महंगाई ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है. अब जो सबसे बड़ा सवाल है, वह यह है कि एक प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों में देश की कमान होते हुए भी इस समस्या का निदान क्यों नहीं हो रहा है. हालत यह है कि देश के मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों की ज़िंदगी की गणित गड़बड़ा गई है.
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विकास के वैसे तो अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं, लेकिन जब विकास का रास्ता आगे चलकर विनाश पैदा करे तो ऐसे विकास की कितनी ज़रूरत सरकार को होनी चाहिए? खासकर तब, जब मामला लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ा हुआ हो. ऐसे में लोगों की ज़िंदगी पर कितना असर पड़ता है, यह बात सोचने पर जेहन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं.
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कुछ ही दिन पहले की बात है, जब सुबह-सुबह मेरे पास एक फोन आया. गुजरात के मुंद्रा समुद्र तट से मेरे एक मित्र ने फोन किया और एक ऐसा सवाल किया, जिसका जवाब हमें पहले ही मिल गया होना चाहिए था. कच्छ के मुंद्रा तटीय क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संरचना वैसे ही कमज़ोर हो चुकी है, इसके बावजूद इस इलाक़े में 300 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट को ग़लत तरीक़े से एन्वॉयरोंमेंटल क्लियरेंस दे दिया गया. स्थानीय मछुआरे समुदायों ने इसके विरोध में अपनी सारी ताक़त लगा दी, लेकिन मेरे मित्र ने सूचना दी कि प्लांट को लेकर काम शुरू किया जा रहा है. उसने मुझसे यह भी पूछा कि मामले की अगली सुनवाई कब होनी है. मैंने उसे यह समझाने की भरपूर कोशिश की कि हम आज असहाय होकर क्यों रह गए हैं, लेकिन मेरा अंदाज़ा है कि ऐसी परिस्थितियों से रूबरू लोगों को समझाना खासा मुश्किल होता है, खासकर यदि वे ऐसी परियोजनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हों. मैं उसे यह कैसे समझा सकती थी कि थर्मल प्लांट को पर्यावरणीय क्लियरेंस दिए जाने के ख़िला़फ जिस संस्थान में मामला दर्ज किया गया है, वह अब अस्तित्व में ही नहीं है. फिर उन्हें यह भी कैसे समझाया जा सकता है कि पुराने निकाय की जगह जिस नए निकाय का गठन किया जाना है और जहां इस मामले की सुनवाई होनी है, उसका गठन अभी तक नहीं किया गया है.
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दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश सोमालिया और सबसे अमीर देश नार्वे है. पिछले वर्ष भारत अमीरी के मामले में 78वें स्थान पर था, इस वर्ष 88वें पर है. यानी अमीरी के मामले में हम दस पायदान पीछे खिसके हैं.
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झारखंड के आर्थिक और औद्योगिक विकास में निजी क्षेत्र के उद्यमियों की सहभागिता बढ़ी है. देश की कई नामी-गिरामी कंपनियों की इकाईयां यहां निर्माणाधीन हैं. ऊर्जा और इस्पात संयंत्र की स्थापना कर सूबे को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में इनका महत्वपूर्ण योगदान ब़ढ रहा है.
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यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.
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धनबाद कोयलांचल का नाम प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार है. बीसीसीएल एवं टाटा की कोल इंडिया कंपनियों के अलावा यहां पूर्व में काफी संख्या में छोटे-बड़े उद्योग सुचारू रूप से चल रहे थे. मगर, बाद में कई बड़े उद्योग विभिन्न कारणों से बंद होते गए.
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यदि मानवजनित गतिविधियां अपनी मौजूदा गति से जारी रहीं तो औद्योगिक युग से पहले के मुक़ाबले औसत वैश्विक तापमान में सात डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो जाएगी. तापमान में यह वृद्धि 15000 साल पहले, आख़िरी हिमयुग (आइस एज) के बाद पृथ्वी के तापमान में आई वृद्धि से भी ज़्यादा है.
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मध्य प्रदेश सरकार राज्य में बिजली संकट और कोयला संकट से निपटने के लिए जिस उदारता से निजी क्षेत्र का सहयोग लेती आई है, उससे घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार के संदेह जन्म लेने लगे हैं. विशेष रूप से गुजरात के अदानी उद्योग व्यापार समूह पर सरकार की अति मेहरबानी अनेक रहस्यों और संदेहों की अनकही कहानी बयां करती है.
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रायगढ़ की पहचान छत्तीसगढ़ राज्य के संपन्न औद्योगिक क्षेत्र के रूप में बनी हुई है. यहां इस्पात एवं लौह धातुकर्म उद्योग के साथ ऊर्जा उत्पादन की इकाइयों की स्थापना करने के बाद अब पूरे रायगढ़ ज़िले को ऊर्जा केन्द्र बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं. इस शहर में औद्योगीकरण से उद्योगपतियों को करोड़ो रूपये की आय हो रही है, हज़ारों लोगों को काम मिला हुआ है और इस क्षेत्र का आर्थिक और भौतिक विकास भी हो रहा है, लेकिन इस विकास के वरदान के लाभ कम है, विकास का अभिशाप कहीं ज़्यादा है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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