पैसा और पावर का खेल है चुनाव

बिहार विधानसभा चुनाव आगामी अक्टूबर-नवंबर में होने वाले हैं. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) ने बिहार विधानसभा-2010 के आपराधिक छवि

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महा-गठबंधन की स्वाभिमान रैली हीरो और विलेन दोनों रहे लालू

विधानसभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले पटना के गांधी मैदान की यह पहली और शायद आ़िखरी राजनीतिक रैली रही.

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तीसरा मोर्चा संभावनाएं और चुनौतियां

लोकसभा में एफडीआई के मुद्दे पर दो दलों ने जो किया, वह भविष्य की संभावित राजनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है. शायद पहली बार मुलायम सिंह और मायावती किसी मुद्दे पर एक सी समझ रखते हुए, एक तरह का एक्शन करते दिखाई दिए. यह मानना चाहिए कि अब यह कल्पना असंभव नहीं है कि चाहे उत्तर प्रदेश का चार साल के बाद होने वाला विधानसभा का चुनाव हो या फिर देश की लोकसभा का आने वाला चुनाव, ये दोनों साथ मिलकर भी चुनाव लड़ सकते हैं.

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इंदिरा की राह पर चले नीतीश

बिहार में विधानसभा चुनावों के बाद मुख्य सत्ताधारी दल जनता दल(यू) को अनुशासन का बुखार च़ढा है. आनन-फानन में एक अनुशासन समिति बनाई गई और जैसी कि चर्चा है, तक़रीबन छह सौ कार्यकर्ताओं को इस बात पर कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया कि उन्होंने चुनाव में पार्टी विरोधी हरकत की है.

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यह बिहार और विकास की जीत है

दो कहावतें हैं. एक लालू यादव और राम विलास पासवान पर तथा एक कांग्रेस पर लागू होती है. कछुए और खरगोश की दौड़ की कहानी हम सबने बचपन में पढ़ी भी है और जीवन में कई बार सुनी भी है. खरगोश सोचता था कि कछुआ कहां उसके सामने दौड़ पाएगा, इसलिए आराम कर लो, बाद में दौड़ कर हरा ही दूंगा. लालू यादव को लगता था कि वह और राम विलास पासवान मिल जाएंगे तो ताक़तवर दो समाजों का गठजोड़ हो जाएगा. यादव और पासवान और फिर मुसलमान उनके साथ रहेगा ही. वह भाजपा के साथ जाएगा नहीं. दोनों ने खरगोश की तरह सोचा और आराम से छह महीने पहले पंद्रह साल पुरानी रणनीति पर अमल करने लगे. नीतीश ने दो साल में खामोश चेतना पैदा कर दी, आशाएं पैदा कर दीं. कछुआ जीत गया और एक बार फिर खरगोश हार गया.

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गांधी जी और बटक मियां

लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते व़क्त राष्ट्रपिता गांधी ने जो संवाद लिखा था, वह बाद में हिंद स्वराज के नाम से पुस्तकाकार भी छपा. इस पुस्तक के प्रकाशन के सौ साल पूरे होने पर बुद्धिजीवियों के बीच जमकर बहस-मुहाबिसा हुआ. हिंद स्वराज का प्रकाशन आंशिक और पूर्ण रूप से पत्र-पत्रिकाओं में हुआ और नई पीढ़ी को एक बार फिर से राष्ट्रपिता गांधी को जानने-समझने का अवसर मिला.

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