नोटबंदी और जीएसटी के बाद सरकार और कॉरपोरेट का साझा एजेंडा: छीन लेंगे ज़मीन और श्रम

नोटबंदी और जीएसटी के बाद अब केन्द्र सरकार की निगाह जमीन और श्रम छीनने पर लगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

Read more

पॉस्को के जाने के बाद : क्या किसानों की ज़मीन वापस मिलेगी

पोहांग स्टील कंपनी यानि पॉस्को ने आखिरकार ओडीशा सरकार को बता दिया कि वह 12 मिलियन मीट्रिक टन इस्पात संयंत्र

Read more

रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

Read more

मध्‍य प्रदेश: पुलिस बर्बरता के शिकार हुए किसान

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार भले ही एक मज़बूत क़ानून बनाने की बात कर रही हो, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है. यही वजह है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां किसानों और मज़दूरों के हितों की अनदेखी करते हुए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने में जुटी हैं. बात चाहे कांग्रेस शासित महाराष्ट्र की हो या फिर भाजपा शासित मध्य प्रदेश की, हालात कमोबेश एक जैसी ही हैं.

Read more

जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

Read more

सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

Read more

बिना ब्‍याज का कर्ज और सस्‍ती जमीन: यह रिश्‍वत नहीं तो क्‍या है

नए-नए बने राजनीतिक दल (अरविंद केजरीवाल द्वारा घोषित) ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर एक साथ कई आरोप लगाए हैं. इन तमाम आरोपों में कई चीजें शामिल हैं और इनमें कई तथ्य एवं आंकड़े बहुत ही बड़े हैं, लेकिन इस सबके बीच अगर सिद्धांत की बात की जाए तो दो चीजें एकदम स्पष्ट हैं. पहला यह कि रॉबर्ट वाड्रा की कुल पहचान यही है कि वह सोनिया गांधी के दामाद हैं.

Read more

जन सत्‍याग्रह- 2012 अब सरकार के पास विकल्‍प नहीं है

जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.

Read more

सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए भूमि अधिग्रहणः खूनी मैदान में तब्‍दील हो सकता है नवलगढ़

करीब पांच दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को जिस राजस्थान के नागौर ज़िले में पंचायती राज का शुभारंभ किया था, उसी सूबे की पंचायतों और ग्राम सभाओं की उपेक्षा होना यह साबित करता है कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने देखा था, वह आज़ादी के 65 वर्षों बाद भी साकार नहीं हो सका.

Read more

लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

Read more

जनता को चिढ़ाइए मत, जनता से डरिए

शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.

Read more

नया भूमि अधिग्रहण विधेयक किसानों के खिलाफ साजिश

भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में भी पेश नहीं हो सका. यह विधेयक कब पेश होगा और देश के करोड़ों किसानों की परेशानियां कब खत्म होंगी, यह कोई नहीं बता सकता. मौजूदा समय में देश के अंदर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं. अब नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा पारसौल, नगड़ी, जैतापुर और कुडनकुलम जैसे हालात कई राज्यों में पैदा हो गए हैं.

Read more

संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल: काला कानून, काली नीयत

उदारीकरण का दौर शुरू होते ही जब सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून ने अपना असर दिखाना शुरू किया, तब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को यह मुद्दा अपनी छवि बनाने के एक अवसर के रूप में दिखा. नतीजतन, अपनी तऱफ से उन्होंने इस कानून में यथाशीघ्र संशोधन कराने की घोषणा कर दी. घोषणा चूंकि राहुल गांधी ने की थी, इसलिए उस पर संशोधन का काम भी शुरू हो गया.

Read more

प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

Read more

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास व पुनर्स्‍थापन अधिनियम (संशोधन) 2011 : नई हांडी में पुरानी खिचड़ी

नए भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर देश भर की निगाहें संसद और केंद्र सरकार पर टिकी हुई हैं. जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा. उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था.

