शुजात बुखारी का आखिरी कॉलम, फेक न्यू़ज पत्रकारिता की बड़ी चुनौती

आज पत्रकारिता के समक्ष कई प्रकार की चुनौतियां है. ये चुनौतियां सामान्य रूप से तकनीकी विकास के कारण उत्पन्न हो रही हैं. पश्चिम में समाचार-पत्रों के प्र

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निजता का अधिकार: मानवीय गरिमा का अभिन्न अंग है

सरकार कहती रही कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, सामान्य कानून का मामला है, लेकिन संविधान पीठ ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया. 1973 में एक

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जितेंद्र सिंह जी यह ग़ुस्सा पौरुषहीन है

हम अपने को उस भीड़ में चाह कर भी शामिल नहीं कर पाते, जो भीड़ विरुदावली गाती है, जो भीड़ चंदबर दाई की श्रेणी की है और जो भीड़ ताकतवर और सत्ताधारियों के कश

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यश-भारती के यश पर सवाल

उत्तर प्रदेश के समाजवादी कुनबे में कलह जारी है. सियासत से लेकर अंतःपुर में खेले जाने वाले दांव-पेंच पर पूरे देश की नजर है. तमाम राजनीतिक विश्‍लेषक हर

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जब तोप मुकाबिल हो : कश्मीरियों को भी अपना समझिए

कश्मीर के बारे में कुछ भी कहना देशभक्ति या देशद्रोह का विषय बन जाता है. कश्मीर में अगर असंतोष या इससे जुड़ी गतिविधियां होती हैं, तो उन्हें तुरंत प्रायो

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स्मृति शेष आप हमेशा याद आएंगे वीरेन दा

भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद कानपुर में स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक की नौकरी चल रही थी और साथ ही यत्र-तत्र स्वतंत्र लेखन

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कुख्यात डाकू मुस्तकीम कैसे मारा गया-3 : फर्जी मुठभेड़ की पुलिसिया कहानी

आसपास के गांवों से इकट्ठा हुए लोगों से मुस्तकीम ने पानी मांगा, लेकिन दारोगा ने उसे नहीं देने दिया. काफी हुज्जत के बाद उसे पानी दिया गया तथा बाद में एक

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जॉर्ज फर्नांडीज जैसी विभूतियां हमारी धरोहर हैं : समाजवाद और सादगी की प्रतिमूर्ति

उल्लेखनीय है कि बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने उन सभी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया, जिन्हें रक्षा मंत्री रहते हुए नेताजी मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था. इसम

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एक औघड़ लीक से हटकर-2 : परोपकारी-महात्मा थे भगवान राम

औघड़ों के पास सचमुच कोई ऐसी ताकत होती है, जिससे वे परा जगत की तथाकथित शक्तियों को अपने वश में कर लेते हैं? क्या औघड़ विज्ञान की तार्किक दुनिया से पर

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एक औघड़ लीक से हटकर

आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, बदल रहे हैं अथवा बदल दिए गए हैं, नतीजतन, उन पत्रकारों के सामने भटकाव जैसी स्थिति आ गई है, जो पत्रकारिता को मनसा-वाच

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आखिर क्यों मारा जाता है एक पत्रकार

पत्रकारों के हितों की पैरोकार न्यूयॉर्क की संस्था कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) की एक रिपोर्ट में उन देशों का उल्लेख है, जो पत्रकारों के लि

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एक नए अध्याय की शुरुआत

जिस समय देश में सांप्रदायिक सद्भाव कम हो रहा है. लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं. ऐसे समय में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की धरती ने हिंदी साहित

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भारतीय मीडिया का संकट काल

पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पिछले दस सालों से कुछ समाचार पत्रों को छोड़कर अधिकांश समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के मालिक व्यावसायिक घराने हो

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एम जे ने तोड़ा अंग्रेजी पत्रकारिता का पाखंड

एम जे अकबर ने पहली बार हिंदी की रिपोर्ट को अंग्रेजी में अनुवाद कर छापा. उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता के उस पाखंड को तोड़ दिया, जिसमें कोई भी दम न होने

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरताप

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते त

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए क

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भ

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो

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पटना में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन : मीडिया की भूमिका पर नज़र

आज राष्ट्रीय या फिर प्रादेशिक स्तर पर उत्पन्न परिस्थिति में मीडिया की भूमिका का़फी महत्वपूर्ण हो गई है. यही वजह है कि सबकी निगाह मीडिया पर लगी हुई है.

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हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान

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हमें अपने देश का भरोसा बरक़रार रखना है

पिछले हफ्ते मैंने चौथी दुनिया की रिपोर्ट में इंडियन एक्सप्रेस और शेखर गुप्ता की पत्रकारिता पर कई सवाल उठाए. उन सवालों को उठाते हुए मुझे हमेशा याद रहा

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प्रधानमंत्री जी, चुप रहने का व़क्त नहीं है

सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत हुए जस्टिस काटजू को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. पहले से ही यह शिकायत थी कि प्रेस काउंसिल एकदम कमज़

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पीत पत्रकारिता : लोकायुक्त प्रारूप पर फ़र्ज़ी ख़बर छापी

बिहार में पत्रकारिता का स्तर कितना गिर रहा है, इसकी एक ताज़ा मिसाल है पटना से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल के नाम

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समाचारपत्रों की विकृति

आज के युग में स्कूलों के सिवाय मानव मस्तिष्क पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है समाचारपत्रों का. आपने ग़ौर किया होगा कि भारत में जितने भी समाचारपत्र पढ़े जा

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…किसी से हो नहीं सकता

हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद ख़ास दिन होता है. इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है, लेकिन हिंदी पट्टी में

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संभालिए, अभी कुछ बिगडा़ नहीं है

बहुत सारी चीजें अमेरिका में बनती हैं, अमेरिका में खुलती हैं, तब हमें पता चलता है कि हम किस तरह के जाल में कभी फंस चुके थे, इन दिनों फंस रहे हैं या आगे

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आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित

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