फिर बढ़े पेट्रोल-डीज़ल के दाम, लोग बोले क्या चाहती है सरकार

देश की मौजूदा सरकार ने महंगाई कम करने की शपथ ली थी लेकिन अब वह अपनी कही हुई बात से

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अंधराष्ट्रवाद से बढ़ रहा है लोकतंत्र के लिए ख़तरा

चाहे कोई भी विषय हो, देश का एक छोटा लेकिन ख़तरनाक तबक़ा फेसबुक का सहारा लेकर नफ़रत फैलाने का काम

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संसद की गरिमा से खिलवाड़ बंद कीजिए

बजट सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ता नज़र आ रहा है. दरअसल, हम समझ नहीं पा रहे हैं कि लोकसभा

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Farmer Suicide : Myth & Reality

Farmer Suicide : Myth & Reality

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सरकारी निष्क्रियता का परिणाम : महंगाई बेलगाम

पिछले कुछ वर्षों से महंगाई ने जैसे देश में अपना आशियाना सा बना रखा है. सरकार का न तो बाजार

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यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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अन्‍ना हजारे की नाराजगी का मतलब

अचानक ऐसी क्या बात हो गई कि टीम अन्ना और अन्ना के बीच मतभेद सामने आ गए, ऐसा क्या हो गया कि अन्ना इतने नाराज़ हो गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के लोगों से कहा कि न तो आप मेरे नाम का और न मेरे फोटो का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें दो बातें हैं. राजनीतिक दल बनाने की घोषणा जंतर-मंतर के आंदोलन के दौरान नहीं हुई थी.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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Who will Defeat ANNA & BABA

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विद्वान प्रधानमंत्री विफल प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सौम्य हैं, सभ्य हैं, मृदुभाषी एवं अल्पभाषी हैं, विद्वान हैं. उनके व्यक्तित्व की जितनी भी बड़ाई की जाए, कम है, लेकिन क्या उनकी ये विशेषताएं किसी प्रधानमंत्री के लिए पर्याप्त हैं? अगर पर्याप्त भी हैं तो उनकी ये विशेषताएं सरकार की कार्यशैली में दिखाई देनी चाहिए. अ़फसोस इस बात का है कि मनमोहन सिंह के उक्त गुण सरकार के कामकाज में दिखाई नहीं देते.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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ओमिता पॉल महान सलाहकार

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. ऐसे में उनके चार दशक पुराने राजनीतिक करियर की समीक्षा की जा रही है. देश की वर्तमान खराब आर्थिक हालत और उसमें प्रणब बाबू की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है, लेकिन इस सबके बीच एक और अहम मसला है, जिस पर ज़्यादा बात नहीं हो रही है. खासकर ऐसे समय में, जबकि बिगड़ी आर्थिक स्थिति को न सुधार पाने के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा हो. यह सवाल सीधे-सीधे वित्त मंत्री के सलाहकार से जुड़ा हुआ है.

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आम चुनाव 2014 की तैयारी

अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए चुनाव अभियान उसी दिन से शुरू हो जाता है, जिस दिन नया राष्ट्रपति शपथ लेता है. भारत में राष्ट्रपति और लोकसभा के चुनाव के बीच दो साल का अंतराल है और अभी से प्रधानमंत्री पद के लिए अभियान शुरू हो गया है. राष्ट्रपति पद के किसी एक उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर एनडीए का राज़ी होना मुश्किल है. भाजपा 2014 के आम चुनाव की तैयारी में जुट गई है.

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उत्तर प्रदेश : अखिलेश का चुनावी बजट

मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव ने बतौर वित्त मंत्री बीते एक जून को वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए दो लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया. आज तक किसी अन्य सरकार ने इतना बड़ा बजट पेश नहीं किया था.

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डॉट्स कर्मचारियों की बदहाली कब दूर होगी

घातक संक्रामक बीमारी टीबी के उन्मूलन के काम में जुटे डॉट्‌स कर्मचारियों की हालत बेहद दयनीय है. उन्हें मलाल है कि इस महंगाई के दौर में उन्हें बेहद कम वेतन पर गुज़ारा करना पड़ रहा है. ईपीएफ, बोनस एवं महंगाई भत्ते की बात छोड़िए, उनका साधारण दुर्घटना बीमा तक नहीं है.

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रेखा गूंगी गुड़िया नहीं हैं

कुछ लोगों का व्यक्तित्व आग की तरह होता है. वे जहां जाते हैं या तो लोगों को तपिश का अनुभव कराते हैं या झुलसा देते हैं और जिन्हें झुलसा नहीं पाते, उन्हें जला देते हैं. रेखा एक आग का नाम है और रेखा का संपूर्ण व्यक्तित्व ऐसा ही व्यक्तित्व है. रेखा राज्यसभा की मनोनीत सदस्य हैं.

