उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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मारुति, मजदूर और तालाबंदी : कामगारों की अनदेखी महंगी पड़ेगी

मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.

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आडवाणी जी, कार्यकर्ता आपकी राह देख रहे हैं

आडवाणी जी को धन्यवाद देना चाहिए कि आखिर उनकी समझ में आ गया कि देश की जनता उनकी पार्टी से खुश नहीं है. उन्हें शायद यह भी समझ में आ गया कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी अपने नेतृत्व से खुश नहीं हैं. इस नेतृत्व की परिभाषा क्या है?

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बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं.

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श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

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सिंह नहीं, किंग महेंद्र

हम और आप केवल कल्पना कर सकते हैं कि क्या कोई शख्स सात बार लगातार राज्यसभा के लिए चुना जा सकता है, लेकिन नज़र जब किंग महेंद्र के चेहरे पर जाकर अटकती है तो लगता है कि इस धरती एवं इस लोकतंत्र में कुछ भी संभव है. इस लंबे दौर में बिहार एवं केंद्र में सत्ता की राजनीति का चेहरा कई बार बदला, पर एक चीज़ नहीं बदली और वह थी किंग महेंद्र की राज्यसभा के लिए दावेदारी.

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नवीनीकरण का विरोध

नई मशीनरी का परिणाम है कम मज़दूरों से अधिक काम करवा सकना. उससे मज़दूरों की ज़रूरत न रहने से कटौती या छंटनी होती है. जो लोग बेकार होते हैं, वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि नई मशीनरी लगाई जाए. जो काम करते रहें, उन्हें अधिक वेतन दें तथा हमें निकाल बाहर करें. युक्तीकरण का सबसे बड़ा विरोध इसी बुनियाद पर हो रहा है. नवीनीकरण में सबसे बड़ी बाधा इन मज़दूरों की छंटनी है.

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काम रोको

यह सही है कि इससे जनता को कष्ट और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अभी हम श्रमिक संघ प्रणाली का विश्लेषण कर रहे हैं. इसके कई पहलू अभी तक बाक़ी रह गए हैं. मज़दूरों के किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए सविनय अवज्ञा के तरीक़े हैं, जैसे टूल्स डाऊन, स्टे-इन-स्ट्राइक आदि.

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ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं.

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स्त्रियों की मज़दूरी का मूल्यांकन

फिर कल-काऱखानों के चल निकलने के कारण स्त्री कामगारों की संख्या बढ़ी, लेकिन बाज़ार में इनकी मज़दूरी का भाव पुरुषों की अपेक्षा निम्न स्तर का ही रहा. मालिकों की दलील यह थी कि यदि हमें मज़दूरों की ज़रूरत ही हो तो हम पुरुषों को ही क्यों न रखें और फिर सस्ती दर में औरतें काम करने के लिए राज़ी भी तो हैं. उनके इस उत्तर में सुदृढ़ तर्क का अभाव भले हो, इसने स्त्रियों को मज़दूरी की आवश्यकता के कारण सस्ती दर पर काम करने के लिए बाध्य कर दिया.

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मिथुन दा की छत्रछाया

इस वर्ष फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड एलाइड मज़दूर यूनियन ने गणतंत्र दिवस और अपना वार्षिक उत्सव एक साथ मनाया. यह मज़दूर यूनियन किसी परिचय की मोहताज नहीं है, यह अपनी तरह की एक ही संस्था है और मिथुन चक्रवर्ती की छत्रछाया में फलफूल रही है. इस संस्था के सभी मज़दूर स़िर्फ मिथुन दा को ही अपना चेयरमैन बनाए रखना चाहते हैं और उनके आलावा किसी अन्य को इस पद के लिए स्वीकार नहीं करते.

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वर्ग युद्ध

मध्यम वर्ग का या उत्पादन करने वाला कोई भी व्यवसायी जिस तरह से अपने जीवन निर्वाह के लिए अपना माल बेचना आवश्यक समझता है, उसी तरह एक मज़दूर भी अपना माल-असबाब बेचे बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता. उसका माल-असबाब उसका श्रम ही है. उसकी जितनी ज़्यादा क़ीमत मिल सके, उतना ही उसके लिए अच्छा है, जितनी कम मिले, उतना ही बुरा है.

