माननीयों की मनमानी: एक और ज़मीन घोटाला

महाराष्ट्र में घोटालों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. माननीयों के कारनामों की फेहरिस्त कितनी लंबी है, इसका अंदाज लगा पाना मुश्किल है. ऐसा लगता है कि घोटालों के मामले में राज्य सरकार किसी भी सूरत में केंद्र सरकार से पीछे नहीं रहना चाहती है.

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खादी ग्रामोधोग आयोग: खादी की दुर्दशा का ज़िम्मेदार है

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस खादी को देश में स्वरोजगार पैदा करने का माध्यम बनाया था, उसी देश में आज़ादी के 64 साल बाद खादी ग्रामोद्योग आयोग की हालत बद से बदतर होती जा रही है.हर साल 2 अक्टूबर गांधी जयंती, 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को ही खादी के कपड़े नज़र आते हैं.

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ऊर्जा क्षेत्र में मचा घमासान

देश के ऊर्जा क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों की कोई कमी नहीं है. लेकिन सरकार को इस क्षेत्र में देश की शीर्ष नीति नियामक संस्था सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) में चल रहे घालमेल का जवाब तलाशना ही होगा. सूत्रों के मुताबिक़ सीईए के सदस्य गुरदयाल सिंह को संस्था का कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने के बाद कई लोग विद्रोह पर उतारू हो गए हैं.

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नौकरशाहों की लोकतंत्र में आस्था नहीं

देश के आला अफसरों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. नौकरशाह मनमाने ढंग से प्रशासन चलाना चाहते हैं और चला भी रहे हैं. संवैधानिक बाध्यता के कारण विधानसभा एवं मंत्री परिषद आदि संस्थाओं की कार्यवाही में वे औपचारिकता ही पूरी करते हैं.

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जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है.

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विंध्‍य हर्बल सफल सहकारी संस्‍था

सरकारी प्रयासों से जनकल्याण के काम बिना रुकावट पूरे होते रहें, यह लगभग असंभव बात मानी जाती है. पर जब आप मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ के द्वारा बनाई गई विंध्य हर्बल संस्था के कामकाज को देखेंगे तो मानेंगे कि जनकल्याण के लिए सरकारी प्रयासों की कमी नहीं है. विंध्य हर्बल संस्था प्रदेश स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी आयुर्वेदिक औषधियों से संबंधित संग्रहण, उत्पादन, शोधन, दवा निर्माण एवं उसकी बिक्री का काम करती है.

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अनाथ बच्चों का दर्द

बुलबुल अनाथ हो गया. कोसी ने उसका सबकुछ छीन लिया. पिछले साल जब देश कोसी की प्रलयंकारी बाढ़ के कारण फैली तबाही के गम में डूबा था, उस समय बुलबुल के अलावा अठारह और अभागे बच्चे सिर से मां बाप का साया उठ जाने का मातम मना रहे थे.

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