बड़कागांव गोलीकांड – झारखंड सरकार की आपराधिक मंशा का नतीजा : यह कैसा औद्योगीकरण!

‘जमीनो गेल, बेटा भी मर गेलक’, पुलिस गोलीकांड में मारे गए 16 वर्षीय रंजन कुमार की मां अपना दर्द बयान

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कनहर बांध विवाद : एनजीटी के फैसले का क्या असर होगा

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले में ग़ैर-क़ानूनी रूप से निर्मित कनहर बांध और अवैध तरीके से किए जा रहे भूमि

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भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास व पुनर्स्‍थापन अधिनियम (संशोधन) 2011 : नई हांडी में पुरानी खिचड़ी

नए भूमि अधिग्रहण क़ानून को लेकर देश भर की निगाहें संसद और केंद्र सरकार पर टिकी हुई हैं. जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में आंदोलित कई राज्यों में सैकड़ों ग़रीब किसानों एवं आदिवासियों को पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा. उनका दोष स़िर्फ इतना था कि वे किसी भी क़ीमत पर अपनी पुश्तैनी ज़मीन देने के लिए तैयार नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाया था.

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सायन-कोलीवाड़ाः मुंबई, जमीन हड़पने की राजधानी बनती जा रही है

उदारीकरण के दौर में ज़मीन सबसे क़ीमती संसाधन बन चुकी है और जहां-जहां लालची बिल्डरों को ज़मीन दिख रही है और यह भी दिख रहा है कि उस ज़मीन पर आम और कमज़ोर आदमी रह रहे हैं, उसे हड़पने के लिए वे पूरी ताक़त लगा रहे हैं. उनके इस कार्य में सरकार से लेकर सरकारी अधिकारी तक उनका साथ दे रहे हैं. सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जगह बिल्डर्स कल्याण ने ले ली है.

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सरकारी दमन के शिकार आदिवासी: नगड़ी को नंदीग्राम बनाने की तैयारी

नंदीग्राम और सिंगुर के जख्म अभी भरे नहीं हैं और देश में सैकड़ों ऐसे नंदीग्राम और सिंगुर की ज़मीन तैयार की जा रही है. मामला चाहे भट्टा पारसौल का हो या जैतापुर का या फिर कुडनकुलम का. इन सभी जगहों पर सरकार जबरन ज़मीन अधिग्रहण करने की ज़िद में किसानों-मज़दूरों की लाशें गिरा रही है.

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पूर्वांचलः जान देंगे, जमीन नहीं

उत्तर प्रदेश सरकार आंख-कान बंद करके काम कर रही है. भूमि अधिग्रहण मामले में बार-बार अदालत में मुंह की खाने और कई स्थानों कृषि भूमि बचाने के लिए किसान आंदोलन के उग्र रूप धारण करने के बाद भी वह चेती नहीं है. यही वजह थी कि भट्टा-पारसौल में भूमि अधिग्रहण मामले की आग ठंडी भी नहीं हो पाई थी और सरकारी नुमाइंदे पूर्वांचल के चंदौली ज़िले के कटेसर और कोडोपुर गांव में ज़मीन अधिग्रहण के लिए पहुंच गए.

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वी पी सिंह का सपना पूरा हुआ

किसानों ने अपना रुख़ तय करना प्रारंभ कर दिया है. स्वर्गीय प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का शायद यही सपना था. उन्होंने दिल्ली के पास दादरी में किसानों के ज़मीन अधिग्रहण के ख़िला़फ सफल लड़ाई लड़ी. उनके देहांत के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया कि किसान अगर ज़मीन नहीं देना चाहते तो उनकी ज़मीन वापस कर दी जाए. मौत के बाद भी वी पी सिंह जीत गए, रिलायंस हार गया.

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