इज़राइल के अ़खबारों में भारत-इज़राइल दोस्ती की कहानियां धड़ल्ले से छप रही हैं. दोनों देशों को एक नेचुरल फ्रेंड बताया जा रहा है. साथ में यह भी बताया जा रहा है कि किस तरह अमेरिका की यहूदी लॉबी ने अमेरिका, और भारत को एकजुट किया. यही यहूदी लॉबी भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील और इज़राइल से हथियार खरीदने की डील के पीछे है.
इज़रायल की नीतियों की वजह से फिलिस्तीनी हिंसा का शिकार हो रहे हैं, जिन्हें शायद इज़रायल और फिलिस्तीन का मतलब पता नहीं है. ताज़ा स्थिति यह है कि इज़रायल के हवाई हमलों की वजह से फिलिस्तीन के लोगों को रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं. सबसे बड़ी समस्या दवाइयों की है. आर्थिक नाकेबंदी की वजह से लोग मर रहे हैं. मरने वालों में नवजात बच्चे हैं, बूढ़े हैं और महिलाएं हैं. इज़रायल की ओर से ग़ज़ा की आर्थिक नाकेबंदी की वजह से ग़ज़ा की स्थिति बहुत कष्टदायी है. ऑक्सफेम, एमनेस्टी इंटरनेशनल और स्योदी चिल्ड्रन जैसे 21 संगठनों की रिपोर्ट भी यही कहती है. फिलिस्तीन में काम कर रहे मानवाधिकार संगठन वहां की बदहाली के बारे लगातार बता रहे हैं, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने चुप्पी साध रखी है
विस्मार्क ने कहा था कि कोई भी सच तब तक सच नहीं है, जब तक आधिकारिक तौर पर उसका खंडन न कर दिया जाए. आज यही बात हम थोड़े अलग अंदाज़ में कह सकते हैं. मसलन, कोई भी सच तब तक सच नहीं है, जब तक वह लीक न हो जाए और खासकर इंटरनेट पर. अभी हमारे पास विकीलीक्स है, राडिया के टेप हैं, कुछ और सच भी हो सकते हैं, जो ऑनलाइन लीक किए जाएंगे या मीडिया के हाथों में दे दिए जाएं. आधिकारिक तौर पर शासन हमेशा ऐसे खुलासों की भर्त्सना ही करता है, लेकिन ऑनलाइन खुलासे को नकार पाना बहुत कठिन काम है.
यह अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए का मिशन हिंदुस्तान 2015 है, जो भारत को टुकड़े-टुकड़े कर इसके वज़ूद को ख़त्म करने की ख़ौ़फनाक साज़िश है. इस मिशन पर अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. सीआईए की मंशा है कि
हमारे देश के ऊपर एक गंभीर खतरा मंडरा रहा है. जिन पर इस ख़तरे से निपटने की ज़िम्मेदारी है, वे हाथ पर हाथ रखकर बैठे हैं. एक तरह से उनका साथ दे रहे हैं. हमारे सरकारी तंत्र को भी इस खतरे के बारे में पता है, लेकिन वह कुछ भी करने में असमर्थ है.