषय पर विचारणीय हुई कि धन का बंटवारा किस ढंग पर संतोषप्रद या उपादेय हो सकता है. इस सिलसिले में जब हमने यह विचार किया कि हर आदमी को उतना ही मिले, जितना वह अर्जन करता है, बिना अर्जन किए नहीं मिले तो यह तरीक़ा बिल्कुल मूर्खतापूर्ण सिद्ध हुआ.

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वर्ग तंत्र और यथास्थितिवाद

पांचवीं योजना वर्ग विभाजन की है. राष्ट्र को या समाज को कई वर्गों में विभक्त मान लिया जाता है और प्राय: हर एक वर्ग की अलग-अलग आय निर्धारित होती है. मान लीजिए, एक वर्ग निम्न कोटि के काम करने वाले मज़दूरों, क़ुलियों, भारवाहकों का है, उन्हें औसतन 70 रुपये माहवार मिलता है. दूसरा वर्ग प्रोफेसर, डॉक्टर इत्यादि लोगों का है, जिन्हें क़रीब 1000 रुपये माहवार मिलता है.

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व्यक्ति और समाज

मान लीजिए देश की समस्त संपत्ति आपके हाथ में सौंप दी जाए और कह दिया जाए कि आप उचित ढंग से उसका वितरण कर दीजिए. आप बंटवारा किस ढंग से करेंगे? एक बार आप अपने परिवार के आदमियों और इष्ट मित्रों को भूल जाइए, क्योंकि आप वितरणकर्ता हैं. तो लाज़िमी तौर पर आपको पक्षपात रहित होकर सर्वसाधारण को एक समान मानकर वितरण करना होगा. आपको पंच परमेश्वर का बाना पहनना होगा.

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अवकाश और श्रम का समन्वय

बंटवारे के लिए देश में रुपये हों, धन हों, तो उसके पहले काम या मेहनत का होना ज़रूरी है. बिना काम या मेहनत किए धन अर्जन ही नहीं होगा तो फिर बंटवारा किस चीज का और कैसे होगा? बिना ज़मीन को जोते-बोए अनाज पैदा ही नहीं होगा. इसके लिए किसान को परिश्रम करना ही होगा. बाद में रोटी बनाने वाले रसोइए को परिश्रम करना होगा, तब कहीं जाकर रोटियां बन पाएंगी.

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कोड़ा प्रकरणः विनोद सिन्‍हा को बचाने की रणनीति तैयार

खानों के आवंटन में दलाली के रूप में अर्जित की गई अकूत संपत्ति के मुख्य आरोपियों को बचाने की रणनीति तैयार की जा रही है. तक़रीबन चार हज़ार करोड़ रुपए की माइंस दलाली के आरोपी मधु कोड़ा एंड कंपनी के मामले की जांच सीबीआई के हवाले करने से राज्य सरकार के इंकार का रहस्य अब परत-दर- परत खुलने लगा है.

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नीतीश को मिला ब्रह्मास्त्र

यह लड़ाई से पहले की रणभेरी है और सभी लड़ाके खम ठोंक कर मैदान में उतर आए हैं. लालू-राबड़ी के खिला़फ आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई के एक खुलासे ने राजद के साथ-साथ कांग्रेस को भी बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है. कांग्रेस सारे मामले से अपना हाथ खींचने की कोशिश में लगी है तो लालू जवाबी हमले के लिए तैयार हो रहे हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा फायदा तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू को हुआ है.

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दिल्‍ली का बाबू : पत्नियों की महिमा

हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है. यह कांग्रेसी नेता भी भलीभांति जानते हैं. लेकिन हाल के दिनों में आयकर विभाग का कोपभाजन बने मध्य प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कहावत को एक बार फिर सत्य साबित कर दिया है. छापों के दौरान आयकर विभाग के अधिकारियों ने पाया कि अधिकांश नौकरशाहों की पत्नियां बीमा एजेंट का काम करती हैं.

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अफसरों ने सरकार को 2342 करोड़ रुपयों का चूना लगाया

जिन अफसरों और कर्मचारियों पर सरकारी करों और सेवाओं के शुल्क की वसूली का दायित्व है, वे किस लापरवाही और ग़ैर ज़िम्मेदारी से काम करते हैं, इसका खुलासा भारत के नियंत्रक- महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट में किया गया है.

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सार-संक्षेप

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था.

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