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बापू की वस्तुओं की नीलामी पर तीखी प्रतिक्रियाः कांग्रेस गांधी की गुनहगार है

मोहनदास करम चंद गांधी यानी महात्मा गांधी के निधन को 65 वर्षों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी वह पूरी दुनिया के लिए उतने ही प्रासंगिक नज़र आते हैं, जितने वह जीते जी हुआ करते थे. गांधी जी की समकालीन कई महान हस्तियां इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गई हैं, लेकिन गांधी दर्शन आज भी जीने की कला बना हुआ है. कुछ मामलों में तो लगता है कि आज उनकी प्रासंगिकता ज़्यादा बढ़ गई है.

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बजट किसके लिए है

ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध अभिनेत्री सराह बेमहर्ड जब डिक्शनरी भी पढ़ती थीं तो लोगों की आंखों में आंसू ला देती थीं. प्रणव मुखर्जी भी इसके का़फी क़रीब नज़र आए, जब उन्होंने सर्विस टैक्स के लिए नकारात्मक सूची वाले क्षेत्रों को पढ़ना शुरू किया. वित्त मंत्री को यह नकारात्मक सूची क्यों पढ़नी चाहिए, यह एक रहस्य है.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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जनता को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और भ्रष्टाचार आदि मुद्दे सा़फ दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हीं के साथ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा दिखाई देता है, वह है अपराध. अपराध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, लेकिन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अपराध से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीति में बेख़ौ़फ प्रवेश.

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महंगाई की मार झेल रहेः गरीबों का मजाक मत उड़ाइए

32 रुपये में कैसे ज़िंदा रहा जा सकता है, यह कला योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को पूरे देश को सिखानी चाहिए. मोंटेक सिंह अहलुवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोस्त हैं. योजना आयोग की भूमिका देश के विकास में बहुत ही अहम है. इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या हम ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां की सरकार को मालूम नहीं है कि देश में कितने ग़रीब हैं.

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सरकार आर्थिक अत्याचार बंद करे

हिंदुस्तान में एक अजीब चीज है. महंगाई बढ़ाने में सरकार को बहुत मज़ा आता है. सरकार जानबूझ कर महंगाई बढ़ाती है या ऐसा करना सरकार की मजबूरी है, यह सरकार जाने, वे अर्थशास्त्री जानें, जो झूठे आंकड़े तैयार करते हैं, लेकिन हिंदुस्तान के लोगों की ज़िंदगी कितनी मुश्किल हो रही है, यह बात न राजनीतिक दल समझ रहे हैं और न सरकार समझ रही है.

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लोकतंत्र की गुंजाइश खत्‍म हो रही है

क्या कहें, अपना माथा पीटें, भगवान को, अल्लाह को, गॉड को दोष दें, किस पर अपनी खीज निकालें? सीएजी की रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट में क्या नहीं है! देखने पर लगता है कि हम जिस देश में रह रहे हैं, उसमें ईमानदार प्रबंधन नाम की कोई चीज ही नहीं बची है. यह टू जी स्पेक्ट्रम का मसला नहीं है, जिसमें प्रधानमंत्री जी ने कह दिया कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया. लोग उनको धमकाते रहे. उनके मंत्री ही उनको धमकाते रहे. प्रधानमंत्री खामोश रहे.

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भाजपा में बहुत दम है…

भारतीय जनता पार्टी अब पार्टी विथ डिफरेंस के बजाय पार्टी इन डिलेमा बन गई है. दूसरे दलों से अलग होने का दंभ भरने वाली पार्टी अब असमंजस और विरोधाभास से ग्रसित हो चुकी है. वह भीषण गुटबाज़ी की चपेट में है, जिसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते जा रहे हैं और पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी के अंतर्द्वंद्व का हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का कोई बयान आता है तो पार्टी के दूसरे नेता नाराज़ हो जाते हैं.

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तेल कंपनियां या सरकारः देश कौन चला रहा है

यह कैसी सरकार है, जो जनता के खर्च को बढ़ा रही है और जीवन स्तर को गिरा रही है. वैसे दावा तो यह ठीक विपरीत करती है. वित्त मंत्री कहते हैं कि सरकार अपनी नीतियों के ज़रिए नागरिकों की कॉस्ट ऑफ लिविंग को घटाना और जीवन स्तर को ऊंचा करना चाहती है.

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