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कंपनियों का अवतरण

ये मध्यम वर्ग के लोग जो शुरू-शुरू में छुटभैय्या, कारिंदों या मंत्रियों के रूप में सामने आए थे, धीरे-धीरे स्वयं व्यापार करने लगे. एक तऱफ पूंजीपतियों की पूंजी थी, दूसरी तऱफ मज़दूर की मेहनत थी. दोनों का उपयोग करते हुए या दोनों का ही शोषण करके इस वर्ग ने अपना अधिपत्य सारे व्यापार और उद्योग पर जमा लिया.

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बालश्रम खत्म किया जा सकता है

भारत में 14 साल तक के बच्चों की आबादी पूरी अमेरिकी आबादी से भी ज़्यादा है. कुल श्रम शक्ति का लगभग 3.6 फीसदी हिस्सा 14 साल से कम उम्र के बच्चों का है. प्रत्येक दस बच्चों में से 9 काम करते हैं. ये बच्चे लगभग 85 फीसदी पारंपरिक कृषि गतिविधियों में कार्यरत हैं, जबकि 9 फीसदी से कम उत्पादन, सेवा और मरम्मती कार्यों में लगे हैं.

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संतति नियमन आवश्यक

बढ़ी हुई जनसंख्या निश्चय ही देश का धन है, पर कब और किस हालत में? ज़रा ग़ौर कीजिए. एक दंपत्ति समृद्ध हैं, अपनी परिचर्या के लिए दो नौकर रखे हुए हैं, सब काम उनके वे दोनों नौकर आराम से कर लेते हैं. एक दूसरे दंपत्ति ने अपनी परिचर्या के लिए, अलग-अलग कामों के लिए 9 नौकर तैनात किए हैं. काम इनका भी आराम से हो जाता है. अब बताइए, वे 9 आदमी विशेष काम करते हैं क्या? नहीं.

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नव उदारवाद और भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों, अवधारणाओं एवं तरीक़ों का मौजूदा संदर्भों में नया अर्थ और प्रयोग नहीं हो सकता, बल्कि वह होना चाहिए, लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने के लिए इनका रूप बिगाड़ देना इनके अवधारणाओं को लांछित करने के साथ-साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है.

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कर्म, अकर्म और दुष्कर्म

धनिक या समृद्ध व्यक्ति क्या निठल्ला रहता है या आलस्य में कुछ काम करता ही नहीं? अगर वह मेहनत करता है, काम करता है तो फिर धनिक या समृद्ध होने से आप उसे बुरा क्यों कहते हैं? काम करने वाले किसी भी व्यक्ति को बुरा कहने का अधिकार किसी को नहीं है, बशर्ते कि वह काम करता हो देश के लिए, समाज के लिए या अपने परिवार के लिए कुछ भी उपार्जन करने वाले कामों को ही हम काम कहेंगे.

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वर्ग तंत्र और यथास्थितिवाद

पांचवीं योजना वर्ग विभाजन की है. राष्ट्र को या समाज को कई वर्गों में विभक्त मान लिया जाता है और प्राय: हर एक वर्ग की अलग-अलग आय निर्धारित होती है. मान लीजिए, एक वर्ग निम्न कोटि के काम करने वाले मज़दूरों, क़ुलियों, भारवाहकों का है, उन्हें औसतन 70 रुपये माहवार मिलता है. दूसरा वर्ग प्रोफेसर, डॉक्टर इत्यादि लोगों का है, जिन्हें क़रीब 1000 रुपये माहवार मिलता है.

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जिसकी लाठी उसकी भैंस

तीसरी योजना है कि जिसके पास ताक़त हो, वह ले ले. जो संभाल सके, वह रखे. यदि यह कार्यान्वित हुई तो विश्व में कहीं भी शांति या सुरक्षा का नामोनिशान ही नहीं रहेगा. अगर सब ताक़त में या चालाकी में समान हों तो संघर्ष और भी भयानक होंगे, परिणामस्वरूप कोई कुछ भी हथिया न सकेगा. बालक-वृद्ध कम ताक़त वाले हैं, युवा व्यक्ति अधिक ताक़त वाले हैं.