Read more

राजस्‍थान का नंदीग्राम नवलगढ़ : सीमेंट फैक्‍ट्री के लिए भूमि अधिग्रहण

बिन पानी सब सून. राजस्थान के अर्द्ध मरुस्थलीय इलाक़े शेखावाटी की हालत कुछ ऐसी ही है. यहां के किसानों को बोरवेल लगाने की अनुमति नहीं है. भू-जल स्तर में कमी का खतरा बताकर सरकार उन्हें ऐसा करने से रोकती है. दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अकेले झुंझुनू के नवलगढ़ में तीन सीमेंट फैक्ट्रियां लगाने की अनुमति दे दी है. इसमें बिड़ला की अल्ट्राटेक और बांगड़ ग्रुप की श्री सीमेंट कंपनी शामिल है.

Read more

जनरल की जंग जारी है

जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के इतिहास के एक ऐसे सिपाही साबित हुए हैं, जिसने सेना में रहते हुए भी देश हित में भ्रष्टाचार के खिला़फ जंग लड़ी और सेना से रिटायर होने के बाद भी अपनी उस लड़ाई को जारी रखा. जनरल वी के सिंह जब तक सेना में रहे, वहां व्याप्त भ्रष्टाचार के खिला़फ आवाज़ उठाते रहे और पहली बार ऐसा हुआ कि सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के बारे में उस आम आदमी को पता चला, जिसके पैसों की खुली लूट सेना में मची हुई थी तथा अभी भी जारी है.

Read more

कर्ज का कुचक्र और किसान

बीते 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जनपद की तहसील रुदौली के सिठौली गांव में ज़मीन नीलाम होने के डर के चलते किसान ठाकुर प्रसाद की मौत हो गई. ठाकुर प्रसाद का बेटा अशोक गांव के एक स्वयं सहायता समूह का सदस्य था. उसने समूह से कोई क़र्ज़ नहीं लिया था. समूह के जिन अन्य सदस्यों ने क़र्ज़ लिया था, उन्होंने अदायगी के बाद नो ड्यूज प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया था.

Read more

जहां डाल-डाल पर सोने की चिडि़या करती है बसेरा

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है.

Read more

कब्रिस्तानों पर अवैध क़ब्ज़े : दफ़न के लिए दो गज़ ज़मीन भी मयस्सर नहीं

लोगों ने अपनी ज़मीन-जायदाद वक़्फ करते व़क्त यही तसव्वुर किया होगा कि आने वाली नस्लों को इससे फायदा पहुंचेगा, बेघरों को घर मिलेगा, ज़रूरतमंदों को मदद मिलेगी, लेकिन उनकी रूहों को यह देखकर कितनी तकली़फ पहुंचती होगी कि उनकी वक़्फ की गई ज़मीन-जायदाद चंद सिक्कों के लिए ज़रूरतमंदों और हक़दारों से छीनकर दौलतमंदों को बेची जा रही है.

Read more

जनसंवाद यात्रा : औधोगीकरण बनाम कृषि भूमि का मुद्दा उठाया

जनसंवाद यात्रा का प़डाव सूरत ज़िले का मांडवी था, जहां नगर पंचायत मांडवी की ओर से छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की एक संयुक्त बैठक का आयोजन शिक्षक भवन में किया गया था. मांडवी ज़िले का यह क्षेत्र अपनी उर्वरा भूमि के लिए प्रसिद्ध है. विगत 20 वर्षों से सभी सरकारों द्वारा लगातार यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि नर्मदा नदी में बांध बनने के पश्चात खेतों को पर्याप्त सिंचाई सुविधा और लोगों के लिए पेयजल उपलब्ध होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

Read more

बंजर भूमि का बढ़ता खतरा

उपजाऊ शक्ति के लगातार क्षरण से भूमि के बंजर होने की समस्या ने आज विश्व के सामने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है. सूखा, बाढ़, लवणीयता, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट आने से सोना उगलने वाली उपजाऊ धरती मरुस्थल का रूप धारण करती जा रही है.

