वोडा और आइडिया के मर्जर से खतरे में कर्मचारियों की नौकरी

देश की दो मशहूर टेलिकॉम कंपनियां वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर का मर्जर होकर जल्द ही एक हो जाएंगी. दो बड़ी

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राजस्थान: विधायक का लड़का बना चपरासी, इंजीनियर और वकील भी रेस में शामिल

हाल ही में राजस्थान सचिवालय के लिए चपरासी के पद पर नियुक्ति के लिए इंटरव्यू हुआ है. लेकिन जब इंरव्यू

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मजदूरों का सप्लायर क्यों बन गया उत्तर प्रदेश!

  शिवाजी राय भारत में पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेजों ने जिन व्यापार केंद्रों को स्थापित किया था, आज भी लगभग

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विदेशी इंडेक्स पर भरोसा मत कीजिए

पिछले दिनों दो मुख्य बातें समाचारों की सुर्ख़ियों में थी. पहली, 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयन्ती

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छात्र न हो परेशान, अब आपके पास है समाधान

नई दिल्ली: परीक्षा आते ही कोई भी छात्र परेशान हो ही जाता है। चाहे स्कूल में शुरुआती कक्षा की परीक्षा

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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन

तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….

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जेलों में बढ़ती मुसलमानों की आबादी

आज से 65 वर्ष पूर्व जब देश स्वतंत्र हुआ था तो सबने सोचा था कि अब हम विकास करेंगे. आज़ाद देश में नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की जाएगी. छुआछूत, जाति-पांत और भेदभाव का अंत होगा. हर धर्म से जुड़े लोग एक भारतीय के रूप में आपस में भाईचारे का जीवन व्यतीत करेंगे. धार्मिक घृणा को धर्मनिरपेक्ष देश में कोई स्थान प्राप्त नहीं होगा. यही ख्वाब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था और यही आश्वासन संविधान निर्माताओं ने संविधान में दिया था, लेकिन आज 65 साल बीत जाने के बाद यह देखकर पीड़ा होती है कि जाति-पांत की सियासत हमारे देश की नियति बन चुकी है.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

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ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं.

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रिटायरमेंट, पुनर्नियुक्ति, इस्‍तीफाः निदेशक की मनमानी सब पर भारी

पटना का इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, अपनी तमाम विशेषताओं के बावजूद आजकल विवादों से घिरा हुआ है और इसके केंद्र में हैं संस्थान के निदेशक. संस्थान के वर्तमान निदेशक डॉ. अरुण कुमार का कार्यकाल और क्रियाकलाप विवादों से भरा हुआ है. अपनी मनमर्ज़ी चलाते हुए उन्होंने तमाम नियम क़ानून को ताक़ पर रख दिया है.

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नौकरी करनी है तो वजन घटाओ

अगर आपका वजन ज़्यादा है तो उसे कम करना शुरू कर दीजिए, वरना आप परेशानी में फंस सकते हैं, क्योंकि ओवरवेट के कारण तुर्की एयरलाइंस ने 28 फ्लाइट अटेंडेंट्‌स को विमान से नीचे उतार दिया है और उन्हें हिदायत दी है कि वे अपना वजन जल्द से जल्द कम करें.

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मैं कौन हूं

जब भी अपने बारे में सोचा तो ख़ुद को किसी न किसी किरदार में देखा. किसी ने पूछा- आप कौन हो? जवाब में कई पहचानें थीं. मेरा नाम, रुतबा, मेरा रिश्ता या मेरा लिंग- स्त्री या पुरुष. कभी मैं पिता हूं, कभी मैं किसी कंपनी का चेयरमैन हूं. कभी बेटा हूं तो कभी स़िर्फ नाम. इनके अलावा तो कोई और पहचान है ही नहीं.

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विधायक कोष : आपके विधायक जी ने कितना काम किया?

कोई नेता जब आप से वोट मांगने आता है तो क्या कहता है? वह कहता है कि आप उसे वोट दें ताकि वह आने वाले पांच सालों तक आपकी सेवा करता रहे. मतलब, जनता मालिक और नेता सेवक. लेकिन चुनाव जीतने के बाद क्या होता है? क्या आपको यह पता चलता है कि विधायक जी को स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए जो करोड़ों रुपये सरकार की तऱफ से मिलते हैं, वो कहां जाते हैं?

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जातिगत आरक्षण : व्यवस्थागत खामियों का प्रतिबिंब

सरकारी एवं ग़ैर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाति आधारित आरक्षण का मुद्दा बार-बार हमारे सामने आता रहा है. ठीक उसी दैत्य की तरह, जो हर बार अपनी राख से ही दोबारा पैदा हो जाता है. इस मुद्दे पर विचार-विमर्श की ज़रूरत है. हमें यह सोचना होगा कि क्या आरक्षण वाकई ज़रूरी है.

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