दिल्ली विधानसभा चुनाव : मुद्दे की नहीं, व्यक्तित्व की लड़ाई है

दिल्ली विधानसभा चुनाव में तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा है. सभी पार्टियां आक्रामक नज़र आ रही हैं. प्रचार-प्रसार में

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दिल्ली विधानसभा चुनाव: भाजपा की अग्निपरीक्षा

महाराष्ट्र, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने वाली भाजपा का विजय रथ दिल्ली आकर ठिठक-सा गया है.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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