2019 प्रयाग कुम्भ: हरित-कुम्भ का दावा, पर काट रहे हैं जंगल के दुर्लभ पेड़

पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ऋृषिकेश में परमार्थ निकेतन

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धर्म की जमीन पर जमेगा सियासी अखाड़ा

2019 के प्रयाग कुम्भ मेले को अभूतपूर्व बनाने में लगे योगी-धर्म की जमीन पर जमेगा सियासी अखाड़ा 2019 के लोकसभा

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देश भर से आई आवाज़: मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अन्ना हजारे का आमरण अनशन किसी कुंभ से कम नहीं है. जिस तरह कुंभ किसी एक जगह पर न होकर प्रयाग से लेकर नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में संपन्न होता है

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तीन चौथाई कुंभ ऐसे ही निबट गया है

हरिद्वार का महाकुंभ 2010 जैसे तैसे तीन चौथाई निबट चुका है. मुख्य स्नान शेष है जो अगले पंद्रह दिनों में संपन्न हो जाएगा और तब मेले का प्रशासन और पुलिस दोनों ही लंबी तान लेंगे.

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कुंभ के नाम पर सरकारी झूठ पर मीडिया की मुहर

परंपरा और ज्योतिषीय व्यवस्था की बात कहें तो 14 अप्रैल को ही कुंभ का अमृत योग बनेगा और जब तक सूर्य मेष राशि में रहेंगे यानी 13 मई 2010 तक यह अमृतयोग बना रहेगा. लेकिन, मज़े की बात यह है कि तब तक सरकारी तौर पर कुंभ ख़त्म हो चुकेगा. कुंभ का सरकारी कैलेंडर 14 अप्रैल को कुंभ का मुख्य स्नान बताकर अंतिम स्नान भी बता रहा है. जबकि यह आधा सच है. वास्तविक कुंभ तो शुरू ही 14 अप्रैल से होगा.

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अनुभव की ज़मीन और आज़ाद भारत का सच

पिछले कुछ वर्षों में युवा भारतीय अंग्रेज़ी लेखकों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने लेखन का न केवल लोहा मनवाया, बल्कि जमकर वाहवाही भी बटोरी. खास बात यह रही कि अंग्रेज़ी लेखकों की एक पूरी की पूरी नई पीढ़ी

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कुंभ तो हरिद्वार में ही होता है!

बधाइयां बांटता और शुभकामनाएं बिखेरता नया वर्ष आ चुका है. उधर केवल ग्यारह दिन पहले ही 20 दिसंबर की आधी रात को देवगुरु वृहस्पति ने आगामी लगभग एक वर्ष के लिए कुंभराशि में प्रवेश कर लिया है. इसका सीधा अर्थ यह है कि अब आकाश के ग्रह नक्षत्र भी धरती वालों को कुंभ स्नान कराने की स्थिति में आने लगे हैं.

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आज अरबों रुपये में संपन्न होते हैं कुंभ

यूतो कुंभ का इतिहास बड़ा पुराना है, पर यह धार्मिक-पौराणिक मिथकों के रूप में ही अधिक प्राप्त होता है. धार्मिक हिंदू जगत की परंपरा है कि देश के चार धर्मस्थलों पर कुंभ का आयोजन होता आया है. किसी ज़माने में यह आयोजन व्यवस्थाओं की दृष्टि से केवल साधु-संन्यासियों और पंडे-पुजारियों की देखरेख में आम जनता स्वयं ही कर लेती होगी.

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डेढ़ अरब रुपये से ज़्यादा के स्थायी विकास कार्य

उत्तराखंड के गठन के बाद कुंभ और अर्द्धकुंभ जैसे विराट जनपर्वों को लेकर एक जो महत्वपूर्ण परिवतर्र्न सामने आया, वे हैं स्थायी निर्माण कार्य. इससे पहले उक्त विराट मेले हरिद्वार में करोड़ों रुपये ख़र्च करने के सशक्त बहाने बनकर आते थे. रुपये तो अब भी पहले की तुलना में कई गुना अधिक ख़र्च हो रहे हैं, पर अब ज़ोर स्थायी निर्माण कार्यों पर अधिक है. यह परिवर्तन उत्तराखंड बनने के बाद आए पहले अर्द्धकुंभ से हुआ. तब पंडित नारायण दत्त तिवारी राज्य के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने ही इन महामेलों के निमित्त स्थायी निर्माण कार्यों की पहल की.

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कुंभ दूर है, साधुओं का दंभ उभरने लगा है

अधिकारियों और ठेकेदारों के चंगुल से महाकुंभ बच भी जाए, पर साधु-संतों के दंभ से वह बच नहीं पाता है! यही अब तक होता आया है और यही अब 2010 के हरिद्वार महाकुंभ में हो रहा है! इतिहास साक्षी है कि कुंभ जैसे महापर्व सामाजिक सौहार्द के ऐसे बड़े अवसर होते हैं, जबकि बारह बरस में एक बार एक स्थान पर एकत्र होकर योगी एवं भोगी सामाजिक चिंतन और भविष्य के लिए नई राहों का अन्वेषण करते हैं. साधु-संन्यासियों को समाज के चिंतक और मनीषी वर्ग में गिना जाता है. अपने लिए भगवद् उपासना व समाज के लिए कल्याण-चिंतन ही इस चतुर्थाश्रम का दायित्व और ध्येय रहा है, लेकिन यह औदात्यपूर्ण परंपरा है, जो अब कालांतर में रूढ़ियों तक सीमित होकर रह गई है.

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