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मांग के मुताबिक़ मूल्य

पहली योजना है कि हर आदमी जितना वह उपार्जन करे, अपनी मेहनत से पैदा करे, उतना पाए. यह योजना देखने में बड़ी उचित और सुंदर प्रतीत होती है, पर जब इसे कार्यरूप में परिणित करना चाहें तो बड़ी कठिनाइयां पेश आती हैं. पहले तो यह निश्चय कर सकना कि किसने कितना पैदा किया, असंभव सा है.

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मध्‍य प्रदेशः वेलस्‍पन कंपनी का कारनामा- देश में कितने और सिंगुर बनेंगे

विकास के नाम पर आ़खिर कब तक किसानों और मज़दूरों को उनके हक़ से वंचित किया जाएगा? सेज, नंदीग्राम, सिंगुर, जैतापुर, फेहरिस्त लंबी है और लगातार लंबी होती जा रही है. इसी क़डी में एक और नाम जु़ड गया है वेलस्पन का. मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में वेलस्पन कंपनी के प्रस्तावित पावर प्लांट की स्थापना हेतु ज़िले की बरही एवं विजयराघवगढ़ तहसीलों के गांव बुजबुजा व डोकरिया के किसानों की लगभग 237.22 हेक्टेयर भूमि का शासन द्वारा अधिग्रहण किए जाने की खबर है.

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संपत्ति के वितरण की विभिन्न प्रणालियां

एक योजना जो आमतौर पर बतलाई जाती है और जो काम करने वाले मज़दूरों को मान्य और प्रिय है वह यह है कि जो आदमी अपने परिश्रम से जितना द्रव्य कमाए या पैदा करे वह उसके पास रहने दिया जाए. दूसरे कई व्यक्ति कहते हैं जो जितने का पात्र है उतना उसे मिले, जिससे कि आलसी, बेकार, कमज़ोर, शिथिल आदमियों को कुछ न मिले और वे नष्ट हो जाएं.

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अवकाश और श्रम का समन्वय

बंटवारे के लिए देश में रुपये हों, धन हों, तो उसके पहले काम या मेहनत का होना ज़रूरी है. बिना काम या मेहनत किए धन अर्जन ही नहीं होगा तो फिर बंटवारा किस चीज का और कैसे होगा? बिना ज़मीन को जोते-बोए अनाज पैदा ही नहीं होगा. इसके लिए किसान को परिश्रम करना ही होगा. बाद में रोटी बनाने वाले रसोइए को परिश्रम करना होगा, तब कहीं जाकर रोटियां बन पाएंगी.

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चूडी़ मजदूरों की जिंदगी बेहाल

पुरानी कहावत है कि दिया तले हमेशा अंधेरा रहता है. यह बात पूरी तरह देश के कांच उद्योग फिरोज़ाबाद पर लागू होती है. फिरोजाबाद के कांच उद्योग ने अपनी कला से न स़िर्फ देश की सुहागिनों की कलाइयों को सजाया बल्कि कांच की कलात्मक कारीगरी से विदेशों में भी नाम रोशन किया है.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

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लालबत्ती पर लुटता बचपन

राजू की उम्र महज़ 5 साल है. नन्हें-नन्हें हाथ-पैर, मासूम चेहरा, नन्हीं आंखें और शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े पहने राजू दिल्ली के बाराखंभा चौराहे पर बैठा सिग्नल लाल होने का इंतज़ार कर रहा है. अचानक सिग्नल लाल होता है, गाड़ियां रुकती हैं. झट से वह उठकर गाड़ियों के बीच में जाकर तमाशा दिखाने लगता है.

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राष्‍ट्रमंडल खेलः सिर्फ पैसे की घपलेबाजी ही नहीं यह इंसानियत पर काला धब्‍बा है

भारत आज विश्व की एक उभरती महाशक्तिहै. इसलिए अगर यहां राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं तो यह ख़ुशी और गर्व की बात है, लेकिन सवाल है कि इस खेल के पीछे जो खेल चल रहा है, वह कितना जायज़ है? खेल के नाम पर ग़रीबों की ज़िंदगी से आख़िर क्यों खेला जा रहा है?

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