जब तोप मुकाबिल हो : यह राजनीतिक फैसलों की घड़ी है

बीजेपी और कांग्रेस की आर्थिक नीतियां और उनके विकास का मॉडल एक जैसा है. इसलिए देश को लगता है कि

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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लोग चाहेंगे तो बनेगी तीसरी ताक़त

राजनीति के राष्ट्रीय क्षितिज पर जसवंत सिंह का नाम किसी परिचय विशेष का मोहताज़ नहीं है. वह भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शुमार किए जाते हैं. वह देश के विदेश और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं. पिछले दिनों चौथी दुनिया के समन्वय संपादक डॉ. मनीष कुमार की उनसे विभिन्न विचार बिंदुओं पर एक लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश:

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जसवंत सिंह से भाजपा डर रही है

जसवंत सिंह भाजपा के पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता बन गए जिनसे न स़फाई पूछी गई, न बोलने का अवसर दिया गया, बस बाहर का दरवाज़ा दिखा दिया गया. उनका इतना सम्मान भी नहीं रखा, जितना एक सामान्य राजनैतिक सहयात्री का दूसरा राजनैतिक सहयात्री रखता है.

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जसवंत से घबराएं अनंत

भाजपा से निष्कासित जसवंत सिंह संसदीय लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पद पर अभी भी बने हुए हैं. भाजपा मेंउनके कई पुराने साथी उनकी इस पद से भी विदाई चाहते हैं. अनंत कुमार भी. आखिर किस बात को लेकर इतने भयभीत हैं अनंत? क्या उन्हें किसी राज के उजागर हो जाने का भय सता रहा है?

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