Read more

उत्तराखंडः पिंडरगंगा घाटी, ऐसा विकास किसे चाहिए

पिंडरगंगा घाटी, ज़िला चमोली, उत्तराखंड में प्रस्तावित देवसारी जल विद्युत परियोजना के विरोध में वहां की जनता का आंदोलन जारी है. गंगा की सहायक नदी पिंडरगंगा पर बांध बनाकर उसे खतरे में डालने की कोशिशों का विरोध जारी है. इस परियोजना की पर्यावरणीय जन सुनवाई में भी प्रभावित लोगों को बोलने का मौक़ा नहीं मिला. आंदोलनकारी इस परियोजना में प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं.

Read more

सरकारी दमन के शिकार आदिवासी: नगड़ी को नंदीग्राम बनाने की तैयारी

नंदीग्राम और सिंगुर के जख्म अभी भरे नहीं हैं और देश में सैकड़ों ऐसे नंदीग्राम और सिंगुर की ज़मीन तैयार की जा रही है. मामला चाहे भट्टा पारसौल का हो या जैतापुर का या फिर कुडनकुलम का. इन सभी जगहों पर सरकार जबरन ज़मीन अधिग्रहण करने की ज़िद में किसानों-मज़दूरों की लाशें गिरा रही है.

Read more

श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

Read more

दावेदारी से पहले तैयारी सीखे भारत

लंदन 2012 ओलंपिक की मेज़बानी मिलने का जश्न मना भी नहीं पाया था कि वहां अगले ही दिन सीरियल बम धमाके हो गए और देश शोक में डूब गया. ब्रिटेन 2008 की वैश्विक मंदी से किसी तरह उबर पाया था, तभी यूरो जोन संकट आ खड़ा हुआ. देश की रीढ़ हिला देने वाली घटनाओं के बावजूद लंदन ओलंपिक खेलों की मेज़बानी के लिए समय से तैयार हो गया है.

Read more

जल संसाधन मंत्रालयः एनपीसीसी में यह क्‍या हो रहा है

जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है.

Read more

शिक्षा के अधिकार से गरीब क्यों वंचित हैं

खबर आई है कि बिहार सरकार संत विनोबा भावे का भूदान आंदोलन एक बार फिर शुरू करने जा रही है. फर्क़ स़िर्फ इतना है कि विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आंदोलन भूमिहीन किसानों को ज़मीन दिलाने के लिए था, वहीं बिहार सरकार का आंदोलन स्कूलों को ज़मीन उपलब्ध कराने के लिए होगा. इस आंदोलन के माध्यम से राज्य सरकार लोगों से विद्यालयों के लिए ज़मीन मांगेगी.

Read more

छोटा नागपुर काश्‍तकारी अधिनियमः मुंडा सरकार की नई परेशानी

छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम की धारा 46 पर बहस के पहले उस पृष्ठभूमि को समझना बहुत ज़रूरी है, जिसके अंतर्गत यह अधिनियम अंग्रेजों ने 1908 में पारित किया और जो 11 नवंबर, 1908 को लागू हुआ, परंतु संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम बहुत पहले 1860 में ही पारित कर दिया गया था.

Read more

पूंजी-विकास के माध्यम

इस परिस्थिति को संभालने के लिए, जैसा स्वाभाविक है, एक तीसरी श्रेणी, जो इन दो श्रेणियों का जोड़-तोड़ बैठा सके, खड़ी हुई. यह तीसरी श्रेणी मध्यम श्रेणी के नाम से पुकारी जाती है. यह मध्यम श्रेणी किस तरह से उत्पन्न हुई, इसका भी विचित्र इतिहास है. राजा, ठाकुर या जमींदार भूमि के स्वामी थे.

Read more